दलित उत्पीडऩ की घटनाएं यकीनन मानव समाज के माथे पर कलंक हैं। देश के किसी भी कोने में होने वाली दलित उत्पीडऩ की घटना सबके लिए चिंता का विषय होनी चाहिए। जिस वक्त मानव सभ्यता अपने उत्कर्ष की ओर अपने कदम बढ़ा रही है, उस समय दलित उत्पीडऩ की घटनाएं पतन का मार्ग भी प्रशस्त करती हैं। मनुष्य-मनुष्य में भेद के इस अपराध से यह प्रश्न भी खड़ा होता है कि आखिर हम कब जाति की बेडिय़ां तोड़ेंगे? कब मनुष्य को मनुष्य के तौर पर देखेंगे? सामाजिक समरसता के लिए जरूरी है कि इस तरह की घटनाओं पर कानून के हिसाब से कठोर से कठोर कार्रवाई हो, इस बात की चिंता सरकारों को करनी चाहिए। वहीं, इस संदर्भ में समाज की भी अपनी जिम्मेदारी है। बहरहाल, संसद भी दलित उत्पीडऩ पर चिंतित है, यह अच्छी बात है। भारतीय लोकतंत्र के मंदिर से यदि सामाजिक समरसता का रास्ता निकलता है, तब वह अधिक प्रभावी भी होगा। क्योंकि, हम जानते हैं कि सामाजिक समरसता में सबसे बड़ी बाधा कोई है तो वह राजनीति है, राजनीतिक पार्टियां हैं, उनके राजनीतिक स्वार्थ हैं। इसलिए यहाँ प्रश्न उठता है कि दलित उत्पीडऩ पर संसद में हो रही चिंता सामाजिक समरसता के लिए है, या फिर दलित विमर्श की आड़ में राजनीति खेली जा रही है?

गौरतलब है कि हाल में गुजरात में कथित गोरक्षकों ने कुछ दलित युवकों को पीट दिया था। जिस पर देश में बवाल मचा हुआ है। तथाकथित दलित चिंतक दिलीप सी मंडल ने इस विषय पर हिन्दू समाज के प्रतिनिधि के तौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत को संबोधित करते हुए बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी की है। उनकी टिप्पणी से उनके दलित चिंतन और बौद्धिक योग्यता का प्रदर्शन स्वत: हो जाता है। वह टिप्पणी अपने आप में इस बात का सबूत है कि इस तरह के लोग दलित विमर्श के नाम पर अपनी दुकान तो चला सकते हैं लेकिन न तो दलितों का भला कर सकते हैं और न ही सामाजिक समरसता का निर्माण करने में अपनी कोई भूमिका निभा सकते हैं। खैर, गुजरात के इसी मामले को लेकर संसद में भी चर्चा कराई जा रही है। दलित उत्पीडऩ के मामले पर कांग्रेस, बीएसपी और वामपंथी दलों को साथ लेकर गुजरात और केन्द्र सरकार को घेरना चाहती है। यानी सिर्फ राजनीति। इस मसले पर जब गृहमंत्री राजनाथ सिंह जवाब दे रहे थे, तब कांग्रेस सहित अन्य प्रतिपक्ष के व्यवहार ने यह साबित भी किया।

शून्यकाल में कांग्रेस सांसद सुरेश ने इस मुद्दे को उठाया और गुजरात में कानून एवं व्यवस्था विफल होने का आरोप लगाते हुए इसकी जांच के लिए संसद की संयुक्त समिति गठित करने की मांग की। चूंकि घटना भाजपा शासित और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रदेश में हुई है, इसलिए कांग्रेस इस मुद्दे को अधिक तूल दे रही है। यही सब दलित हितैषी जो आज संसद में हंगामा कर रहे हैं, उत्तरप्रदेश में 25 फरवरी को दलित अरुण माहौर और १२ फरवरी को सत्येन्द्र जाटव की हत्या पर चुप्पी साधे रहे। यह दोहरा आचरण ही सबकी कलई खोल देता है। संसद में गृहमंत्री ने अपने जवाब में महत्त्वपूर्ण बातें कहीं और कांग्रेस की दलित चिंता को भी उघाड़ दिया। उन्होंने कहा कि दलितों पर अत्याचार की घटना चाहे भाजपा शासित प्रदेश में हो या कांग्रेस शासित प्रदेश या कहीं और हो... निंदनीय है।

गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट सामने रखते हुए बताया कि 1991 से 1999 तक गुजरात में दलितों के खिलाफ अपराध के मामले लगातार बढ़े, जब प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी, जबकि 2001 से भाजपा सरकार आने के बाद ऐसे मामलों में कमी दर्ज की गई है। वहीं, पूरे देश में साल 2004 में अनुसूचित जाति, जनजाति समेत दलितों के खिलाफ अत्याचार के 32 हजार से अधिक मामले दर्ज किये गए, 2005 में 29 हजार मामले, 2006 में 32 हजार मामले, 2007 में 35 हजार से अधिक मामले, 2008 में 38 हजार से अधिक मामले, 2009 में 34 हजार से अधिक मामले दर्ज किये गए। उन्होंने ध्यान दिलाया कि इस दौरान देश में कांग्रेस की ही सरकार थी।    

गृहमंत्री ने बताया कि गुजरात के इस मामले में नौ आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है और आईपीसी एवं अन्य कानून की विभिन्न धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की गयी है। त्वरित जांच की पहल की जा रही है। प्रत्येक पीडित को चार-चार लाख रुपये की आर्थिक मदद देने की घोषणा की गई है, जिनमें से अब तक एक-एक लाख रुपये प्रदान किए जा चुके हैं। गुजरात मामले पर हुई कार्रवाई का जो ब्योरा गृहमंत्री ने दिया, वह संतोषजनक है। लेकिन, जिन्हें सिर्फ दलित विमर्श की आड़ में राजनीति ही करनी है, उन्होंने गृहमंत्री के जवाब पर असंतोष जाहिर करते हुए हंगामा ही किया। कांग्रेस इस मुद्दे पर कितनी गंभीर है, इसे समझने के लिए यह भी जानना चाहिए कि जब संसद में दलित विमर्श चल रहा था, तब कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी को झपकी लेते हुए पाया गया है। बहरहाल, यदि कांग्रेस इस मसले पर ईमानदार है तब उसे समझना होगा कि इस तरह के संवेदनशील मसलों पर राजनीति से ऊपर उठकर सोचना पड़ता है। इस सामाजिक बुराई के खात्मे के लिए सब दलों का साथ आना आवश्यक है।