विश्व मंच पर भारत की इतनी प्रभावी उपस्थिति शायद पहले कभी नहीं थी। दुनिया के तमाम देश भारत के इस उभार को देख रहे हैं, तो कुछ परंपरागत प्रतिद्वंदी देश भारी दुख और पीड़ा से भर गए हैं। अपनी निरंतर विदेश यात्राओं से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो हासिल किया है, दुनिया के तमाम राजनेता उसके लिए तरसते हैं। दुनिया के राष्ट्रध्यक्षों से दोस्ताना ऐसा कि सामान्य कूटनीतिक प्रोटोकाल अक्सर टूटते हुए दिखते हैं। यह बड़ी और महत्वपूर्ण बात इसलिए है क्योंकि नरेंद्र मोदी सिर्फ दो साल पहले तक एक राज्य के मुख्यमंत्री थे और वैश्विक राजनीति का उनका अनुभव बहुत नया है। वे न तो केंद्र कभी मंत्री रहे न ही कूटनीति के क्षेत्र के विद्यार्थी। दिल्ली में आकर जिस तरह उन्होंने वैश्चिक राजनेता सरीखी छवि बनाई है, वह किसी को भी प्रेरित कर सकती है। उनकी राजनीतिक यात्रा में यह बेहद महत्वपूर्ण दिन हैं, जब उन्हें दुनिया की सबसे ताकतवर शक्तियां सलाम कर रही हैं और राष्ट्राध्यक्ष उनके लिए प्रोटोकाल को धता बता रहे हैं।

यह एक संयोग ही है कि विदेश नीति भारतीय प्रधानमंत्रियों का एक पसंदीदा क्षेत्र रहा है। हमारे प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू से लेकर श्रीमती इंदिरा गांधी और अटलबिहारी वाजपेयी तक हम इस धारा को देखते हैं। इंद्रकुमार गुजराल और डॉ. मनमोहन सिंह तो वैश्विक अनुभवों वाले राजनेता रहे ही हैं। इस सूची में नरेंद्र मोदी का प्रवेश सर्वथा नया किंतु विस्मयकारी है। वे भारत और भारतीय जन को संबोधित करने वाले नेता रहे हैं। उनकी देहभाषा और उनकी जीवन यात्रा भारत के उत्थान और उसके जनमानस को स्पंदित करती रही है। उनकी वाणी उनके साथ है तो गुजरात में मुख्यमंत्री के नाते किए गए काम एक उदाहरण। लेकिन दिल्ली आकर जिस तरह वैश्चिक मंच पर उन्होंने धूम मचाई वह एक लंबी तैयारी के बाद ही संभव है।

एक तरफ जहां वे गुजरात के मुख्यमंत्री के नाते अमेरिकी वीजा से वंचित थे, वहीं अमरीका में सांसदों के बीच वे अति गरिमामय तरीके से सम्मानित होते नजर आए। यह साधारण नहीं है कि उन्होंने बराक ओबामा के साथ कम समय में जैसा रिश्ता विकसित किया है, उसने वर्षों की दूरियां महीनों में पाट दी हैं। अप्रैल,2016 में जब ह्वाइट हाउस में ओबामा ने दुनिया के पचास से अधिक राष्ट्राध्यक्षों को डिनर दिया तो नरेंद्र मोदी को ओबामा के बगल वाली सीट दी गयी। हालांकि ओबामा डॉ. मनमोहन सिंह का भी बहुत आदर करते थे, किंतु रिश्चों में जो गर्मजोशी मोदी के साथ दिखती है, वह दुर्लभ है। अब जबकि ओबामा अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में हैं तो वे जो विरासत छोड़कर जाएंगे, उस पर भारत और अमरीका अपना नया भविष्य गढ़ रहे होगें। पिछले दिनों पांच देशों की यात्रा से लौटे प्रधानमंत्री की यात्रा की जैसी व्याख्याएं पाकिस्तान और चीन के मीडिया में हुयी हैं, वे बताती हैं कि हालात बदल चुके हैं। कूटनीति के मोर्चे पर भारत आज एक लंबी छलांग लगा चुका है और उसकी पीड़ा उसके परंपरागत प्रतिद्वंदियों के हाव-भाव और प्रतिक्रियाओं से प्रकट हो रही है। चीन के सरकारी अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ की टिप्पणियां बताती हैं कि चीन इस यात्रा को किस नजर से देखता है। मोदी के इस प्रवास को चीन और पाकिस्तान दोनों ही एक प्रकार की खेमेबंदी मान रहे हैं, जो उनके खिलाफ है। शायद इसीलिए चीनी अखबार ने कहा कि “चीन का रास्ता रोककर भारत के सपने पूरे नहीं होगें।” जाहिर तौर पर यह बौखलाहट है और चीन का दर्द भी। पाकिस्तान भी इसी प्रकार की जलन और कुंठा का शिकार है। उनके टीवी पर तो पाकिस्तान की सरकार को कोसने वाले लोग छाए हुए हैं। वे अपनी ही सरकार की चुन-चुन कर गलतियां बता रहे हैं और कोस रहे हैं। प्रधानमंत्री बनने के दो वर्षों में 38 देशों की यात्राएं कर चुके मोदी जिस भरोसे और आत्मविश्वास से भरे हुए हैं, वह बात महत्व की है। वे भारतीय समुदाय के लोगों को दुनिया भर में अपने भरोसे से जोड़ रहे हैं, जो आज एक बड़ी ताकत बन चुके हैं। दुनिया सब देशों के राजनीतिक-सामाजिक- आर्थिक जीवन में भारतीयों की एक बड़ी उपस्थिति है। ईरान से लेकर ब्रिटेन और अमरीका सब मोदी की नजर में हैं। अफगानिस्तान से रिश्तों को उन्होंने एक तरह से फिर पटरी पर ला दिया है। उनकी यह वैश्विक उपस्थिति साधारण नहीं हैं।

उनका आत्मविश्वास, उनकी भाषण कला ने उनके विरोधियों को भी मोदी का मुरीद बनाती है। यह बात सही है कि एनएसजी में भारत की राह आसान नहीं है किंतु मोदी ने जिस तरह भारत का पक्ष और भारत का व्यक्तित्व दुनिया के सामने रखा है, उसे आजतक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन ही कहा जाएगा। आप इस बात पर उनका आनंद ले सकते हैं कि वे ज्यादातर विदेशों में रहते हैं, लेकिन उनकी दिनचर्चा और सक्रियता देखकर क्या यह दावे से कह सकते हैं कि उन्होंने एक पल भी व्यर्थ गंवाया है। वे समय को साधने और भारतीय जन में आत्मविश्वास भरने वाले राजनेता के रूप में उभरे हैं। देश की आंतरिक राजनीति और उसके मुद्दों से मोदी की इस कवायद को मापा नहीं जा सकता। ये भारत के कल को बनाने वाली यात्राएं हैं, जिनके सुफल आने शीध्र ही प्रारंभ हो जाएंगे।

अनेक समस्याओं, संकटों और गरीबी जैसे हजारों दुखों से घिरे देश भारत के पास, उसके नेता के पास रास्ता क्या है? क्या वह इन दुखों पर विलाप करता बैठा रहे या वह उपलब्ध शक्ति और संसाधनों का अधिकतम उपयोग करता हुआ कर्मरत रहे? जाहिर तौर पर मोदी अपने संकटों में उलझने के बजाए संभावनाओं में निवेश कर रहे हैं। वे विलाप के बजाए समाधानों पर ध्यान दे रहे हैं। मंदी की शिकार विश्व व्यवस्था में भारतीय जन के जीवन स्तर को उठाने के लिए, उनके जीवन को वैभव से भरने के लिए प्रयास कर रहे हैं। मोदी की ये कोशिशें देश के अंदर और बाहर दोनों उनकी जिजीविषा को प्रकट करती हैं। वे सही कर रहे हैं या गलत इसका आकलन करना हो, तो पिछले दिनों के पाकिस्तान और चीन के अखबारों को पढ़ लीजिए।