भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर नरेन्द्र मोदी सरकार जब यह कहती है कि हम दुनिया की सबसे तेज बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था हैं तो विरोधी कई आंकड़ों से उसे काटने की कोशिश करते हैं। कुछ अर्थशास्त्री भी इस पर प्रश्न उठा देते हैं। कुल मिलाकर इस समय देश में भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर दो पक्ष है। एक पक्ष वाकई यह मानता है कि मोदी सरकार ने विरासत में मिली लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को संभाला है और यह इस समय दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं में सुस्ती के बावजूद गतिशीलता की पटरी पर है। नरेन्द्र मोदी तो अपने ज्यादातर भाषणों में यह चर्चा करते ही है कि भारत को हमने दुनिया की सबसे तीव्र गति से विकास करने वाली अर्थव्यवस्था बना दिया है और इसकी चारों ओर प्रशंसा हो रही है। तो सच क्या है? क्या सरकार केवल दावा करती है और सच कुछ दूसरा है? या उसके दावे में सच्चाई है?

कुछ समय पहले अमेरिका में भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने यह कह दिया था कि हम अंधों में काना राजा जैसे हैं। यानी जब दुनिया की अर्थव्यवस्था संघर्ष कर रही है, तेज विकास के सारे यत्न विफल हो रहे हैं उसमें भारत की सामान्य विकास दर सबसे तेज बन गई है। इसकी व्याख्या हम अपने तरीके से कर सकते हैं। किंतु इसमें भी यह सच्चाई तो है कि भारत की अर्थव्यवस्था वाकई वर्तमान दुनिया में सबसे तेज गति से दौड़ लगा रही है। भले वह उतनी तेज न हो जितनी की होनी चाहिए, लेकिन है। हमारे सामने आंकड़ें भी इसे सत्यापित करने के लिए उपस्थित है। अब इसमें कोई दो राय नहीं कि देश की विकास दर 2015-16 में 7.6 प्रतिशत रही है। 2015-16 वर्ष की जो आखिरी तिमाही थी उसमें विकास दर 7.9 प्रतिशत रही। इसका अर्थ यह हुआ कि 2016-17 में विकास दर 2015-16 के मुकाबले ज्यादा तेज होगा। अंतिम तिमाही की तीव्रता का तो यही संकेत है। ध्यान रखिए कि वित्त वर्ष 2014-15 में विकास दर 7.2 प्रतिशत रही थी। तो यह सतत वृद्धि या तीव्र गति को दर्शाता है। 2015-16 की तीसरी तिमाही में विकास दर 7.2 प्रतिशत ही थी।

ध्यान रखिए यह आर्थिक गति अनुमान से ज्यादा है। वर्तमान विकास दर की वृद्वि में विनिर्माण, उर्जा और खनन क्षेत्र की सबसे बड़ी भूमिका रही। विनिर्माण क्षेत्र में विकास दर 9.3 प्रतिशत रही। हालांकि इसका अनुमान 9.5 प्रतिशत का लगाया गया था जिसे स्पर्श नहीं किया जा सका किंतु यदि संप्रग सरकार में विनिर्माण के पीछे भागने की दशा को देखें तो यह विकास दर वाकई संतुष्ट करता है। खनन क्षेत्र में विकास दर 7.4 प्रतिशत रही। यह अनुमान से ज्यादा है। खनन क्षेत्र का विकास दर  6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया था। विनिर्माण वाली बात समग्र औद्योगिक विकास के संदर्भ में भी कही जा सकती है जो वित्त वर्ष 2016 में 2.4 प्रतिशत रहा है। अप्रैल में देश के 8 प्रमुख उद्योगों (कोर इंडस्ट्री) में उत्पादन 8.5 प्रतिशत बढ़ा है। ध्यान रखिए मार्च में इसकी वृद्वि दर केवल 6.4 प्रतिशत रही थी। हम जानते हैं कि तमाम उद्योगों में प्रमुख उद्योगों की हिस्सेदारी करीब 38 प्रतिशत है। इसमें इस तरह की वृद्वि और बेहतर औद्योगिक विकास की निश्चयात्मक उम्मीद पैदा करती है। कृषि, फिशिंग सेक्टर में 1.2 प्रतिशत की विकास रही है।

दुनिया में सबसे तेजी से विकास करने वाले देश के रुप में चीन को माना जाता था। लेकिन भारत की विकास दर के इन आंकड़ों में चीन हमसे पिछड़ गया है और यह एक बड़ी उपलब्धि है। 2015-16 की चौथी तिमाही के दौरान चीन की विकास दर 6.7 प्रतिशत रही। यह पिछले 7 साल में सबसे कम विकास दर है। चीन की विकास दर कैलेंडर वर्ष 2015 की आखिरी तिमाही में भी 6.8 प्रतिशत ही दर्ज की गई थी, जो 2009 के बाद सबसे कम है। दुनिया भारत की तुलना चीन से ही करती है। दोनों देशों को दुनिया के विकास का ईंजन माना जाने लगा है। उसमें यदि हमने चीन से बेहतर प्रदर्शन किया है तो फिर सरकार के दावों को गलत साबित करना उचित नहीं है। इस समय तक ऐसी कोई नकारात्मक पहलू सामने नहीं है जिनके आधार पर हम यह कह सकें कि आगे विकास दर नीचे आ सकता है। इसके उलट आगे मांग भी बढ़ने की संभावना है। ऐसे में इस बात की गुंजाइश बढ़ रही है कि जल्द निजी क्षेत्र के कैपेक्स यानी बाजार पूंजीकरण में रिकवरी आएगी। दरअसल, तीसरी तिमाही से कृषि क्षेत्र का सकारात्मक असर पड़ेगा। लगातार दो साल सूखे के बाद इस बार अच्छे मॉनसून की भविष्यवाणी की बदौलत कृषि क्षेत्र अच्छा प्रदर्शन कर सकता है। निरंतर दो वर्ष तक सूखा पड़ने के कारण कृषि वृद्धि वित्त वर्ष 2015-16 में 1.2 प्रतिशत रही जबकि 2014-15 में कृषि उत्पाद 0.25 प्रतिशत घटा था। कृषि के अच्छा प्रदर्शन का मतलब है गांवों के लोगों की क्रय शक्ति में वृद्वि। उनकी जेब में धन आने का मतलब है बाजार मेे उद्योग और सेवा, दोनों में मांग तेज होना। जब मांग तेज होगी तो फिर आर्थिक विकास की गति और तेज होगी।

विकास का असर देश की कुल अर्थव्यवस्था तथा प्रति व्यक्ति आय पर पड़ता है। तो यह देखें कि प्रति व्यक्ति आय में भारत की क्या स्थिति है? क्या इसमें बढ़ोत्तरी हुई है? वास्तव में जिस दौरान के आंकड़े हम दे रहे हैं उस दौरान वास्तविक प्रति व्यक्ति आय भी 6.2 प्रतिशत बढ़कर 77,435 रुपये हो गई। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा राष्ट्रीय आय पर जारी आंकड़े के अनुसार 2015-16 में देश का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 113.50 लाख करोड़ रुपये रहा, जो एक साल पहले यानी 2014-15 में 105.52 लाख करोड़ रुपये था। यानी कुल अर्थव्यवस्था में भी करीब 8 लाख करोड़ रुपए की बढ़ोत्तरी हुई है। अगर विकास ही नहीं होता तो यह बढ़ोत्तरी कहां से होती? प्रति व्यक्ति आय कहां से बढ़ता? भारतीय रिजर्व बैंक के संदर्भ मूल्य 67.20 रुपये प्रति डॉलर के मुताबिक, कुल अर्थव्यवस्था का मूल्य 1,690 अरब डॉलर है। जब सारे आंकड़े सरकार के दावों की पुष्टि ही कर रहे हैं तो फिर उस पर प्रश्न उठाने का कोई मतलब नहीं है। हमंे उस पर विश्वास करना ही चाहिए।

फिक्की ने हाल में जो सर्वेक्षण प्रकाशत किया है उसके अनुसार 2016-17 में कृषि क्षेत्र की औसत विकास दर 2.8 प्रतिशत रहने की उम्मीद है। इसके अनुसार यह न्यूनतम 1.6 प्रतिशत और अधिकतम 3.5 प्रतिशत रह सकती है। इस दौरान औद्योगिक विकास दर 7.1 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है। सेवा क्षेत्र की विकास दर को 9.6 प्रतिशत रहने के अनुमान लगाए गए हैं।  यह सर्वे अप्रैल/मई 2016 के दौरान किया गया, जिसमें उद्योग, बैंकिंग और वित्तीय सेवा के अर्थशास्त्रियों को शामिल किया गया। इन्हें 2016-17 के साथ पहली तिमाही और बीते वित्त वर्ष की चौथी तिमाही के प्रमुख मैक्रो-इकोनॉमिक वैरिएबल के लिए अनुमान जाहिर करने को कहा गया था। फिक्की के अलावा क्रेडिट सुइस ने भी भारतीय अर्थव्यवस्था पर रिपोर्ट जारी की है। स्विट्जरलैंड की इस प्रमुख वित्तीय कंपनी ने उम्मीद जताई है कि चालू वित्त वर्ष में भारत की आर्थिक विकास दर 7.8 प्रतिशत रहेगी। यह विकास दर भारत सरकार के अनुमान के आसपास ही है। सुइस का मानना है कि कृषि और निजी उपभोग में सुधार की संभावना के चलते ऐसा होगा। यानी लोगों की खरीद शक्ति बढ़ेगी और वो ज्यादा उपभोग करेंगे जिससे मांग बढ़ेगी और इसके साथ हर क्षेत्र का उत्पादन।

क्रेडिट सुइस इस प्रकार का अनुमान लगाने वाला अकेला नहीं है। ज्यादतर रेटिंग एजेंसियों और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं का आकलन ऐसा ही है। हम यह तो नहीं कह सकते कि मोदी सरकार ने सारी संस्थाओं को प्रभावित कर लिया है ताकि वे भारत के बेहतर आर्थिक विकास दर की भविष्यवाणी कर सकें। सिंगापुर के पूर्व प्रधानमंत्री गोह चोक टोंग ने हाल के एक बयान में कहा है कि वैश्विक सुस्ती की चिंताओं के बीच भारत एक आशा की किरण है। गोह चोक टोंग का सम्मान दुनिया भर में है। उन्होंने कहा है कि भारत में अगले 10 साल तक वैश्विक अर्थव्यवस्था की गाड़ी को आगे खींचने की क्षमता मौजूद है। उनके अनुसार अर्थव्यवस्था की सुस्ती दूर करने में भारत इस समय उसी स्थिति में है जहां चीन 10 साल पहले था। तो दुनिया हमें इस समय चीन के स्थान पर मान रही है। इसमें नकारत्मकता खोजने की बजाय पूरे देश को एकजुट होकर विकास का हाथ बनने की कोशिश करनी चाहिए।