अरविंद केजरीवाल भारतीय राजनीति में एक ऐसा नाम है, जिसके बारे में लोगों में ऐसी उम्मीद जगी थी कि जो प्रचलित राजनीति से हटकर नई किस्म की राजनीति व्यवस्था परिवर्तन का पक्षधर है। इसी के चलते जब दिल्ली विधानसभा में केजरीवाल की आम आदमी पार्टी अर्थात ‘आप’ पहली बार चुनावों में उतरी तो दिल्ली के मतदाताओं ने उसे 70 में से 28 सीटें प्रदान कर दीं, और जब दुबारा पुन: चुनाव हुए तो पूरी तरह एकतरफा ढंग से 70 में से 67 सीटें दे दीं। लेकिन बड़ी बात यह कि क्या केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री और आप पार्टी के प्रमुख नेता बतौर जनभावना की कसौटी पर खरे उतरे?

विडम्वना यह कि सत्ता में आते ही केजरीवाल ने कुछ ऐसा प्रदर्शित करना शुरू किया कि वह केन्द्रशासित प्रदेश दिल्ली के मुख्यमंत्री न होकर जैसे एक सम्प्रभु राष्ट्र के प्रधानमंत्री हों। उन्होंने नियम-कायदों को बिलकुल अनदेखा करना शुरू किया और मनमानी पर उतर आए। इस तथ्य को वह बराबर भुलाने की कोशिश करते रहे कि उनके और उनकी सरकार के अधिकार बहुत सीमित है। अब यह सभी को पता है कि संविधान के अनुसार लोकपाल संस्था केन्द्र के लिए है, राज्यों के लिए लोकायुक्त संगठन का प्रावधान है। लेकिन केजरीवाल ने सत्ता में आते ही दिल्ली के लिए लोकपाल बनाने की बातें शुरू कर दीं, जैसे दिल्ली एक स्वतंत्र राष्ट्र हो। इतना ही नहीं उन्होंने यह भी कहना शुरू किया कि उनका लोकपाल विधानसभा में नहीं रामलीला मैदान में जनता के बीच बनाया जाएगा। संविधान के प्रावधानों के अनुसार दिल्ली में किसी भी महत्वपूर्ण विधेयक को पारित करने के पूर्व केन्द्र सरकार की स्वीकृति आवश्यक होती है, पर केजरीवाल ने इसकी कोई जरूरत नहीं समझी। खैर यह सब नौटंकी चलती रही और 2014 के लोकसभा चुनाव नजदीक आते ही लोकपाल के नाम पर दिल्ली सरकार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर प्रधानमंत्री बनने निकल पड़े और सीधे बनारस जाकर नरेन्द्र मोदी से भिड़ गए। उन्होंने इस अवधि में नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध खूब उल्टी-सीधी बातें कीं। उन्हें दागी बताया, गुजरात में किसानों ने मोदी राज में भारी संख्या में आत्महत्या की है, यह प्रचारित करना शुरू कर दिया। मोदी ने किसानों की भूमि अदाणी और अम्बानी को कौड़ियों के भाव दे दिया, ऐसा भी खूब हो-हल्ला मचाना शुरू किया। पर लोकसभा चुनावों में उनकी कोई नाटक-नौटंकी लटके-झटके काम नहीं आए और वह बनारस में मोदी के विरुद्ध चारोंखाने चित्त तो रहे ही, उनकी आप पार्टी को मात्र पंजाब से 4 सीटें प्राप्त हुई।

केजरीवाल जब एकतरफा बहुमत के साथ वर्ष 2015 में पुनः दिल्ली के मुख्यमंत्री बने तो दिल्ली विधानसभा में लोकपाल विधेयक पारित कराया। अब जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है लोकपाल व्यवस्था देश के लिए है, परन्तु केजरीवाल शायद दिल्ली को ही देश मानते हैं। इसके अलावा भी लोकपाल गठन में विधानसभा के स्पीकर को भी शामिल कर लिया, ताकि वह मनमाना लोकपाल बना सकें। आश्चर्यजनक ढंग से इस प्रस्तावित लोकपाल को ऐसे-ऐसे अधिकार दे दिए जिसे सुनकर लोग दातों तले उंगली दबा लें। जैसे दिल्ली सरकार का यह लोकपाल सांसदों, केन्द्रीय मंत्रियों और प्रधानमंत्री तक के भ्रष्टाचार की जांच और कार्यवाही कर सकता है। इस संबंध में केजरीवाल का तर्क था कि पुलिस को भी ऐसा ही अधिकार होता है। अब केजरीवाल को कौन बताए कि पुलिस और न्यायालयों का क्षेत्राधिकार भौगोलिक या एक क्षेत्र विशेष में होता है, लेकिन लोकपाल और लोकायुक्त व्यवस्था स्पष्ट रूप से केन्द्र और राज्यों के लिए अलग-अलग है। पर ऐसा तो तब हो न जब केजरीवाल अपने को दिल्ली का मुख्यमंत्री माने, वह तो अपने को दिल्ली का प्रधानमंत्री मानते हैं। इतना ही नहीं इस लोकपाल को हटाने का अधिकार भी विधानसभा को दिया, भले ही दो-तिहाई बहुमत से! इस तरह से उन्होंने इस बात की पूर्ण व्यवस्था कर दिया कि उनका लोकपाल उनके इशारों पर नाचे और वह उसका भरपूर राजनीतिक इस्तेमाल कर सकें। पर जब उप राज्यपाल और केन्द्र सरकार ने ऐसे संविधान विरोधी संस्था को बनाने की सहमति नहीं दी तो केजरीवाल चिल्लाने लगे कि हमें जनता ने चुना है और केन्द्र सरकार उन्हें कार्य नहीं करने दे रही है। ऐसी स्थिति में बड़ा सवाल यह कि क्या सिर्फ केजरीवाल को ही जनता ने चुना है? क्या मोदी सरकार को जनता ने नहीं चुना है? केजरीवाल का स्वेच्छाचारी रवैया तो यह उदाहरण प्रस्तुत करता है कि कल किसी पंचायत का सरपंच भी यह कह सकता है कि उसे जनता ने चुना है, इसलिए उसके पंचायत क्षेत्र में वही होगा जो वह चाहेगा। ऐसी स्थिति में तो देश के कानून, संविधान का कोई मतलब नहीं रह जाएगा और देश में अराजक स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। पर इससे देश में चाहे जो फर्क पड़े, केजरीवाल पर कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वह अपने को स्वतः अराजकतावादी कहते हैं।

यह पूरे देश को पता है कि जब गत वर्ष 15 दिसम्बर को केजरीवाल के प्रधान सचिव राजेन्द्र कुमार के दफ्तर में सी.बी.आई. ने छापा डाला तो केजरीवाल और उनकी ‘आप’ पार्टी ने कैसे कोहराम मचाया था? इसे पूरी तरह बदले की भावना से की गई कार्यवाही तो बताया ही गया था, केजरीवाल ने तो यहां तक हंगामा खड़ा किया कि यह छापा उनके कार्यालय में डाला गया है। (चूंकि राजेन्द्र कुमार का कार्यालय मुख्यमंत्री कार्यालय के अन्तर्गत ही है) उन्होंने इस बात को लेकर भी घोर आपत्ति उठाई कि उनके प्रधान सचिव के यहां छापा डालने से पहले उनसे पूछा क्यों नहीं गया? ऐसी स्थिति में प्रश्न उठता है कि क्या यह वही केजरीवाल हैं, जो अन्ना आंदोलन के प्रमुख आधार-स्तंभ होने के चलते कहा करते थे कि सी.बी.आई. को भ्रष्टाचारियों के विरुद्ध कार्यवाही करने की पूरी छूट होनी चाहिए? इतना ही इण्डिया अंगेस्ट करप्सन के कार्यकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने राजेन्द्र कुमार के भ्रष्टाचार के विरुद्ध केजरीवाल को शिकायत भेजी थी। बावजूद इसके केजरीवाल राजेन्द्र कुमार को अपना प्रधान सचिव बनाकर दिल्ली वासियों को अपनी तरफ से स्वच्छ प्रशासन दे रहे थे। अब जब सी.बी.आई. ने राजेन्द्र कुमार को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है, तो केजरीवाल की जुबान बंद है। जुबान तो बंद ही है, उल्टे राजेन्द्र कुमार को बाध्य होकर निलंबित भी करना पड़ा है।

कौन नहीं जानता कि पिछले बजट-सत्र में केजरीवाल सरकार ने पत्रकारों के लिए इतना ज्यादा बजट बढ़ा दिया था, जिससे लोगों में यही संदेश गया कि यह कहीं-न-कहीं मीडिया को प्रकारांतर से खरीदने का उपक्रम है। इतना ही नहीं मीडिया की आवाज को बंद करने के लिए कई पत्रकारों को विभिन्न कालेजों की गवर्निंग बॉडी में रखा गया। विधायकों का वेतन सीधे दो लाख दस हजार कर दिया गया तो अपना वेतन प्रधानमंत्री से भी ज्यादा कर दिया। शायद इस तरह से वह यह बताना चाहते हों कि उनका दर्जा प्रधानमंत्री मोदी से बड़ा है। यह अलग बात है कि ऐसे बेतुके प्रस्ताव को केन्द्र सरकार ने अनुमति नहीं दी। शायद इसीलिए केजरीवाल दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने को बेताव हैं, जिससे वह जो चाहें कर सकें। इसके लिए वह दिल्ली में जनमत संग्रह की मांग करते रहते हैं। पता नहीं केजरीवाल को यह जानकारी है या नहीं कि इस तरह से उनका जनमत संग्रह का प्रस्ताव कितना खतरनाक है? उन्हें पता होना चाहिए कि दिल्ली देश की राजधानी है और उसके संबंध में कोई फैसला पूरा देश ही ले सकता है। दूसरे इस तरह के जनमत संग्रह की मांग कहां तक जा सकती है? कल कोई राज्य कह सकता है, हम भारत से अलग होना चाहते हैं। कश्मीर के आत्मनिर्णय का मुद्दा देश के समक्ष गले की हड्डी ही बना है। पर ऐसा लगता है कि अपनी निर्बाध सत्ताकांक्षा के चलते केजरीवाल को इन सब बातों से कोई लेना-देना नहीं है। इसी निर्बाध सत्ताकांक्षा के चलते केजरीवाल अपने दो प्रमुख सहयोगियों योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण को पार्टी से तो निकाल ही चुके हैं, साथ ही उनके पिछवाड़े लात मारने को भी कह चुके हैं।

केजरीवाल का एक विचित्र रवैया तब सामने आया जब उन्होंने अपने 21 विधायकों को 13 मार्च 2015 को संसदीय सचिव बना दिया। अरे भाई! जब दूसरों के लिए ‘खाऊ-कमाऊ नीति’ अपनाई जा रही है, तो ये तो अपने ही हैं। इस मामले की शिकायत जब चुनाव आयोग में हुई कि इन्हें लाभ के पद पर बैठा दिया गया है, तो केजरीवाल ने 19 जून 2016 को विधेयक लाकर 23 जून को इसे पास कर दिया कि इन सभी संसदीय सचिवों को लाभ के पद पर नहीं माना जाएगा और यह विधेयक 14 फरवरी 2015 से लागू होगा। पर भला हो राष्ट्रपति का जिन्होंने इस विधेयक पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया। इसके चलते इन 21 विधायकों को चुनाव आयोग द्वारा अयोग्य घोषित किया जाना एक औपचारिकता भर शेष रह गई है।

केजरीवाल के गैर जिम्मेदराना हरकतों का एक बड़ा उदाहरण यह है कि जून माह में उन्होंने उप राज्यपाल को पत्र लिखा कि बी.जे.पी. के सांसद महेश गिरी और एन.डी.एम.सी. के वाइस चेयरमैन करण सिंह तॅवर, मोहम्मद मोइन खान मर्डर केश में शामिल हैं। इस पर श्री गिरी ने खुली पत्रकार वार्ता कर केजरीवाल को चुनौती दी कि वह या तो आरोप साबित करें या मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दें। पर केजरीवाल ने इस पर फिर चुप्पी साध ली। ज्ञातव्य है कि पुलिस द्वारा भी इस संबंध में श्री गिरी और श्री तॅवर को क्लीन चिट दी जा चुकी है। इससे यह समझा जा सकता है कि केजरीवाल कितने जिम्मेदार राजनीतिज्ञ हैं? जबकि वह बगैर किसी कारण के किसी पर भी कोई तोहमत लगा सकते हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि इसके पूर्व केजरीवाल, नितिन गड़करी और अरुण जेटली पर निराधार भ्रष्टाचार के आरोप लगा चुके हैं, जिसके चलते उक्त दोनों नेताओं ने मानहानि के आरोप में केजरीवाल को न्यायालय में घसीटा जा चुका है।

दूसरे तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीतिज्ञों की तरह केजरीवाल भी मुस्लिम तुष्टीकरण में रंचमात्र भी पीछे नहीं हैं। नई दिल्ली के नगर पालिका परिषद के कानूनी सलाहकार एम.एम. खान की हत्या पर उनके परिजनों को एक करोड़ की सहायता राशि देते हैं। पर अप्रैल माह में बांग्लादेशी मुसलमानों द्वारा विकासपुरी के कृष्णा नगर में रहने वाले डॉ. पंकज नारंग की हत्या होने पर उनके परिजनों से मिलकर सांत्वना देने तक की जरूरत नहीं समझते। वोट बैंक की राजनीति के तहत उनके एक विधायक नरेश यादव पर कुरान का अपमान कराकर और दंगे भड़काने के प्रयास का आरोप है तो बड़बोले आशीष खेतान पर गुरु ग्रंथ सा. के अपमान का अरोप है। यह सभी को पता चल गया है कि केजरीवाल के कई विधायकों पर तरह-तरह के आरोप हैं। कुछ पर महिलाओं से छेड़छेड़ा का, तो किसी पर फर्जी डिग्री का। आप की प्रवक्ता अल्का लाम्बा ने स्वतः स्वीकार किया कि गोपाल राय घोटाले के चलते परिवहनमंत्री के पद से हटाए गए। सच्चाई यह है कि साफ-सुथरी राजनीति का दावा करने वाले केजरीवाल ने ऐसे-ऐसे लोगों को टिकट दिया कि कुछ विधायकों को गिरफ्तार होना पड़ा तो कुछ को बतौर मंत्री इस्तीफा देना पड़ा। चुनाव के पहले केजरीवाल ने सादगीपूर्ण रहन-सहन की बातें की थीं, लेकिन चुनाव जीतने पर केजरीवाल के मंत्रियों में बड़ा बंगला और महंगी गाड़ी लेने की होड़ मच गई। स्वतः केजरीवाल ने बड़ा बंगला, महंगी गाड़ी और बड़ा सुरक्षा घेरा अपने लिए लिया।

स्थिति यह है कि केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के 12 विधायक अब तक विभिन्न आपराधिक गतिविधियों में गिरफ्तार किए जा चुके हैं। जिसमें फर्जी डिग्री से लेकर महिलाओं के यौन शोषण तक के मामले शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि अभी हाल में ही आप पार्टी की एक महिला कार्यकर्ता को यौन प्रताड़ना के चलते आत्महत्या करने को बाध्य हाना पड़ा, जिसमें आप पार्टी के विधायक शरद चौहान एवं 7 अन्य लोगों को पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया है। ऐसी स्थिति को देखकर तो यही कहा जा सकता है कि यह पार्टी नई किस्म की राजनीति देश के समक्ष प्रस्तुत करने की जगह स्वार्थी एवं यहां तक कि आपराधिक तत्वों का जमावड़ा है।

उपरोक्त बातों को लेकर ‘चोरी एवं सीनाजोरी’ के सिद्धांत को प्रतिपादित करते हुए केजरीवाल आए दिन प्रधानमंत्री मोदी के विरुद्ध गाली-गलौज के स्तर की भाषा इस्तेमाल करते रहते हैं, कभी उन्हें कायर कभी मनोरोगी और कभी यहां तक कह देते हैं कि मोदी उनकी हत्या कराना चाहते हैं। जबकि लोगों को यह अच्छी तरह पता है कि मोदी जिस स्तर के राजनेता हैं उनको इन सब चीजों ल्कसे कोई लेना देना नहीं है। सच्चाई यह है कि दिल्ली विधानसभा के चुनाव में जीतने के नाम पर केजरीवाल ने ऐसे अराजक एवं गैर जिम्मेदार लोगों को टिकट दिए, जो जीत कर और प्रभुता पाकर यह समझने लगे कि उन्हें कुछ भी करने का अधिकार है। पर केजरीवाल अपना घर न संभालकर आए दिन प्रधानमंत्री पर अूल-जलूल दोषारोपण करते रहते हैं। उनको लगता है कि इस तरह से अपने लोगों के कारनामों से वह एक तो लोगों को भ्रमित कर सकेंगे, दूसरे वह अपने को मोदी के समकक्ष खड़ा कर सकेंगे।

केजरीवाल अपने को कुछ ऐसा दिखाना चाहते हैं कि भारतीय राजनीति में उनका कद नरेन्द्र मोदी से कम नहीं है। इसीलिए बिना वजह के आएदिन वह प्रधानमंत्री मोदी के विरुद्ध गाली-गलौज के स्तर की भाषा का इस्तेमाल करते रहते हैं। पर यह वैसा ही है, जैसे कोई व्यक्ति सूरज पर थूकना चाहे, तो वह उसी पर गिरता है। कुल मिलाकर अरविंद केजरीवाल की पैंतरेबाजियॉ देखकर ऐसा लगता है जैसे वह हंगेरियन उपन्यासकार मेडुएल डी. सर्वतीज के उपन्यास के नायक डान क्विकजोट के नए संस्करण हों। डान क्विकजोट अपने को दुनिया का बहुत बड़ा योद्धा समझता था और इसलिए तलवार लेकर घोड़े पर बैठकर विश्व-विजय के लिए निकल पड़ा था। पर अपनी उटपटांग हरकतों के चलते वह कई जगह टूट-फूट गया और बुरी तरह घायल होकर घोड़े से गिर पड़ा। आगाज ऐसे ही दिखते हैं कि केजरीवाल की ये कलाबाजियॉ अंततः आत्मघाती ही साबित होंगी।

स्थिति यह है कि केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के 12 विधायक अब तक विभिन्न आपराधिक गतिविधियों में गिरफ्तार किए जा चुके हैं। जिसमें फर्जी डिग्री से लेकर महिलाओं के यौन शोषण तक के मामले शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि अभी हाल में ही आप पार्टी की एक महिला कार्यकर्ता को यौन प्रताड़ना के चलते आत्महत्या करने को बाध्य हाना पड़ा, जिसमें आप पार्टी के विधायक शरद चौहान एवं 7 अन्य लोगों को पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया है। ऐसी स्थिति को देखकर तो यही कहा जा सकता है कि यह पार्टी नई किस्म की राजनीति देश के समक्ष प्रस्तुत करने की जगह स्वार्थी एवं यहां तक कि आपराधिक तत्वों का जमावड़ा है।

उपरोक्त बातों को लेकर ‘चोरी एवं सीनाजोरी’ के सिद्धांत को प्रतिपादित करते हुए केजरीवाल आए दिन प्रधानमंत्री मोदी के विरुद्ध गाली-गलौज के स्तर की भाषा इस्तेमाल करते रहते हैं, कभी उन्हें कायर कभी मनोरोगी और कभी यहां तक कह देते हैं कि मोदी उनकी हत्या कराना चाहते हैं। जबकि लोगों को यह अच्छी तरह पता है कि मोदी जिस स्तर के राजनेता हैं उनको इन सब चीजों ल्कसे कोई लेना देना नहीं है। सच्चाई यह है कि दिल्ली विधानसभा के चुनाव में जीतने के नाम पर केजरीवाल ने ऐसे अराजक एवं गैर जिम्मेदार लोगों को टिकट दिए, जो जीत कर और प्रभुता पाकर यह समझने लगे कि उन्हें कुछ भी करने का अधिकार है। पर केजरीवाल अपना घर न संभालकर आए दिन प्रधानमंत्री पर अूल-जलूल दोषारोपण करते रहते हैं। उनको लगता है कि इस तरह से अपने लोगों के कारनामों से वह एक तो लोगों को भ्रमित कर सकेंगे, दूसरे वह अपने को मोदी के समकक्ष खड़ा कर सकेंगे।