आर्थिक सुधारों को लागू करना एक राजनीतिक दुस्साहस भरा कार्य माना जाता है। और जीएसटी का विश्वभर का जो इतिहास रहा है उस दृष्टि से तो जीएसटी को लागू करना अत्यंत व अत्यधिक दुस्साहस भरा कार्य है। जीएसटी लागू है ऐसे विश्वभर के लगभग 160 देशों का इतिहास रहा है कि जहां-जहां यह टैक्स लागू हुआ, वहां-वहां महंगाई बढ़ी और महंगाई के फलस्वरूप इसे लागू करनेवाला सत्तारूढ़ दल चुनावों में महंगाई के मुद्दे पर चुनाव हार गया। जीएसटी के ऐसी इतिहास के बाद भी यदि कोई सरकार इस बिल को पास कराने हेतु प्रतिबद्ध होती है तो इसे उसका राष्ट्र के प्रति समर्पण व आर्थिक विकास के प्रति दृढ़ दृष्टिकोण का द्योतक माना जाना चाहिए। 

देश में जीएसटी के लागू होने से हर सामान और हर सेवा पर सिर्फ एक टैक्स लगेगा यानी वैट,  एक्साइज और सर्विस टैक्स की जगह अब एक ही टैक्स लगेगा। आम भारतीय नागरिक को जीएसटी से सबसे बड़ा फायदा होगा कि पूरे देश में सामान पर देश के लोगों को एक ही टैक्स चुकाना होगा। यानी पूरे देश में किसी भी सामान की कीमत एक ही रहेगी। वर्तमान में वस्तुओं पर भिन्न प्रकार के टैक्स लगते हैं। अब इसके लागू होते ही केंद्र को मिलनेवाली एक्साइज ड्यूटी, सर्विस टैक्स सब खत्म हो जाएंगे। राज्यों को मिलनेवाला वैट, मनोरंजन कर, लक्जरी टैक्स, लॉटरी टैक्स, एंट्री टैक्स, चुंगी आदि समाप्त हो जाएंगे। जीएसटी के लागू होने से टैक्स संरचना में सुधार होगा। टैक्स भरना आसान हो जाएगा और टैक्स चोरी रुक जाएगी किसी भी वस्तु पर लगनेवाला कर एक सा रहेगा। इसका सीधा असर देश की जीडीपी पर पड़ेगा और देश की अर्थव्यस्था सुधरेगी। इस बिल के पास होने से राज्यों को यह डर था कि जीएसटी लागू हुआ तो उनकी कमाई कम हो जाएगी। विशेषतः पेट्रोल डीजल से राजस्व कम होने से कई राज्य संकट में आ जाते। इस परिस्थिति से राज्यों को निकालने हेतु केंद्र ने राज्यों को राहत दे दी कि इन वस्तुओं पर अभी जो टैक्स राज्य ले रहे हैं, वो शुरुआती बरसों में लेते रहेंगे। राज्यों को जो राजस्व हानि होगी उसकी प्रतिपूर्ति पांच साल तक केंद्र करेगा। जीएसटी से जो टैक्स मिलेगा वह भी केंद्र और राज्य में तय रीति नीति से वितरित होगा। अब देशभर में केवल तीन प्रकार के टैक्स रहेंगे - सेन्ट्रल गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स यानी सीजीएसटी, स्टेट गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स यानी एसजीएसटी, इंटीग्रेटेड गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स यानी आईजीएसटी। शराब पूरी तरह से जीएसटी से बाहर रहेगी, यानी इस पर टैक्स लगाने के लिए राज्य सरकारें स्वतंत्र होंगी। 

आर्थिक सुधारों का जो क्रम 25 साल पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने चालू किया था, उसी क्रम में, देश में जीएसटी को आज से लगभग 20 वर्ष पूर्व ही लागू हो जाना चाहिए था। इसी क्रम में देश की एनडीए सरकार के पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने आज से सोलह वर्ष पूर्व वर्ष 2000 में जीएसटी बिल को लोकसभा में प्रस्तुत कर आर्थिक सुधारों की अगली पीठिका की स्थापना कर दी थी। यद्दपि उस समय की अटल सरकार अल्पमत व राजनीतिक दांवपेंच के चलते इस बिल को पास नहीं करा पाई थी, तथापि अब नमो सरकार ने अटल सरकार के उस अधूरे कार्य को अब पूर्ण कर दिया है। आज विश्व के 160 से अधिक देशों में जीएसटी लागू है, किन्तु भारत में जीएसटी पर राजनीति भारी पड़ती रही जिसके फलस्वरूप इस महत्वाकांक्षी टैक्स को भारत में लागू होने की प्रक्रिया को 20 से अधिक वर्ष प्रतीक्षा करनी पड़ी।

यूपीए सरकार के तत्कालीन वित्तमंत्री पी. चिदम्बरम द्वारा फरवरी, 2007 में शुरुआत करते हुए मई, 2007 में जीएसटी के लिए राज्यों के वित्तमंत्रियों की संयुक्त समिति का गठन कर वर्ष 2010 से इसके लागू करने की घोषणा की गई, क्योंकि जीएसटी से राज्यों के अर्थतंत्र पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा, इसलिए इस बिंदु पर 13वें वित्त आयोग द्वारा गठित कार्यदल ने दिसंबर, 2009 तथा 14वें वित्त आयोग ने फरवरी, 2015 में जीएसटी पर अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंप दी थी। राज्यों के मध्य विरोधाभास होने पर अप्रैल, 2010 से कांग्रेस सरकार इसे लागू कराने में विफल रही। तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा मार्च, 2011 में 115वां संविधान संशोधन विधेयक पेश किया गया, जो पारित नहीं हो सका। भाजपा की नरेंद्र मोदी सरकार ने जीएसटी को अपने आर्थिक सुधारों का केंद्रबिंदु बताया तथा 122वां संविधान संशोधन विधेयक (अनुछेद 246, 248 एवं 268 इत्यादि में संशोधन) दिसंबर, 2014 में संसद में पेश किया, जिसे लोकसभा द्वारा मई, 2015 में पारित कर दिया गया था। किन्तु राज्यसभा में एनडीए के अल्पमत होने के चलते व राष्ट्रीय हितों के मुद्दों पर भी विपक्ष के रचनात्मक नहीं होने के कारण राज्यसभा में इस बिल का भविष्य उज्ज्वल नहीं दिख रहा था। यह नरेंद्र मोदी सरकार व विशेषतः वित्त मंत्री अरुण जेटली के संसदीय कौशल्य का परिणाम ही है कि लोकसभा के बाद, इस बिल को 3 अगस्त, 2016 को राज्यसभा में भी सम्पूर्ण उपस्थित सदस्यों के एकतरफा समर्थन से एतिहासिक सफलता मिली और यह पारित हुआ।

नियमों के अनुसार संविधान संशोधन बिल पास होने के बाद सरकार को असल जीएसटी बिल पेश करना होगा। लेकिन अगर सरकार उस बिल को मनी बिल के रूप में लाने का फ़ैसला करती है, तो फिर बिल को राज्यसभा से पास कराने की बाध्यता नहीं होगी। इस मुद्दे पर कांग्रेस ने पक्ष रखा है कि भाजपा इस बिल को मनी बिल के रूप में पास नहीं कराएगी। यद्दपि संशोधन बिल पर बहस के दौरान कांग्रेस का पक्ष रखते हुए पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने भाजपा सरकार से यह आश्वासन मांगा है कि संविधान संशोधन बिल पास होने के बाद सरकार मूल जीएसटी बिल को पिछले दरवाज़े से पास नहीं कराएगी तथापि यह स्पष्ट ही है कि कांग्रेस का यह समर्थन उसकी मज़बूरी भी है और चुनावी दांव भी। मज़बूरी यह कि यदि वह समर्थन नहीं करती तो देश के आर्थिक विकास में अडंगा बननेवाला राजनीतिक दल कहलाती और चुनावी दांव यह कि इस बिल के पास होने के बाद प्रारम्भिक वर्षों में महंगाई अपना मूंह फाड़ेगी जिसे कांग्रेस अपना चुनावी मुद्दा बनाएगी। किन्तु जीएसटी पर संविधान संशोधन बिल संसद से पारित करा लेने भर से ही चुनौतियां खत्म नहीं होती, वस्तुतः चुनौती तो संसद से बिल पारित होने के बाद प्रारंभ होती है। इस चुनौती के अंतर्गत अभी इसे 18 राज्यों की विधानसभा में पास होना होगा जो कि वर्तमान राजननीतिक परिदृश्य में आसान सा कार्य है। वस्तुतः इस बिल को कांग्रेस का समर्थन भी इस राज्यों वाले पेंच से ही संभव हुआ है क्योंकि कांग्रेस अब केवल छः राज्यों में ही सत्तारूढ़ है; वहीं भाजपा 8 राज्यों में अकेले और 6 में गठबंधन के साथ सत्तारूढ़ है। बाकी के 9 राज्यों में ओडिशा, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश समेत कई राज्य जीएसटी के पक्ष में हैं। अर्थात 16 राज्यों का समर्थन आसानी से मिल जएगा और संविधान संशोधन कानून बन जाएगा।