(श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष)

मृत्यु के साए में जन्म लेनेवाले श्री कृष्ण का जीवन हमेशा संकटों और चुनौतियों से भरा था।  एक ओर कृष्ण की उपस्थिति उनके सखाओं और परिवारजनों को निर्भयता और आनंद प्रदान करता है, वहीं कंस द्वारा बालक कृष्ण को समाप्त करने की जिद्द में भेजे जानेवाले राक्षसों से वे भयभीत होते हैं। भय कितना ही अधिक क्यों न हो, पर कृष्ण की एक छोटी सी मुस्कान एक क्षण में डर के साए को समाप्त कर देती है। इतना ही नहीं तो कृष्ण मुस्कुराते हुए अपने पराक्रम से राक्षस रूपी संकटों को परास्त कर देते हैं। श्री कृष्ण की यही विशेषता है कि संकट कितना ही विकराल क्यों न हो, उसका सामना वे मुस्कुराते हुए करते हैं और उसपर सदा विजयी होते हैं। यही कारण है कि आज भी अपने परिवार में आनंद का वातावरण बनाने और जीवन को निर्भयता की शक्ति से पूर्ण बनाने के लिए भारतीय समाज अपने घरों में श्री कृष्ण की मूर्ति या चित्र को बड़ी श्रद्धा से स्थापित करता है।

कृष्ण की विविध छवि का प्रभाव  

कृष्ण की बाल छवि जहां हृदय को आनंदित करता है, वहीं उनका बंसीधर रूप युवा जीवन को मधुर बनाने का सन्देश देता है। एक ओर गाय चरानेवाले गोपाल कृष्ण का चित्र गोमाता के प्रति प्रेम को उद्धाटित करते हुए गौरक्षा का आदर्श स्थापित करता है, वहीं दूसरी ओर सुदर्शन चक्रधारी रूप दुर्जनों के नाश के लिए अपनी प्रतिबद्धता दर्शाता है। और रणक्षेत्र में अर्जुन को गीतोपदेश देते श्री कृष्ण के गुरुरूपी छवि की महिमा तो अवर्णनीय है। इसलिए श्री कृष्ण ऐसे भगवान हैं जिन्हें अनेक रूपों में स्मरण किया जाता है।

आज भी श्री कृष्ण भारत के प्रत्येक घर में बाल रूप में अवतरित है, ऐसा समाज अनुभव करता है। यही कारण है कि व्यक्ति जिस जाति, सम्प्रदाय, प्रदेश या भाषा बोलनेवाला हो, वह अपने बच्चे को एक बार कृष्ण के रूप में अवश्य सजाता है। अपने जन्म से ही अपनी जन्मदात्री माता देवकी को अनेक वर्षों तक विरह देनेवाले कृष्ण आज भी न जानें कितनी ही माताओं के मन में विराजमान हैं!

कृष्ण चरित्र सबको लुभाता है। महर्षि व्यास ने अपनी महान रचना ‘महाभारत’ में जो महान चरित्र-चित्रण किया है उनमें प्रमुख स्थान भगवान श्रीकृष्ण का है। ऐसा लगता है कि बाकी सब चरित्र उनका सहारा लेकर खड़े हैं। कृष्ण का जीवन दैवीय गुणों से युक्त है। वे अपने पौरुष, पराक्रम, आत्मीयता और प्रेम से सबका हृदय जीत लेते हैं। कृष्ण ने माता यशोदा के मन को उत्साहित किया। वे घुटनों के बल चले, बाल हठ किया, बालसुलभ रोटमानी की, माता के द्वारा उन्होंने डांट खाई, उनको सजा मिली, मार भी पड़ी। कृष्ण के कारण कई बार मृत्यु और जीवन के बीच झूलते हुए माता यशोदा को वेदनाएं भी सहनी पड़ी। परन्तु यशोदा इस प्यारे से कृष्ण से सदा सुख का ही अनुभव करती रही। उनके ग्वाले मित्र, उनके खेल, उनकी माखन चोरी, गोपियों के साथ स्नेह, क्या नहीं था उस यौवनोन्मुख कृष्ण में? एक तरफ कंस व शिशुपाल उससे दुश्मनी रखते थे तो ग्वाल और गोपियां उस पर प्राण न्योछावर करते थे। गायें उसके वात्सल्य स्पर्श से सुख का अनुभव करती थीं, वहां दूध-दही की नदियां बहा करती थी।

शुद्ध सात्विक प्रेम का आदर्श    

श्री कृष्ण की मुरली के मधुर धून में ऐसा जादू था कि गोपियां कृष्ण की ही दिवानी हो गईं। गोपियों का कृष्णप्रेम कभी स्वैराचार में परिवर्तन नहीं हुआ, यह कृष्ण के प्रति शुद्ध सात्विक प्रेम का ही प्रतीक है। समुद्र में ज्वार उठता है और फिर वे लहरें स्वयं पीछे हो जाती हैं वैसा ही यह आकर्षण था। कृष्ण से निकलकर वापस कृष्ण में ही समा जाता था। अत्यन्त मृदु, परन्तु उतना ही दृढ़ स्नेह था उनका। इस प्रीति का सर्वोत्कृष्ट प्रतीक थीं- राधा।

भारतीय संस्कृति में राधा-कृष्ण के प्रेम को श्रेष्ठतम माना गया है। राधा-कृष्ण की प्रीति का वसंत एक बार ही आया, परन्तु वह भारत के जनमानस में चिरकाल के लिए स्मरणीय हो गया। राधा-कृष्ण की प्रीति के कारण भारतीय प्रेम-कथा में कोमलता आई, वह कभी मुरझाई नहीं। प्रीति की परिपूर्णता के लिए चिर तारुण्य अपेक्षित होता है। यही दिखाने हेतु इस आदर्श प्रेमी ने स्वयं को विरह में बांध लिया। भगवान श्री राम की तरह कृष्ण ने कभी राधा के लिए विलाप नहीं किया। ऐसा यह नाजुक, अति कोमल प्रेम को उन्होंने अपने हृदय के अंतरतम में सदा के लिए छिपा दिया। श्री राम तो मर्यादा पुरुषोत्तम थे पर कृष्ण तो सभी बातों में सीमा पार करनेवाले थे। उनके प्रत्येक कार्य में परिपूर्णता का दर्शन होता है। अद्भुत और अद्वितीय सौन्दर्य से पूर्ण श्री कृष्ण की मनोहारी छवि थी। उन्होंने समाज में नवीन चैतन्य का जागरण किया। बचपन में वे जी-जान से खेलते थे। चोरी को भी उन्होंने रमणीयत्व प्रदान किया। कृष्ण ने सारा जीवन बड़ी मस्ती से, बड़े पराक्रम के साथ जिया, वहीं उनके गीताज्ञान में गम्भीरता दिखाई देती है।

कृष्ण ने जिसे स्पर्श किया वह महान हो गया। ग्वालों का एक साधारण सा वाद्य ‘बांसुरी’ को उन्होंने हाथ में धारण किया। लकड़ी के टुकडे से बने बांसुरी में उन्होंने ऐसा चैतन्य भर दिया मानो वह जिवंत हो गया। आज बांसुरी कोई भी बजाए, स्मरण तो कृष्ण का ही होता है।  बिल्कुल साधारण-सी दिखनेवाली चीज को चिरंतन कला-मूल्य देने का सामर्थ्य श्री कृष्ण में ही था। 

प्रत्येक भूमिका में निपुण

कृष्ण ‘कला’ में ऐसे निपुण थे कि एक भूमिका से दूसरी भूमिका में सहज प्रवेश कर जाते थे। उस भूमिका में वे ऐसे तन्मय होते कि पहलेवालों को सहजता से भूल जाते थे। देवकी को मातृपद देकर उसे छोड़ दिया। वही परिस्थिति नंद-यशोदा-गोप-गोपियों के साथ भी घटित हुईं। कंस-वध के पश्चात् वे मथुरा में भी नहीं रहे। मथुरा छोड़कर द्वारका चले गए। अप्रतिम योद्धा के गौरव को विसर्जित कर महाभारत युद्ध में अपने हाथों में शस्त्र धारण नहीं करने की प्रतिज्ञा ले ली और स्वयं एक दार्शनिक की भूमिका में आ गए। इस भूमिका को ग्रहण करने पर जब शस्त्र धारण करने का अवसर आया तो अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर पितामह भीष्म के सामने रथ का पहिया लेकर खड़े हो गए। इस अनासक्त योगेश्वर को समाधि लेनी चाहिए थी। परन्तु उनकी मृत्यु भी साधारण मानव जैसे वन में व्याघ्र के बाण से हुई। पुत्र, बाल-सखा, भाई, वादक, योद्धा, राजा, राजनीतिज्ञ, वक्ता, दार्शनिक इन सब भूमिकाओं में अपरम्पार ख्याति प्राप्त करने के पश्चात भी अपनी मृत्यु साधारण मानव जैसी होने में श्रीकृष्ण ने धन्यता मानी।

धर्म रक्षार्थ सदैव तत्पर

श्री कृष्ण की एक और विशेषता है कि वे सज्जनों की रक्षा के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। ‘धर्म’ उनके लिए सबसे बड़ा है। ‘धर्म’ की रक्षा के लिए यदि झूठ बोलना पड़े, अपना वचन तोड़ना पड़े, कठोर निर्णय लेना पड़े, कठोर सत्य बोलना पड़े, श्राप भुगतना पड़े, यहां तक कि किसी की हत्या या बलिदान देना पड़े, वे हर विषम परिस्थिति में ‘धर्म’ की रक्षा के लिए तैयार रहते हैं। कुरुक्षेत्र में महाभारत युद्ध के पूर्व अर्जुन को संबोधित करते हुए श्री कृष्ण स्वयं कहते हैं -

“यदा-यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानम धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌॥”

अर्थात - हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूं यानी साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूं। सज्जन पुरुषों के रक्षार्थ और पाप कर्म करनेवालों के विनाश के लिए तथा धर्म की स्थापना के लिए हर युग में प्रकट होता हूं।

अनासक्त श्री कृष्ण

कृष्ण का जीवन सामान्य व्यक्ति जैसा ही था- यह सत्य है, लेकिन उससे भी परे जाकर सामान्य व्यक्ति की नियति में नमक जैसा अपना गुण देने में वे निपुण थे। छोटे बच्चे, पशु-पक्षी, अशिक्षित, छोटे-बड़े, स्त्री-पुरुष सभी को उन्होंने समभाव से स्वीकार किया। वे उनमें से ही एक बनकर रहे परन्तु जब उनको छोड़ना आवश्यक हुआ तो उनको ऐसा छोड़ा कि कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने गृहस्थाश्रम में प्रवेश किया तो पूरी तरह गृहस्थ का जीवन जीया। वंश-विस्तार नहीं किया। अपने बच्चों की अकाल मृत्यु को भी उन्होंने चुपचाप सहा और उन अष्ट रानियों के साथ रहकर भी वे अकेले रहे, अनासक्त रहे। मेघ जिस प्रकार रिक्त होते हैं वैसे ही वे रिक्त हुए। परन्तु फिर भी कृष्ण का जीवन इतना उदात्त है कि उनकी महिमा का वर्णन करते बड़े-बड़े विद्वान करते नहीं अघाते। इसलिए रसखान ने ठीक ही कहा है-

सेस गनेस महेस दिनेस, सुरेसहु जाहि निरंतर गावै।

जाहि अनादि अनंत अखण्ड, अछेद अभेद सुबेद बतावैं॥

नारद से सुक व्यास रहे, पचिहारे तू पुनि पार न पावैं।

ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं॥