पहली नजर में यह सुनकर थोड़ा धक्का लग सकता है कि 57 मुस्लिम देशों के समूह ‘ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन’ या ओआईसी यानी इस्लामिक सहयोग संगठन ने पाकिस्तान का कश्मीर मामले पर समर्थन किया है। इस्लामाबाद में इस संगठन के महासचिव इयाद बिन अमीन मदनी ने वो बातें कहीं जो पाकिस्तान कहता है या उसके अनुकूल है। मसलन, कश्मीर में मानवाधिकार का उल्लंघन भारत का आंतरिक मामला नहीं है, अंतरराष्ट्रीय समुदाय को कश्मीर मामले में दखल देना चाहिए, वहां संयुक्त राष्ट्रसंघ प्रावधान के तहत जनमत संग्रह होना चाहिए आदि आदि। पाकिस्तान के लिए पहली नजर में यह उत्साहित होने करने वाला लगता है। पाकिस्तान हाल के दिनों में कश्मीर मामले को अंतरराष्ट्रीय मामला बनाने तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समर्थन पाने की कोशिश कर रहा है। इसमें उसकी कूटनीति मुस्लिम देशों पर सबसे ज्यादा केन्द्रित है। मदनी पाकिस्तान दौरे पर आए थे और उनकी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के विदेश मामलों के सलाहकार सरताज अजीज से लंबी बातचीत हुई जिसके बाद उन्होंने वहां बयान दिया। लेकिन क्या वाकई इससे भारत को कोई परेशानी या समस्या आ सकती है?

अगर सरताज अजीज की बात मानी जाए तो उनकी मदनी से कश्मीर में मौजूदा हालात पर चर्चा हुई। उनके अनुसार सितंबर में ओआईसी में मौजूद कश्मीर ग्रुप, न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र की बैठक के दौरान इस मामले पर विचार करेगा। कह सकते हैं कि इस्लामी देशों का यह सबसे बड़ा संगठन अगर कश्मीर मामले पर भारत के खिलाफ जाता है तो इसका असर होना चाहिए। लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है। इस संगठन का जन्म 1969 में हुआ। तब से न जाने कितनी बार इस संगठन ने कश्मीर मामले पर भारत के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया है। यानी हमारे लिए इसमें हैरत की कोई बात नहीं है। यह संगठन के तौर पर ओआईसी का पुराना स्टैण्ड है। जब भारत की विश्व में कोई बड़ी हैसियत नहीं थी तब भी यह कोई प्रभाव डालने में सफल नहीं हुआ तो आज क्या होगा। वह भी ऐसी स्थिति में जब दुनिया का कोई महत्वपूर्ण देश कश्मीर मामले पर पाकिस्तान की सुनने तक को तैयार नहीं। यहां तक कि उसके सबसे करीबी चीन तक ने इस मामले में स्वयं को अलग रखने की नीति अपनाई है। पिछले अप्रैल में तुर्की में आयोजित सम्मेलन में भी ओआईसी ने कश्मीर पर भारत विरोधी रुख अपनाया गया था। भारत ने उस पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए उसे तथ्यात्मक रूप से गलत और भ्रामक बताया और कहा कि संगठन को इस तरह के बयान देने से बचना चाहिए। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने कहा कि हम भारत के आतंरिक मामलों के संबंध में इस तरह की बातों को पूरी तरह खारिज करते हैं जिस पर ओआईसी को बोलने का कोई अधिकार नहीं है। हम ओआईसी को सलाह देते हैं कि भविष्य में इस तरह के बयान देने से बचे।

जहां तक संयुक्त राष्ट्र का प्रश्न है तो वह दो टूक शब्दों में पाकिस्तान के आग्रहों पर कह चुका है कि यह भारत और पाकिस्तान के बीच का मामला है। इसका अर्थ यह हुआ कि संयुक्त राष्ट्रसंघ भी 1948 में पारित अपने प्रस्ताव को अब प्रासंगिक नहीं मानता है। जाहिर है, अगर ओआईसी औपचारिक तौर पर उससे जनमत संग्रह की मांग करता है तो उसका रुख बदल जाएगा ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है। हालांकि ओआईसी ऐसा करेगा कि नहीं यह देखना होगा क्योंकि आज तक उसने ऐसा किया नहीं है। दूसरे, ओआईसी के महासचिव ने शायद संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव को पढ़ा नहीं है। इसके अनुसार सबसे पहले पाकिस्तान को अपने कब्जे वाली भूमि को खाली करना है, उसे अपनी सेना को वापस करना है। इसके विपरीत भारत को सुरक्षा के लिए अपनी कुछ सेना को वहां रखने का अधिकार है। यानी भारत के भाग में जो कश्मीर है उससे वापस आने की शर्त इसमें नहीं है। पाकिस्तान को अपना कब्जा हटाने के बाद ही जनमत संग्रह हो सकता है। पाकिस्तान ने स्वयं इस प्रस्ताव का पिछले 68 सालों से उल्लंघन किया हुआ है। संयुक्त राष्ट्र को अपने प्रस्ताव के बारे में पता है।

इसलिए जब इयाद मदनी कहते हैं कि वहां जनमत संग्रह होना चाहिए तो उन्हें पाकिस्तान को कहना होगा कि जनमत संग्रह की जो शर्त है उसे पहले माने। उसके मानने का अर्थ कितना गंभीर है यह शायद उन्हें पता नहीं। जिस क्षेत्र पर संयुक्त राष्ट्र ने उसका अधिकार नहीं माना उसके एक बड़े हिस्से को उसने चीन को दे दिया है और चीन ने वहां भारी निर्माण किया है तथा अपनी सेना जमा रखा है। चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा वहां से आरंभ होकर बलूचिस्तान तक जा रहा है। पाकिस्तान के पीछे हटने का मतलब है, चीन को भी वह भाग खाली करना होगा तथा आर्थिक गलियारा का काम बंद करना होगा। तो पाकिस्तान ने अपने गलत रवैये से संयुक्त राष्ट्र संघ प्रस्ताव के खिलाफ जाकर मामले को कितना जटिल बना दिया है यह समझने की आवश्यकता मदनी सहित ओआईसी के उन सदस्यों को है जो पाकिस्तान की भाषा बोलते हैं। मदनी कह रहे हैं कि आखिर कोई वहां जनमत संग्रह से डर क्यों रहा है तो उनको बताना पड़ेगा कि आप जिस देश की वकालत कर रहे हैं उनसे पूछिए कि आज तक जनमत संग्रह के प्रस्ताव का उल्लंघन क्यों किया है?

खैर, जनमत संग्रह का प्रस्ताव अब इतिहास का विषय हो गया है तथा संयुक्त राष्ट्र की इसमें कोई रुचि पैदा होने का सवाल नहीं है। जिन परिस्थितियों में यह प्रस्ताव पारित हुआ उनमें और आज में जमीन आसमान का अंतर आ गया है। इसलिए इस बारे में पाकिस्तान स्वयं जितना बोले किसी और देश या संगठन से बोलवा ले इसका कोई अर्थ नहीं। ओआईसी के महासचिव चाहे पाकिस्तान की धरती पर जो बयान दे दें, कश्मीर पर एक एडवाइजर तैयार करने की बात करें, इस संगठन के अंदर ही इस विषय पर प्रस्तावों के अलावा सक्रिय रुप से कुछ करने के लिए एकमत कायम करना कठिन है। उदाहरण के लिए अफगानिस्तान और बंगलादेश दोनों इसके सदस्य हैं। क्या ये दोनों किसी सूरत में भारत के खिलाफ और पाकिस्तान के पक्ष में जा सकते हैं? अभी अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजाई तथा बांग्लादेश के सूचना मंत्री हसन उल-हक-इनू भारत दौरे पर थे। दोनों ने जिस तरह खुलकर बलूचिस्तान मामले पर भारत के पक्ष का समर्थन किया, पाकिस्तान की आलोचना की वह सबके सामने है। इयान मदनी सऊदी अरब से आते हैं। सऊदी के जेद्दाह में ओआईसी का मुख्यालय है। वो चाहे कुछ भी बोलें लेकिन सऊदी अरब एकदम भारत के खिलाफ काम करेगा ऐसा तब तक नहीं माना जा सकता जब तक कि वाकई वह ऐसा न कर दे। इसके अलावा इंडोनेशिया, ईरान, मालदीव.... जैसे देश भी भारत की खिलाफत नहीं कर सकते। रुस और थाइलैंड को इसमें पर्यवेक्षक देश की हैसियत हासिल है। तो इनके विचार का भी वहां कुछ अर्थ होगा। यही कारण है कि ओआईसी कश्मीर मामले पर पहले भी प्रस्ताव पारित करता रहा है लेकिन कभी उससे आगे नहीं बढ़ा। हालांकि संयुक्त राष्ट्रसंघ में बाजाब्ता उसका प्रतिनिधि है।

हम न भूलें कि ओआईसी दुनिया के इस्लामी देशों का सबसे बड़ा संगठन अवश्य है, लेकिन इसके अलग-अलग सदस्य देशों के बीच आपसी मतभेद और तनाव छिपा तथ्य नहीं है। ईरान इराक लंबे समय तक संघर्षरत रहे, ईरान के साथ सउद अरब के तनावपूर्ण संबंध, तुर्की और सीरिया के रिश्ते, सीरिया, लीबिया और इराक आदि में भीषण आतंकवादी संघर्ष...आदि को ध्यान में रखें तो ओआईसी की स्थिति का आभास हो जाएगा। इनके बीच इतने मतभेद हैं कि 2014 का पिछला शिखर सम्मेलन जो न्यूयॉर्क में हुआ था बिना किसी प्रस्ताव के समाप्त हुआ। पता नहीं इसके बाद 2017 में होने वाले शिखर सम्मेलन का क्या होगा? तो इस्लामाबाद से आए ओआईसी के महासचिव के बयान से हमें परेशान होने की आवश्यकता नहीं। बावजूद भारत ने अब पाक अधिकृत कश्मीर पर जो रुख अपनाया है उसके संदर्भ में सघन कूटनीतिक अभियान चलाने की आवश्यकता है। प्रमुख इस्लामी देशों को उस क्षेत्र की असलियत एवं पाकिस्तान की करस्तानी का तथ्यात्मक विवरण देने का अभियान भारत को चलाना चाहिए। ओआईसी के इन सदस्य देशों को यह भी याद दिलाने की आवश्यकता है कि 1999 में आपने आतंकवाद के विरुद्ध प्रस्ताव पारित किया था, लेकिन पाकिस्तान बाजाब्ता आतंकवाद को हमारे यहां प्रायोजित करता है।