गुरूग्राम बनाम गुड़गांव समेत देश के दिल्ली, मुबंई, बैंगलुरु और हैदराबाद जैसे हाईटेक शहर बारिश की चपेट में हैं। आफत की बारिश के चलते डूब में आने वाले इन शहरों ने संकेत दिया है कि तकनीकि रूप से स्मार्ट सिटी बनाने से पहले शहरों में वर्षा जल के निकासी का समुचित ढांचा खड़ा करने की जरूरत है, लेकिन हमारे नीति नियंता हैं कि इन संकेतों को उत्तराखण्ड में देवभूमि की तबाही तथा कश्मीर एवं चैन्नई में आ चुकी प्रलंयकारी बाढ़ के बावजूद नजरअंदाज कर रहे हैं। बाढ़ की यह स्थिति शहरों में ही नहीं है, इस त्रासदी को असम व बिहार जैसे वे राज्य भी झेल रहे हैं, जहां बाढ़ दशकों से आफत का पानी लाकर हजारों ग्रामों को डूबो देती है। इस लिहाज से शहरों और ग्रामों को कथित रूप से स्मार्ट व आदर्श बनाने से पहले इनमें ढांचागत सुधार के साथ ऐसे उपाय करने की जरूरत है, जिससे ग्रामों से पलायन रुके और शहरों पर आबादी का दबाव न बढ़े?

गुड़गांव और बैंगलुरु मानसूनी बारिश की सबसे ज्यादा चपेट में हैं। वर्तमान मुसीबत का वजह कम समय में ज्यादा बारिश होना तो है ही, जल निकासी के इंतजानम नाकाफी होना भी है। दरअसल औद्योगिक और प्रौद्योगिक विकास के चलते शहरों के नक्षे निरंतर बढ़े हो रहे हैं। गुड़गांव तो भूमंडलीकरण के दौर में ही एक ममूली गांव से महानगर के रूप में विकसित हुआ है। इस विकासक्रम में गांव से शहर बनते गुड़गांव के नदी-नाले और ताल-तलैया तो नष्ट हुए ही, अरावली की उन पहाड़ियों को भी सीमेंट-कंक्रीट का जंगल खड़ा करने के लिए रेत में बदल दिया जो गुड़गांव से लेकर दिल्ली तक जलवायु संतुलित रखने का काम करती थीं। इन कारणों के चलते, जहां जल संग्रहण का क्षेत्र कम हुआ, वहीं अनियोजित शहरीकरण में बरसाती पानी के निकासी के रास्तों का ख्याल ही नहीं रखा गया। यही कारण है कि गुड़गांव में गगनचुंबी इमारतें और मोबाइल टावर तो दिखाई देते हैं, लेकिन धरती पर कहीं ताल-तलैया और नाले दिखाई नहीं देते हैं। यही वजह रही कि औसत से महज 259 मिलीमीटर बारिश ज्यादा होने से यह औद्योगिक एवं प्रौद्योगिक स्मार्ट शहर 2 से लेकर 4 फीट तक पानी में डूब गया और दिल्ली जयपुर रास्ते में 25 किलोमीटर लंबा महाजाम लग गया। मिलेनियम सिटी के नाम से विख्यात गुड़गांव में वह टेक्नोलॉजी तत्काल कोई काम नहीं आई, जिसे वाई-फाई जोन के रूप में विकसित किया गया था। साफ है, शहरों की बुनियादी समस्याओं का हल शहरों में मुफ्त वाई-फाई देने या रात्रि में पर्यटन पर जोर देने से निकलने वाला नहीं है, इसके सामाधान शहर बसाते समय पानी निकासी के प्रबंध करने से भी निकलेंगे। गुड़गांव में आदमी तो आदमी उद्योग जगत की भी नींद हराम है। जल के इतने बढ़े क्षेत्र में भराव का कारण गुड़गांव का विकास उद्वहन परियोजनाओं (हाइड्रोलॉजीकल प्लान) के अनुसार नहीं होना भी है। नरेंद्र मोदी जैसा कि दावा कर रहे हैं कि शहरीकरण ही नहीं, स्मार्ट शहर वर्तमान की जरूरत हैं, तो यह भी जरूरी है कि शहरों की अधोसरंचना संभावित आपदाओं के अनुसार विकसित की जाए?

गुड़गांव आईटी और ऑटो कंपनियां का बड़ा नाभि केंद्र है। अधिकतर आईटी कंपनियों के कार्यालय यहीं हैं। मारूति सुजुकी, हीरो होंडा और इफको के कारखाने यहीं हैं। विकास की इस होड़ में गुड़गांव में हीरो होंडा और इफको चौराहे तो अस्तित्व में आ गए है, लेकिन प्राचीन विरासत और प्रकृति के अस्तित्व से जुड़ी पहचानों के संकेत नहीं मिलते हैं। गुड़गांव की तरह बैंगलुरु भी साइबर सिटी के नाम से विश्वविख्यात है। लेकिन यहां भी मामूली बारिश ने हालात इतने बद्तर बना दिए है कि सुरक्षा दलों को सड़कों व गलियों में नावें चलाकर लोगों के प्राण बचाने पड़े हैं। यहां बाढ़ इतनी थी कि कई लोगों ने भोजन के लिए जाल बिछाकर मछलियां तक पकड़ने का काम किया। ऐसी ही स्थिति जुलाई माह की शुरुवात में भोपाल में देखने में आई थी। जयपुर में भी यही हाल है। यहां नदी और नलों पर इतने अतिक्रमण हुए है कि बारिश के पानी की निकासी इंतजाम ठप है। यहां मानसूनी पानी बहा ले जाने का माध्यम जो द्रव्यवती नदी थी, वह सरकारी उदासीनता के चलते अतिक्रमण की चपेट में हैं। इसे बचाने के लिए भी प्रकृति प्रेमियों को संघर्ष से दो-चार होना पड़ रहा है।

आफत की यह बारिश इस बात की चेतावनी है कि हमारे नीति-नियंता, देश और समाज के जागरूक प्रतिनिधि के रूप में दूरदृष्टि से काम नहीं ले रहे हैं। पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के मसलों के परिप्रेक्ष्य में चिंतित नहीं हैं। 2008 में जलवायु परिवर्तन के अंतरसकारी समूह ने रिपोर्ट दी थी कि घरती पर बढ़ रहे तापमान के चलते भारत ही नहीं दुनिया में वर्षाचक्र में बदलाव आनेवाले हैं। इसका सबसे ज्यादा असर महानगरों पर पड़ेगा। इस लिहाज से शहरों में जल-प्रबंधन व निकासी के असरकारी उपायों की जरूरत है। इस रिपोर्ट के मिलने के तत्काल बाद केंद्र की तत्कालीन संप्रग सरकार ने राज्य स्तर पर पर्यावरण सरंक्षण परियोजनाएं तैयार करने की हिदायत दी थी। लेकिन देश के किसी भी राज्य ने इस अहम् सलाह पर गौर नहीं किया गया। इसी का नतीजा है कि हम जल त्रासदियां भुगतने को विवश हो रहे हैं। यही नहीं शहरीकरण पर अंकुश लगाने की बजाय, ऐसे उपायों को बढ़ावा दे रहे हैं, जिससे उत्तरोत्तर शहरों की आबादी बढ़ती रहे। यदि यह सिलसिला इन त्रासदियों को भुगतने के बावजूद जारी रहता है तो ध्यान रहे, 2031 तक भारत की शहरी आबादी 20 करोड़ से बढ़कर 60 करोड़ हो जाएगी। जो देश की कुल आबादी की 40 प्रतिशत होगी। ऐसे में शहरों की क्या नारकीय स्थिति बनेगी, इसकी कल्पना भी असंभव है?  

वैसे, धरती के गर्म और ठंडी होते रहने का क्रम उसकी प्रकृति का हिस्सा है। इसका प्रभाव पूरे जैवमंडल पर पड़ता है, जिससे जैविक विविधता का आस्तित्व बना रहता है। लेकिन कुछ वर्षों से पृथ्वी के तापमान में वृद्धि की रफ्तार बहुत तेज हुई है। इससे वायुमंडल का संतुलन बिगड़ रहा है। यह स्थिति प्रकृति में अतिरिक्त मानवीय दखल से पैदा हो रही है। इसलिए इस पर नियंत्रण संभव है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल चेन्नई की जल त्रासदी को ग्लोबल वार्मिंग माना था। सयुक्त राष्ट्र की जलवायु परिवर्तन समिति के वैज्ञानिकों ने तो यहां तक कहा था कि ‘तापमान में वृद्धि न केवल मौसम का मिजाज बदल रही है, बल्कि कीटनाशक दवाओं से निश्प्रभावी रहने वाले विषाणुओं-जीवाणुओं, गंभीर बीमारियों, सामाजिक संघर्षों और व्यक्तियों में मानसिक तनाव बढ़ाने का काम भी कर रही है।’ साफ है, जो लोग गुड़गांव के जाम में 20 घंटे फंसे रहे, उन्होंने जरूर उक्त संभावित तनाव की त्रासदी को भोगा होगा?

दरअसल, पर्यावरण के असंतुलन के कारण गर्मी, बारिश और ठंड का संतुलन भी बिगड़ता है। इसका सीधा असर मानव स्वास्थ्य और कृषि की पैदावर व फसल की पौष्टिकता पर पड़ता है। यदि मौसम में आ रहे बदलाव से बीते तीन-चार साल के भीतर घटी प्राकृतिक आपदाओं और संक्रामक रोगों की पड़ताल की जाए तो वे हैरानी में डालने वाले हैं। तापमान में उतार-चढ़ाव से ‘हिट स्ट्रेस हाइपरथर्मिया’ जैसी समस्याएं दिल व सांस संबंधी रोगों से मृत्युदर में इजाफा हो सकता है। पश्चिमी यूरोप में 2003 में दर्ज रिकॉर्ड उच्च तापमान से 70 हजार से अधिक मौतों का संबंध था। बढ़ते तापमान के कारण प्रदूशण में वृद्धि दमा का कारण है। दुनिया में करीब 30 करोड़ लोग इसी वजह से दमा के शिकार हैं। पूरे भारत में 5 करोड़ और अकेली दिल्ली में 9 लाख लोग दमा के मरीज हैं। अब बाढ़ प्रभावित समूचे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में दमा के मरीजों की और संख्या बढ़ना तय है। बाढ़ के दूषित जल से डायरिया व आंख के संक्रमण का खतरा बढ़ता है। भारत में डायरिया से हर साल करीब 18 लाख लोगों की मौत हो रही है। बाढ़ के समय रुके दूषित जल से डेंगू और मलेरिया के मच्छर पनपकर कहर ढाते हैं। तय है, बाढ़ थमने के बाद, बाढ़ प्रभावित शहरों को बहुआयामी संकटों का सामना करना होगा। बहरहाल जलवायु में आ रहे बदलाव के चलते यह तो तय है कि प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति बढ़ रही है। इस लिहाज से जरूरी है कि शहरों के पानी का ऐसा प्रबंध किया जाए कि उसका जल भराव नदियों और बांधों में हो, जिससे आफत की बरसात के पानी का उपयोग जल की कमी से जूझ रहे क्षेत्रों में किया जा सके। साथ ही शहरों की बढ़ती आबादी को नियंत्रित करने के लिए कृषि आधारित देशज ग्रामीण विकास पर ध्यान दिया जाए। क्योंकि ये आपदाएं स्पष्ट संकेत दे रही है कि अनियंत्रित शहरीकरण और कामचलाऊ तौर-तरीकों से समस्याएं घटने की बजाय बढ़ेंगी ही?