(3 अगस्त, जयंती पर विशेष)

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रकवि मथिलीशरण गुप्त की लेखनी का बड़ा योगदान है। देश में राष्ट्रीय चेतना की लहर को जन मन में संचरित करने का महान कार्य उनकी लेखनी ने किया। गुप्तजी की कविताओं और उनके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर महात्मा गांधी ने उन्हें 1932 में ‘राष्ट्रकवि’ की संज्ञा दी थी। मैथिलीशरण गुप्त की महान रचना “भारत-भारती” जहां भारत के गौरवमयी इतिहास का दर्शन कराती है, वहीं तत्कालीन भारत दुर्दशा के साथ ही उसके कारणों से समाज को अवगत कराती है। यही नहीं भारत के उज्जवल भविष्य के लिए गुप्तजी भगवान से प्रार्थना करते हैं। उन्होंने लिखा, -

इस देश को हे दीनबन्धो! आप फिर अपनाइए,

भगवान्! भारतवर्ष को फिर पुण्य-भूमि बनाइए,

जड़-तुल्य जीवन आज इसका विघ्न-बाधा पूर्ण है,

हेरम्ब! अब अवलंब देकर विघ्नहर कहलाइए।

स्वामी विवेकानन्द ने कन्याकुमारी में समुद्र के मध्य स्थित श्रीपाद शिला पर बैठकर भारत का ध्यान किया था। उन्होंने अपने ध्यान में भारत के गौरवशाली अतीत और वर्तमान की दयनीय परिस्थिति का अवलोकन किया तथा भारत के उज्जवल भविष्य के लिए चिंतन किया था। मैथिलीशरण गुप्त की “भारत-भारती” स्वामी विवेकानन्द के ध्यानस्थ चिंतन को प्रगट करती है। उन्होंने भारत-भारती में कहा, -  

हम कौन थे, क्या हो गए और क्या होंगे अभी?

आओ विचारें आज मिलकर, ये समस्याएं सभी।।

भारत दर्शन की काव्यात्मक प्रस्तुति के रूप में ‘भारत-भारती’ निश्चित ही एक शोध से परिपूर्ण रचना है। मैथिलीशरण गुप्तजी ने इसके माध्यम से स्वदेश प्रेम को दर्शाते हुए वर्तमान और भावी दुर्दशा से उबरने के लिए समाधान खोजने का गंभीर प्रयत्न किया है। भारतीय जनमानस के अंतःकरण को झकझोरते हुए गुप्तजी ने लिखा, -

जो भरा नहीं है भावों से जिसमें बहती रसधार नहीं।

वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।।

भारत के भूत, वर्तमान और भविष्य को केवल ‘एक पंक्ति’ में कहनेवाले राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का जन्म 3 अगस्त, 1886 को चिरगांव (झांसी) में हुआ। उनके पिता का नाम सेठ रामचरण कनकने और माता का नाम कौशल्याबाई था। उन्होंने घर पर ही हिन्दी, संस्कृत और बांग्ला साहित्य का अध्ययन किया। मात्र 12 वर्ष की आयु से उन्होंने ब्रजभाषा में कविताएं करना शुरू कर दिया था। उस समय के महान भाषाविद पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदीजी के साहित्यिक दृष्टिकोण को सबसे अधिक मान्यता थी। द्विवेदीजी ने हिंदी भाषा और उसकी काव्य शैली में आमूलाग्र सुधारात्मक परिवर्तन की पहल की। ब्रज, मैथिलि और अवधि जैसी परंपरागत साहित्यिक भाषा के स्थान पर शुद्ध खड़ी बोली में लिखने की प्रेरणा दी। द्विवेदीजी के संपर्क में आने के बाद उन्हीं की प्रेरणा से गुप्तजी ने खड़ी बोली को अपनी रचनाओं का माध्यम बनाया। गुप्तजी खड़ी बोली के प्रथम महत्त्वपूर्ण कवि हैं। खड़ी बोली को काव्य-भाषा के रूप में मान्यता दिलाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। बाद के कवियों ने भी गुप्तजी का अनुकरण करते हुए खड़ी बोली में कविताएं लिखना प्रारंभ किया, इसी कारण मैथिलीशरण गुप्त को साहित्य जगत में ‘दद्दा’ नाम से सम्बोधित किया जाता था। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के अनुसार, गुप्तजी के काव्य से भारत की प्राचीन संस्कृति को एक बार फिर से तरुणावस्था मिली है।   

हिन्दी को काव्य की भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। परंपरा, नैतिकता, पवित्रता और मानवीय मूल्यों की रक्षा आदि गुप्तजी की कविताओं के प्रमुख गुण रहे। पंचवटी, जयद्रथ वध, साकेत और यशोधरा आदि उनकी सभी रचनाओं में उनकी ये विशेषताएं मुखर रूप से दिखाई देती हैं। उनकी खड़ी बोली की कविताएं सबसे पहले ‘सरस्वती’ में प्रकाशित हुईं। उनका प्रथम काव्य संग्रह ‘रंग में भंग’ था। इसके बाद ‘जयद्रथ वध’ प्रकाशित हुआ। इस संग्रह से उन्हें ख्याति प्राप्त होने लगी। इसके बाद 1914 में भारत-भारती प्रकाशित हुई। राष्ट्रीय भावनाओं और स्वाभिमान से भरे इस संग्रह के कारण उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई। 1932 में यशोधरा के प्रकाशन से महात्मा गांधी उनसे बहुत अधिक प्रभावित हुए। उन्होंने गुप्तजी को राष्ट्रकवि की संज्ञा दी। 

गुप्तजी को 1952 और 1964 में दो बार राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया गया। 1953 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया। इसके बाद 1954 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें हिन्दुस्तानी अकादमी पुरस्कार, ‘साकेत’ पर ‘मंगला प्रसाद पारितोषिक’ तथा ‘साहित्य वाचस्पति’ की उपाधि से भी अलंकृत किया गया। गुप्तजी की साहित्य सेवाओं के उपलक्ष्य में आगरा विश्वविद्यालय तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने इन्हें डी. लिट. की उपाधि से विभूषित भी किया। मैथिलीशरण गुप्तजी का देहावसान 12 दिसंबर, 1964 को चिरगांव में ही हुआ। 78 वर्ष के अपने जीवनकाल में उन्होंने दो महाकाव्य, 19 खंडकाव्य, काव्यगीत और नाटिकाएं लिखीं।