दुनिया ने एक बार फिर से संयुक्त राज्य अमेरिका के ऑरलैंडो क्लब में स्वयंभू इस्लामी राज्य के प्यादे द्वारा निर्दोष लोगों के एक और नरसंहार के विषय में पढ़ा। बांग्लादेश में जिहादियों द्वारा एक हिंदू पुजारी सहित अनेक प्रमुख उदारवादी मुस्लिमों की हत्या कर दी गई। प्राप्त समाचारों के अनुसार आईएस अनेक देशों में इसी प्रकार की हत्याओं के लिए तैयारी कर रहा है।

जब भी कोई ऐसी घटना होती है, घटनाओं के लिए जिम्मेदार लोगों की निंदा की जाती है, कहा जाता है कि आतंक का कोई धर्म नहीं होता, इस्लाम शांति का धर्म है, इस्लाम में निर्दोष लोगों की हत्या का कोई आदेश नहीं है आदि…आदि – ऐसा लगता है मानो हम प्रतिक्रिया की कोई पाठ्यपुस्तक पढ़ रहे हों। पाठ्यपुस्तक सरीखी इन प्रतिक्रियाओं से कोई अर्थ नहीं निकलता और हत्याओं की रोकथाम का तो सवाल ही नहीं है।

सवाल उठता है कि आखिर यूरोप, अमरीका, भारत सहित गैर-मुस्लिम देशों में नरसंहार के लिए आईएस को रंगरूट मिलते कहाँ से हैं? आतंक की कौन सी फैक्ट्री है जो मुस्लिम परिवारों से नरसंहार के लिए निकलने वाले रंगरूटों के प्रवाह को प्रेरित करती है? ऐसा क्यों है कि इन रंगरूटों में से अनेक सुशिक्षित और संपन्न परिवारों से संबंधित होते हुए भी, जैसे ही वे इस्लाम स्वीकार करते हैं, आईएस द्वारा सोशल मीडिया पर दिए गए एक सन्देश पर, दूसरों की हत्या करते हुए, स्वयं का जीवन खोने के लिए भी तैयार हो जाते हैं?

सऊदी अरब सहित पश्चिम एशिया के कई मुस्लिम बहुल देश, जो ज्यादातर अत्यंत प्रभावशाली और धनी हैं, आई एस के उन्मूलन करने के लिए अमेरिका और यूरोप के साथ संयुक्त है। जहां एक ओर अमेरिका अपनी वायु शक्ति का उपयोग कर आईएस के नेताओं को एक एक करके निबटा रहा है, वहीं दूसरी ओर पश्चिम एशियाई इस्लामी राष्ट्र जमीनी लड़ाई तथा खुफिया जानकारियों के माध्यम से आईएस के खिलाफ अभियान चलाये हुए हैं! इसके कारण यह विश्वास उत्पन्न हुआ है कि तथाकथित इस्लामी राज्य का देर सबेर सफाया कर दिया जाएगा।

इस्लामी राज्य के नेताओं पर नजर रखते हुए उन्हें निबटाने में अमेरिका की सफलता का काफी प्रचार हुआ है- यहां तक कि नवीनतम अपुष्ट समाचारों के अनुसार खलीफा अल बगदादी खुद भी एक अमेरिकी हवाई हमले में मारा गया है! इसे आम मुसलमानों में संगठन की बढ़ती अपील को कम करने का प्रयास माना जा रहा है।

जिहादी आतंकवाद के खिलाफ अमेरिकी सरकार के ओफीसियल रुख और इस्लामिस्ट के विरुद्ध सऊदी अरब जैसे देशों के साथ वाशिंगटन के राजनीतिक गठजोड़ में एक बुनियादी विरोधाभास है। रियाद मुस्लिम धार्मिक शैक्षिक संस्थानों अर्थात मदरसों का सबसे बड़ा फाइनेंसर है! ये संस्थाएं किस प्रकार की धार्मिक शिक्षा देती हैं, इसके सम्बन्ध में काफी कुछ उजागर हो चुका है।

दुनियाभर में गरीब मुस्लिम समुदायों के बीच कार्यरत ये संस्थाएं सऊदी पैसे से वित्त पोषित हैं। इन संस्थानों में क्या पढ़ाया जाता है? मौलवी उनकी पवित्र पुस्तक की व्याख्या करते हुए बताता है कि अल्लाह के आदेश क्या हैं? दुनिया कैसी होनी चाहिए, और उसे कैसे चलाया जाना चाहिए, इसके विषय में अल्लाहताला का क्या फरमान है? इसलिए वे मानते हैं कि दुनिया में इन नियमों और प्रथाओं में कोई भी बदलाव अल्लाह की अवज्ञा है और उसकी अनुमति नहीं दी जा सकती। जो इन परिवर्तनों का प्रयास करे, उससे लड़ना होगा, और इस तरह का युद्ध एक पवित्र युद्ध है, ‘जिहाद’ है। और जिहाद हर मुस्लिम का फर्ज है।

इन मदरसों में पांच साल की उम्र से यह बात जब एक अपरिवर्तनीय सत्य के रूप में दिमाग में बैठा दी जाती है, तब आम मुसलमान अपनी निर्धारित प्रथाओं और नियमों के अतिरिक्त हर बात को एक बुराई के रूप में देखने लगता है, जिसके खिलाफ लड़ना चाहिए और जो यह काम करते हैं, वे अल्लाह की फ़ौज हैं,  यह मानने लगता है।

इसका जीता जागता उदाहरण पाकिस्तान है। सैन्य तानाशाह जिया-उल-हक ने संविधान का जो मसौदा तैयार किया, उसमें मौलवियों को सरकार के किसी कदम को भी वीटो का अधिकार स्वीकार किया गया, साथ ही इस्लामी कानूनों के सख्त पालन से विचलन और ईशनिंदा पर भारी जुर्माना और सजा पुनः शुरू हुई।

मौलवियों को प्रशासकीय शक्ति मिलने से वे अत्यंत सक्षम और शक्ति केंद्र बन गए। सेना और राज्य सत्ता पोषित मौलवियों का उपयोग उन्होंने भारत को कथित दुश्मनों में शीर्ष पर रखने के लिए किया। दुनिया के लिए सबक है कि पाकिस्तान एक राज्य के रूप में आतंकवाद को समाप्त करने का केवल नाटक करता है, लेकिन स्वयं की धरती पर पनपते आतंक को खत्म करने में अपने पड़ोसी देश के साथ रत्तीभर भी सहयोग नहीं करता।

ऑरलैंडो नरसंहार से यह संदेश और भी जोर से सुनाई देता है : एक पंथ के रूप में आतंकवाद को राष्ट्रीयता और भौगोलिक सीमाओं के पार ऐसे 'वफादारों' का समर्थन हासिल होता है जो मानव अस्तित्व के सभी पहलुओं को धर्म की विशिष्ट व्याख्या से जोड़ने की मानसिकता से ग्रस्त होते हैं।

कई साधारण व्यक्तियों को इस विशिष्ट मानसिकता के आत्मघाती हमलावरों में बदलने में मदरसे अहम भूमिका निभाते हैं। यहां तक कि बिना किसी औपचारिक संबंधों, संरचना, संचार और संगठनात्मक नेटवर्किंग के, ये ‘वफादार’ अपने साझा धार्मिक मानसिकता के प्रोग्राम हेतु एक दूसरे के जुड़े होते हैं,  जिसका नाम है काफिरों के खिलाफ ‘पवित्र युद्ध’ अर्थात जिहाद।

जब तक इस्लामी दुनिया के लोगों की मानसिकता नहीं बदलेगी, अमेरिका के नेतृत्व में चल रहा आतंक को खत्म करने का अंतरराष्ट्रीय अभियान भी सफल नहीं होगा। अन्य सभी उपायों से केवल सीमित और आंशिक परिणाम प्राप्त होंगे। इस बीच, अनेक आतंकी विश्लेषकों का मानना है कि अच्छी तरह से वित्त पोषित और हथियारों से लैस जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा जैसे पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन आई एस के साथ मिलकर दुनियाभर में “अल्लाह की फ़ौज” बनाने की योजना बना रहे हैं। यह भी स्मरण रखना चाहिए कि पाकिस्तान हमेशा इस्लामी दुनिया का सिरमौर बनना चाहता है।

- इस लेख के मूल लेखक वरिष्ठ पत्रकार बलवीर पुंज हैं। वे भाजपा के पूर्व राज्यसभा सांसद हैं। 

सौजन्य : न्यू इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित अंग्रेजी आलेख का हिन्दी अनुवाद

अनुवादक : हरिहर शर्मा