कश्मीर पर संसद के दोनों सदनों में हुई बहस से निश्चय ही देश को इस मामले में संतोष हुआ होगा कि सरकार एवं विपक्ष दोनों के स्वर लगभग समान थे। हालांकि विपक्ष के कुछ नेताओं ने सुरक्षा बलों की कथित ज्यादती का मुद्दा उठाया लेकिन कुल मिलाकर सबका कहना था कि हमें एक स्वर से संदेश देना चाहिए। इसके एक दिन पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि कश्मीर पर सभी दलों के एक सुर में बोलने से दुनिया में सही संदेश गया है। वास्तव में हिज्बुल आतंकवादी बुरहान वानी और उसके दो साथियों के मारे जाने के बाद अलगाववादियों ने कश्मीर में जैसी उत्तेजना पैदा की उसके विरुद्ध हमने लंबे समय बाद इस तरह की राष्ट्रीय एकता देखी है। कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों, मीडिया के बड़े चेहरों तथा चिन्हित सक्रियतावादियों को छोड़ दें तो कश्मीरी अलगाववादियों के पक्ष में ऐसा कोई बयान सामने नहीं आया जैसा आम तौर पर आ जाता था। इससे यह साबित होता है कि कश्मीर में जारी आतंकवाद और अलगाववाद पर देश का मनोविज्ञान बदल रहा है। ऐसा नहीं है कि राजनीतिक दलों में सरकार की नीतियों के आलोचक नहीं है या उन्होंने आलोचना नहीं की या आगे नहीं करेंगे, लेकिन वह आलोचना ऐसी नहीं थी या है या होगी जिनसे कश्मीर को लेकर भारत में राजनीतिक दलों के बीच अनेकता का संदेश जाए। सरकार की नीतियों की आलोचना करना, उसे संकट से निपटने में सफल न बताना एक बात है और कश्मीर समस्या पर विरोधी मत प्रकट करना दूसरी बात।

ऐसे समय जब पाकिस्तान ने बुरहान वानी की मौत के बाद इसे अंतरराष्ट्रीय मंच तक ले जाने तथा घाटी के अंदर हिंसा, अराजकता और अस्थिरता पैदा करने की पूरी कोशिश की है ऐसी एकता अपरिहार्य है। आप देखिए न किस तरह पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने देर रात बयान जारी कर बुरहान वानी को शहीद और कश्मीर का नेता बताया तथा भारत को मानवाधिकार की रक्षा की नसीहत दी। यह क्या था? आतंकवादियों एवं अलगाववादियों दोनों को संदेश था कि आप लड़ाई लड़ें पाकिस्तान आपके साथ है। उसके बाद पाकिस्तान का हर कदम इसी दिशा में था। उसने हमारे इस्लामाबाद स्थित उच्चायुक्त को विदेश मंत्रालय में तलब कर कश्मीर में हिसा रोकने के लिए कहा। यह अतिवादी और आपत्तिजनक कदम था। फिर वहां के विदेश सचिव ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पाचं सदस्य देशों के राजदूतों को अपने दृष्टिकोण से कश्मीर की स्थिति पर जानकारी दी। यही नहीं संयुक्त राष्ट्रसंघ में कश्मीर की दूत मलीहा लोदी ने मामला उठा दिया। नवाज शरीफ ने इस पर कैबिनेट की बैठक बुलाई और काला दिवस मनाने का आह्वान किया। एक ओर पाकिस्तान हर हाल में कश्मीर में आग लगाने की नीति पर चल रहा है उसमें यदि भारत में अलग-अलग स्वर में आवाज आते तो विश्व समुदाय के बीच गलत संदेश जाता एवं इससे भारत का पक्ष कमजोर होता।  

हालांकि हमारे देश में कुछ स्वनामधन्य पत्रकारों एवं बुद्धिजीवियों ने अपनी हरकतें पहले की तरह ही जारी रखीं। किसी ने कहा कि बुरहान तो केवल सोशल मीडिया पर सक्रिय था और उसका हिंसा में कोई योगदान नहीं था। किसी ने सुरक्षा बलों पर ही दोषारोपण कर दिया कि बुरहान को जिन्दा पकड़ा जा सकता थे, उसे निकट से गोली मारी गई। किसी ने पोस्टर ब्वॉय कहने पर अपने ट्विट में उसकी तुलना भगत सिंह से ही कर दी। सुरक्षा बलों पर हमलों के जवाब में कार्रवाई से घायल हुए लोगों की गाथाओं को चैनल पर चलाया गया। जेएनयू में देशद्रोह के आरोपी उमर खालिद ने तो उसकी तुलना क्रांतिकारी चे ग्वेरा तक से कर दी। किंतु इस बार इनको कहीं से समर्थन नहीं मिला। विदेश राज्य मंत्री वी.के. सिंह ने जब ऐसे लोगों को देशद्रोही करार दिया तो उसे जनता का व्यापक समर्थन मिला है। वीके सिंह ने भारतीय सेना द्वारा बुरहान पर की गई कार्रवाई को सही ठहराते हुए कहा कि भारतीय सेना ने उसे मार गिराया और हमें गर्व है अपनी सेना पर। वास्तव में इस बार का माहौल बिल्कुल अलग दिखा है। वी.के. सिंह ने यह पूछा कि जब कश्मीर में बाढ़ आई थी, बुरहान वानी ने कितने कश्मीरियों को बचाया था? जिस भारतीय सेना ने डूबते हुए कश्मीर को एक नयी सांस दी थी, बुरहान वानी उसी भारतीय सेना के विरुद्ध हमलों के लिए युवाओं को उकसाता था। क्या ये हमारे शहीद हैं? आप देख लीजिए सोशल मीडिया पर वी.के. सिंह की पंक्तियां छाईं हुईं हैं और बुराहन वानी के बचाव करने वाले कुछ उंगलियों पर गिने जानेवालों की निंदा हो रहीं हैं, उनको गालियां पड़ रहीं हैं।

हर समर्थन के साथ सरकार की जिम्मेवारी भी बढ़ जाती है। हम यह तो मानते हैं कि एकता का स्वर निकालने के लिए केन्द्र सरकार ने पहल की। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब विदेश में थे तो उनके निर्देश पर गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने ज्यादातर दलों के नेताओं से इस पर बातचीत की। उसमें उन्होंने नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला से भी एक स्वर में बोलने का आग्रह किया। उसके पहले उमर का ट्विट ऐसा था जिसमें न आतंकवादियों की आलोचना थी न समर्थन था। वह वोट की चिंता करनेवाले ऐसे नेता का ट्विट था जो पूरा सच कहने से बच रहा था। राजनाथ सिंह से बातचीत के बात कम से कम उनका उस तरह का ट्विट नहीं आया। तो यहां तक केन्द्र सरकार को सफलता मिली और यह देश की सफलता है। किंतु इसके आगे क्या? जनरल वी.के. सिंह ने कश्मीर के लोगों से हिंसा की जंजीरों से, भीड़ से बाहर निकलकर भारत की महागाथा का हिस्सा बनने का आह्वान किया। उनका बयान देखिए,

“हमारी सहायता करिए कि हम आपकी सहायता कर सकें। सम्पूर्ण विश्व भारत का लोहा मान रहा है, और जानता है कि भविष्य में भारत का अति विशेष स्थान है। क्या आप इस महागाथा का भाग बनेंगें? मेरी विनती है- भीड़ से निकलिए, अपना भविष्य स्वयं निर्धारित करिए।”
 

केवल कहने से ऐसा होने नहीं जा रहा। इसके लिए तो वहां कई स्तरों पर काम करने की आवश्यकता है। 

काम करने के लिए सरकार को देश के वातावरण और सामूहिक आंकाक्षा को तो समझना ही होगा, उसे कश्मीर की मंशा एव रणनीति को भी पूरी तरह समझ लेने की आवश्यकता है। इस समय जो वातावरण निर्मित हुआ है उसीका परिणाम है कि पाकिस्तान को इस बार भारत की ओर से उद्धृत करने के लिए कुछ नहीं मिल रहा है। वस्तुतः पाकिस्तान की नीति कश्मीर को हर हाल में 1990 के दशक में ले जाने की है और चूंकि सेना और आईएसआई इस पर अमल कर रही है इसलिए नवाज शरीफ के लिए भी इसका अनुसरण करना विवशता है। ऐसे में भारत से हर हाल में एक स्वर निकलना समय की मांग है। वह स्वर आतंकवादियों के समर्थन में नहीं हो सकता। वह स्वर अलगाववादियों के प्रति सहानुभूति का भी नहीं हो सकता। वह स्वर अगर हो सकता है तो आतंकवादियों को उनकी भाषा में यानी हिंसा की शक्ति से जवाब देने का और यही देश के बहुमत की सोच है। वह स्वर यदि हो सकता है तो अलगाववादियों के साथ सख्ती से निपटने का। भारत की यह सामूहिक चाहत है। वह स्वर यदि हो सकता है तो आतंकवादियों का समर्थन करनेवालों के साथ किसी प्रकार की नरमी न बरतने का, और अलगावादियों के आह्वान पर सड़कों पर उतरकर हिंसा करनेवालों के साथ रक्त और लौह की नीति से निपटने का। कश्मीर पर बनी सामूहिक एकता से साफ हो गया है कि अगर सरकार ऐसा करती है तो उसे पूरे देश का समर्थन मिलेगा।

तो यह केन्द्र की जिम्मेवारी है कि वह लोगों की आकांक्षाओं के अनुरूप भूमिका निभाएं। अगर वह ही भूमिका में कमजोर पड़ जाएगी या लचर नीतियां अपनाएगी तो फिर यह एकता व्यर्थ चली जाएगी। इसके परिणामस्वरूप भारत में रहते हुए भारत विरोध का स्वर अलापने वाले या सरकार की आलोचना के नाम पर देश की आलोचना करनेवालों या देश के खिलाफ जाने वालों का हौंसला बढ़ सकता है। यह एकता भी टूट सकती है। जाहिर है इस एकता को दायित्वों के निर्वहन से सुदृढ़ करना होगा। वह दायित्व यह है कि आतंकवादी, अलगाववादी और उनके समर्थकों की कमर तोड़ दी जाए। वे हर हाल में परास्त हों, उनके अंदर ऐसा भय पैदा हो जाए कि अगर हमने भारत के खिलाफ कुछ किया तो हमारी खैर नहीं। क्या सरकार ऐसा कर पाएगी?  यह ऐसा प्रश्न है जिसके उत्तर के लिए हमें समय की प्रतीक्षा करनी होगी।