ऐसी घटनाएं एक बड़े रुझान की ओर इशारा करती है। ये रुझान है धर्म गुरुओं का अपनी सत्ता चलाने की कोशिश करना और लोकतांत्रिक संस्थाओं की अवमानना करना। वे कानून और न्यायपालिका का एक तरह से माखौल उड़ा रहे हैं। कुछ हथियारबद्ध समर्थकों के दम पर यह दिखा रहे हैं वे देश के संविधान से ऊपर हैं।  

उत्तर प्रदेश के मथुरा के जवाहर बाग में अतिक्रमण हटाने गए पुलिस वालों पर बहुत उन्मादी ढंग से हमला करनेवाले समूह और उनको संगठित व प्रेरित करने वाले लोगों पर बहुत अधीर होकर सोचना जरूरी है। ठंडे दिमाग से ऐसी घटना को जन्म देनेवाली प्रवृत्तियों को समझा जाए, तभी शायद इस प्रकार की समस्याओं का हल ढूंढ़ा जा सकता है। सबसे बड़ा सवाल है कि क्या ऐसा होगा या ऐसा होने दिया जाएगा? दुर्भाग्य से किसी भी छोटी-बड़ी घटना या हादसे को राजनीतिक चश्मे से देखने की ऐसी आदत-सी हो गई है कि बड़ा से बड़ा प्रकरण भी हमें उसे पूरी तरह समझने नहीं देता। नतीजा यह होता है कि ऐसे अवांछित हादसा जन्य प्रकरण यानी कि संगठित अपराध देश के इस-उस राज्य में कुछ अंतराल पर होते रहते हैं।

हरियाणा में अभी कुछ समय पहले ही अवैध कब्जा करके लंबी-चौड़ी जमीन पर विशाल आश्रम-साम्राज्य चलाने वाले तथाकथित संत बने अपराधी को किस मुश्किल से जेल के सीखचों के पीछे पहुंचाया जा सका था, लोग भूले नहीं होंगे। जहां हजारों की संख्या में लोग हों। खासकर जहां आस्था के नाम पर ऐसा जमावड़ा हो वहां इस तरह की कोई कार्रवाई आसान नहीं होती। वे कानून और न्यायपालिका का एक तरह से माखौल उड़ा रहे हैं। कुछ हथियारबद्ध समर्थकों के दम पर यह दिखा रहे हैं वे देश के संविधान से ऊपर हैं।

ऐसी घटनाएं एक बड़े रुझान की ओर इशारा करती है। ये रुझान है धर्म गुरुओं का अपनी सत्ता चलाने की कोशिश करना और लोकतांत्रिक संस्थाओं की अवमानना करना। इतना ही नहीं ये लोग अपनी निजी सेनाओं तक का गठन कर चुके हैं। सतलोक आश्रम के पास राष्ट्रीय समाज सेवा समिति के नाम से निजी सेना है, उसी तरह सिरसा के डेरा सच्चा सौदा के पास ‘शाह सतनाम जी ग्रीन ‘एस’ वेलफ़ेयर फ़ोर्स विंग’ है। जब भी डेरा मुखिया बाबा राम रहीम की अदालत में पेशी होती है तो ये सेना सारे सिरसा शहर को सफ़ाई, सुरक्षा और श्रद्धा के नाम पर क़ब्ज़े में कर लेती है।

पंजाब में जालंधर ज़िले के नूरमहल क़स्बे में दिव्या ज्योति जागृति संस्थान की अपनी निजी सेना है। इस संस्थान का कई बार सिख संस्थाओं के साथ टकराव भी हो चुका है। इनका तरनतारन ज़िले में दमदमी टकसाल के समर्थकों के साथ टकराव हुआ था। दमदमी टकसाल सिख संस्था है जिनके पास हथियारबंद लोगों की अपनी सेना है। नामधारी परंपरा का डेरा लुधियाना के गांव भैणी साहिब में है जिसकी अपनी निजी सेना है।

जिस ‘स्वाधीन भारत सुभाष सेना’ ने मथुरा के जवाहर बाग में आतंक मचाया, जिसकी वजह से पुलिस के दो अधिकारियों समेत 27 लोगों की जान चली गई उसके लोगों के बारे में एक बड़ा खुलासा हुआ है। नेताजी के नाम पर संगठन चलाने वाले ये लोग असल में यूपी के एक धर्मगरु के अनुयायी थे। जय गुरुदेव नाम के इस धर्मगुरु की मौत 2012 में हो गई थी। उस वक्त उसकी उम्र 116 साल बताई जा रही थी। जय गुरुदेव कोई छोटा-मोटा धर्मगुरु नहीं बल्कि 4 हजार करोड़ का मालिक था। इसके अनुयायी जय गुरुदेव को नेताजी सुभाषचंद्र बोस मानते थे।

जय गुरुदेव का असली नाम तुलसीदास महाराज था। वह जाति से यादव था। मथुरा में उसके नाम पर एक स्कूल और पेट्रोल पंप भी है जिसे उसके नाम पर बना ट्रस्ट चलाता है। यही नहीं उसके नाम पर मथुरा में एक मंदिर भी बना हुआ और उसके दर्जनों आश्रम और प्रोपर्टी भी मौजूद हैं। जय गुरुदेव के हजारों समर्थकों में कई आरोपी और राजनेता शामिल हैं। यही लोग नेताजी के सच्चे भक्त होने का दावा करके यह संगठन चला रहे हैं। कृष्णनगरी मथुरा के उद्यान विभाग की सरकारी जमीन जवाहर बाग में वर्ष 2014 से अवैध कब्जा था और वहां कुछेक लोगों की समानान्तर सत्ता चल रही थी, फिर भी यूपी सरकार आंखमूंदी हुई थी।

गाजीपुर के रहने वाले रामवृक्ष यादव ने अपने करीब तीन हजार सहयोगियों के साथ जवाहरबाग पर कब्जा किया था। वे जयगुरुदेव के चेला बताए जाते हैं। बाद में वे उनसे अलग हो गए थे। वे खुद को सुभाष चंदबोस के आजाद हिंद फौज के विचारों से प्रभावित बताते हैं और सत्याग्रही कहते हैं। उनकी मांगे भी अजीब है। पेट्रोल और डीजल एक रुपये प्रति लीटर की जाए। देश में सोने का सिक्का चले। आजाद हिंद बैंक करेंसी से लेन-देन हो। जवाहरबाग की 270 एकड़ जमीन सत्याग्रहियों को सौंप दी जाए। अंग्रेजों के समय के कानून खत्म किए जाएं।

रामवृक्ष के अवैध कब्जे से मथुरा प्रशासन तंग था, कई बार सरकार जमीन को मुक्त कराने की कोशिश की गई थी। बात इलाहाबाद हाईकोर्ट तक पहुंच गई थी। एक याचिका की सुनवाई में हाईकोर्ट ने अवैध कब्जा हटाने के निर्देश दिए थे। पुलिस कोर्ट के आदेश पर अमल करने गई थी, जब यह हिंसा हुई। दो पुलिसकर्मी शहीद हुए और करीब 25 कब्जेधारी भी मारे गए। यूपी सरकार मामले के जांच के आदेश दिए हैं और केंद्रीय गृहमंत्री ने यूपी सरकार से रिपोर्ट मांगी है। इस हत्याकांड पर राजनीति भी हो रही है।

लेकिन अहम सवाल है कि आखिर जवाहर बाग में असलहों का जखीरा कैसे पहुंचा? जांच में जो भी दोषी हो, उन्हें सजा अवश्य मिलनी चाहिए। इसी के साथ लोकतंत्र में किसी को भी कानून हाथ में लेने का हक नहीं है। रामवृक्ष यादव को यह हक कतई नहीं है। चुनी हुई सरकार को भी इस तरह की स्थिति पैदा नहीं होने देने के लिए कृतसंकल्प होना चाहिए।