राजनीति कितनी गंदी हो चली है इसका स्पष्ट प्रमाण इस दौर में देखा जा सकता है। इस दौर में नेताओं की जितनी गंदी जुबान है, उससे कहीं ज्यादा उसपर गंदी सियासत हो रही है। एक ओर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की ताकत बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर पार्टी के कुछ नेता भाजपा के इस बढ़ते कद को धूमिल करने में लगे हैं। हाल ही में भाजपा के उत्तर प्रदेश के निष्कासित उपाध्यक्ष दयाशंकर सिंह ने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती को लेकर आपत्तिजनक बयान दे दिया और उसके बाद दलित नेता के नाम पर सियासत जोर-शोर से शुरू हो गई।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गत 13 जून को भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के समापन समारोह में पार्टी कार्यकर्ताओं के आचरण और नीतियों की दृष्टि से 7 बिंदुओं का उल्लेख किया था। उन्होंने कहा था कि सेवा भाव, संतुलन, संयम, समन्वय, सकारात्मकता, सद्भावना और संवाद, ये सात मंत्र पार्टी के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के आचरण और व्यवहार में होना चाहिए। प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा था कि भाजपा की राजनीतिक ताकत बढ़ी है, जिसका उपयोग हम समाज के कल्याण के लिए करेंगे। लेकिन भाजपा के ही एक नेता से प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए संदेशों की अनदेखी हो गई। उत्तर प्रदेश के बतौर भाजपा उपाध्यक्ष पहली बार मउ पहुंचे दयाशंकर ने संवाददाताओं से चर्चा के दौरान कह दिया, “जो सपना देखा था कांशीरामजी ने, उस सपने को मायावती चूर-चूर कर रही हैं। आज मायावतीजी टिकटों की इस तरह से बिक्री कर रही हैं। एक वे... भी अगर किसी से कॉन्ट्रैक्ट करती है जो जब तक पूरा नहीं कर लेती उसको नहीं तोड़ती है। पर ये देश की हमारी इतनी बड़ी नेता हैं तीन-तीन बार टिकट बदलती हैं। मायावती जी किसी को 1 करोड़ रुपये पर टिकट देती हैं, 1 घंटे बाद कोई 2 करोड़ रुपये देनेवाला मिलता है तो उसको टिकट दे देती हैं। और शाम को 3 करोड़ दे देता है तो उसका भी (टिकट) काट करके उसको दे देती हैं। एक वे... से भी बदतर चरित्र की आज मायावतीजी हो गई हैं।”

निश्चित रूप से दयाशंकर का बयान बेहद आपत्तिजनक, गलत और निंदनीय है। सभी पार्टी के नेताओं ने इस बयान की निंदा की। जब दयाशंकर को अपनी गलती का अहसास हुआ तो उन्होंने माफ़ी मांग ली। भारतीय जनता पार्टी ने भी दयाशंकर सिंह को पार्टी से निष्कासित कर उसे पार्टी के सभी पदों से मुक्त कर दिया। इसके बाद भी बसपा नेताओं का गुस्सा कम नहीं हुआ और बसपा कार्यकर्ताओं ने देशभर में दयाशंकर और भाजपा के खिलाफ धरना प्रदर्शन किया। लखनऊ में डॉ. बाबासाहब आम्बेडकर की प्रतिमा के सामने बसपा कार्यकर्ताओं ने शब्दों की मर्यादा लांघ दी।

गुस्साए बसपा कार्यकर्ताओं ने दयाशंकर को जितना हो सके उतनी बड़ी गंदी बात करने में जोर लगा रहे थे। उनके हाथों में जो पोस्टर था, उसपर लिखा था, “दयाशंकर कु... को बाहर करो, बाहर करो।” बसपा कार्यकर्ताओं ने नारे लगाए, -

महिला विरोधी बीजेपी मुर्दाबाद, मुर्दाबाद!

दयाशंकर कु... को, फांसी दो, फांसी दो!

जिसके हाथ में माइक है, जब वो ‘फांसी दो’ की जगह ‘गिरफ्तार करो’ कहता है, तो बाकी लोग भी ‘गिरफ्तार करो’ कहने लगते। अगला नारा तो और भी दर्द देनेवाला है जो बेहद निंदनीय है:

दयाशंकर अपनी ब... को पेश करो, पेश करो!

दयाशंकर अपनी बे... को पेश करो, पेश करो!

बसपा विधायक उषा चौधरी ने कहा, “दयाशंकर सिंह ने जिस तरह बहनजी पर टिप्पणी की है, मुझे तो लगता है कि दयाशंकर का परिवार ही ऐसा ही जिस तरह कि टिप्पणी बहनजी के लिए की है। सिंह के डीएनए में ही खराबी है। वह खुद नाजायज औलाद है। इसलिए उन्होंने इस तरह की टिप्पणी की।” वहीं बसपा की चंडीगढ़ बसपा अध्यक्ष जन्नत जहान ने कहा है कि, “जो भी बयान देनेवाले नेता दयाशंकर सिंह की जुबान काटकर लगाए उसे 50 लाख रुपए का इनाम दिया जाएगा।”

बसपा नेता एक व्यक्ति के बयान को समग्र भाजपा का चरित्र बताने में लगे हैं। लेकिन बसपा समर्थकों द्वारा लखनऊ में प्रदर्शन के दौरान दयाशंकर सिंह की पत्नी, बहन और बेटी के बारे में घोर आपत्तिजनक टिप्पणियां उनकी पार्टी के सामूहिक चरित्र को भी बयान करती है। वहीं बसपा प्रमुख मायावती दयाशंकर सिंह के जिस गंदी बात का विरोध कर रही थीं, अपने समर्थकों द्वारा वैसी ही गंदी बात को जायज़ ठहराने में लगीं हैं।

लखनऊ में प्रदर्शित बसपा समर्थकों के इस आक्रोशपूर्ण गंदी बात पर पहले तो मायावती ने कहा, “उनके समाज के लोग उन्हें देवी समझते हैं और जिस तरह दूसरे लोग अपनी देवी के खिलाफ अपशब्द इस्तेमाल होने पर गुस्सा जाते हैं, उसी तरह से यह उनका गुस्सा है।” मायावती ने अपने कार्यकर्ताओं का बचाव में कहा कि दयाशंकर को महिला के अपमान का अहसास कराने के लिए उनके कार्यकर्ताओं ने अपशब्द कहे, जिससे वो आगे कभी ऐसा शब्दों का प्रयोग ना करें।

लेकिन जब बसपा कार्यकर्ताओं की इस अभद्र और गंदी बात की देशभर में निंदा शुरू हो गई है तो अब मायावती सफाई दे रही हैं कि ये उनके समर्थक नहीं हैं, बल्कि विरोध प्रदर्शन में कोई असामाजिक तत्व शामिल हो गए थे। अब यह समझना होगा कि बसपा के विरोध प्रदर्शन में माइक किसके हाथ में था। माइक पर नारे लगनेवाले क्या बसपा समर्थक नहीं थे। यदि वे बसपा समर्थक हैं, तो क्या वे असामाजिक तत्व नहीं हैं?

देश का दुर्भाग्य है कि दलित समाज को ढाल बनाकर भारत की राजनीतिक पार्टियां अपना स्वार्थ साधते हैं। उसमें भी दलित समाज की एकमेव हितैषी होने का दावा करनेवाली बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती की सियासत जग जाहिर है। फरवरी में राज्य सभा में एक बहस के दौरान तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी ने विवशतावश भावावेश में आकर कह दिया था कि हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला पर उनके जवाब से यदि वे (मायावती) संतुष्ट नहीं होती है तो वह (स्मृति) अपना सिर कलम करके मायावती के चरणों में रख देंगी। इसपर मायावती ने राजनीतिक पैंतरा आजमाया और स्मृति ईरानी के जवाबों से असंतोष जाहिर कर दिया। मायावती ने कह दिया, “मैं उनके (स्मृति) जवाब से सहमत नहीं हूं। उन्होंने कहा था कि असंतुष्टि‍ होने पर वह अपना सिर कलम करके मेरे सामने डाल देंगी। मैं सहमत नहीं हूं, अब सिर कलम करके हमारे चरणों में डाल दो।”  यह घटना बताती है कि मायावती अपनी सियासत साधने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है।

मायावती की दलित आधारित माया का असर तो राजनीति पर हमेशा हावी रहता है। ये और बात है कि विभिन्न राजनीतिक दल के नेताओं ने स्मृति ईरानी के सन्दर्भ में अनेकों बार गंदी बात की, पर इसपर कोई बवाल नहीं मचता। यहां यह सोचनेवाली बात है कि सवर्णों के द्वारा गंदी बात और दलितों के द्वारा गंदी बात में फर्क सिर्फ इतना है कि दलितों के प्रति राजनीतिक संवेदना बरसती है और सवर्णों की सुध कोई नहीं लेता।

लेकिन दयाशंकर सिंह की धर्मपत्नी स्वाति सिंह ने मायावती और उसके समर्थकों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। स्वाति ने कहा कि विरोध प्रदर्शन के दौरान बीएसपी नेता मुझे और मेरी बेटी को गाली दे रहे थे। मायावतीजी ऐसे नेताओं को क्यों नहीं हटा रही हैं? मेरी बेटी को बेवजह इसमें घसीटा जा रहा है। वह दिमाग़ी तौर पर काफ़ी परेशान हो गई है। स्वाति ने कहा कि पब्लिक में एक नाबालिग लड़की को पेश करने का नारा लगाना क्राइम नहीं है? अब दयाशंकर की मां और पत्नी ने मायावती, नसीमुद्दीन सिद्दीकी के खिलाफ हजरतगंज थाने में एफआईआर दर्ज करवाई है। भाजपा की प्रदेश ईकाई की महिला कार्यकर्ताओं ने स्वाति सिंह के समर्थन में प्रदर्शन भी शुरू कर दिया है। ऐसे में कहा जा सकता है कि जातिगत राजनीति उत्तर प्रदेश की सियासत पर फिर सवार हो रही है।

गंदी बात, गंदी जुबान, गंदी सियासत और जातिगत विद्वेष को आधार बनाकर सियासत हासिल करने की चाल देश के लिए ठीक नहीं है। स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) समाज में व्याप्त जातिगत विद्वेष को समाप्त करने के लिए ‘सबका साथ सबका विकास’ और सामाजिक समरसता का सन्देश अपने संबोधनों में करते आ रहे हैं। पर देश के विपक्षी दलों और सत्ता पक्ष के कुछ नेता प्रधानमंत्री और संघ के सामाजिक समरसता के सन्देश का बंटाधार करने में कोई मौका नहीं गंवा रहे। इस समय संसद का सत्र चल रहा है, जनहित से जुड़े पचासों बिल लटके पड़े हैं। और हर संसद सत्र के बीच जातिगत दलित राजनीति, कथित सेकुलरवाद और अभिव्यक्ति स्वतंत्रता के नाम पर भारत और सुरक्षा बलों के खिलाफ जहर उगलनेवाले नेताओं की आवाज सुनाई देती है। ऐसे में देश के विकास और सामजिक सौहार्द्र के कार्यों पर पानी फिर जाता है। पता नहीं, देश के बड़बोले और गंदी राजनीति करनेवाले नेताओं को सदबुद्धि कब आएगी?