हमारे माननीय सांसद एकजुट होकर प्रतिनिधिमंडल के रूप में जम्मू-कश्मीर जाएं और वहां सभी पक्षों से बातचीत कर शांति स्थापना का रास्ता तलाशें इससे किसी को क्या आपत्ति हो सकती है। सामान्यतः ऐसे प्रयासों का स्वागत ही किया जाना चाहिए। जबसे कश्मीर में हिंसा एवं उपद्रव आरंभ हुआ, अलग-अलग पार्टियों की मांग थी कि एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल वहां जाना चाहिए। किंतु गृहमंत्री राजनाथ सिंह के नेतृत्व में सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल ने अपने दो दिवसीय दौरे में ऐसी क्या नई जानकारी हासिल की जो उन्हें या देश को पहले से पता नहीं था? आतंकवादियों के मारे जाने पर जो लोग हिंसा एवं उपद्रव कर रहे हैं, उनके साथ यह वायदा तो नहीं किया जा सकता था कि आगे से कोई आतंकवादी नहीं मारा जाएगा। न ही यह कहा जा सकता था कि आतंकवादी का मारा जाना गलत था और हम इसके लिए क्षमा प्रार्थी हैं। जिन लोगों ने सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की वो तो प्रत्यक्ष तौर पर हिंसा में शामिल हैं नहीं। न उन सबकी यह क्षमता है कि वो वचन देकर पत्थरबाजों को शांत हो जाने को तैयार कर सकें। तो फिर सर्वदलीय सम्मेलन ने वहां हासिल क्या किया?

जम्मू-कश्मीर पर नजर रखने वालों को इसका अहसास था कि इस कवायद से कुछ हासिल होने की संभावना नहीं थी। आखिर इसके पहले कश्मीर के इतिहास में तीन सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल वहां जा चुका है और सबका हस्र विफलता में हुआ। 1990 में उप प्रधानमंत्री चौधरी देवीलाल के नेतृत्व में सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल गया था जिसमें राजीव गांधी भी शामिल थे। क्या हुआ उससे? जार्ज फर्नांडिस को कश्मीर मामले का मंत्री बनाया गया। किंतु उसके बाद आतंकवाद तेजी से बढ़ा और हालात खराब हुए। 2008 में केन्द्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल के नेतृत्व में सर्वदलीय प्रतिनिधिमडल गया। तब श्रीअमरनाथ श्राइन बोर्ड को अस्थायी उपयोग के लिए वीरान पड़ी जमीन देने का विरोध उग्र हिंसक हो गया था। तीसरा प्रतिनिधमंडल सितंबर 2010 में गया था जब इसी तरह कश्मीर घाटी में पत्थबाजी हो रही थी। यह चौथा प्रतिनिधिमंडल था। ध्यान रखिए जिस तरह हुर्रियत ने इस प्रतिनिधिमंडल के बहिष्कार का फैसला किया। उसी तरह उसने 2010 और 2008 का भी बहिष्कार किया था। जिस तरह इस बार छह सांसद सीताराम येचुरी, डी. राजा, शरद यादव, असदुद्दीन ओवैसी, जयप्रकाश नारायण और फैयाज अहमद मीर प्रतिनिधिमंडल से निकलकर अलग से हुर्रियत नेताओं से मिलने चले गए थे उसी तरह 2010 में भी हुआ था। प्रतिनिधिमंडल के सदस्य स्वयं उनसे मिलने गए थे और हुर्रियत नेताओं ने मीडिया को साथ देखकर अपनी अलगाववादी आग को पूरी तरह प्रज्वलित किया और मिलने गए नेता खाली हाथ लौट आए।

यह कहने में कोई समस्या नहीं है कि हमारे देश के कुछ नेतागण पिछले अनुभव से सबक सीखने को तैयार नहीं है। आप देखिए, हुर्रियत नेताओं ने इनसे बातचीत करने से ही इन्कार कर दिया। सैयद अली शाह गिलानी के घर का दरवाजा भी पूरी तरह नहीं खुला। शब्बीर शाह पहले बातचीत को तैयार थे, लेकिन अंत में मुकर गए। मीरवायज ने बैरंग लौटा दिया तो यासिन मलिक ने कहा कि दिल्ली आएंगे तो मुलाकात करेंगे। मान लीजिए ये मिल भी लेते तो क्या निकलता? जो लोग अपने को भारतीय नहीं कहते, कुछ स्वयं को पाकिस्तानी मानते हैं तो कुछ विवादित इलाके का नागरिक, जो भारत का झंडा जलाते हैं, भारत मुर्दाबाद के नारे लगवाते हैं, उनसे आप बातचीत करके क्या हासिल कर लेंगे? 8 जुलाई को बुरहान वानी के मारे जाने के बाद इनने ही लोगों को भड़काया। यह बात अलग है कि अब इस हिंसा का नेतृत्व इनके हाथों नहीं है। इनको रोक देना भी इनके वश का नहीं है। जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने ठीक ही कहा था कि बहुमत जनता शांति से रहना चाहती है, ये कुछ लोग हैं जो बच्चों को भड़काकर आग लगवा रहे हैं। उन्होंने इनकी कुल संख्या पांच प्रतिशत बताई। हम प्रतिशत में नहीं जाएंगे लेकिन महबूबा ने खीझ में ही सही हिंसा के लिए इनको जिम्मेवार तो ठहराया। यह बात अलग है कि कुछ दिनों में उनका विचार भी बदला और उन्होंने बतौर पीडीपी अध्यक्ष उनको सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल से बात करने का निमंत्रण दे दिया।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि पाकिस्तान के इशारे पर खेलने वाले जिन हुर्रियत नेताओं का बहिष्कार कर कश्मीर में शांति स्थापना की कोशिश होनी चाहिए, जिनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए उनको इस तरीके से हमारे माननीय सांसद महत्व दे देते हैं। उनको अगर महत्व नहीं दिया जाए तो उनके साथ आने वाली जनता की संख्या भी घटती जाएगी। ध्यान रखिए प्रतिनिधिमंडल में हुर्रियत नेताओं से मिलने जाने वालों में भाजपा के साथ कांग्रेस के नेता भी नहीं थे। कांग्रेस को भी उनका अनुभव तो है ही। दिल्ली में सर्वदलीय बैठक के बाद गृह मंत्री ने कहा था कि संविधान के दायरे में जो भी वार्ता के लिए आएगा हम उससे मिलने को तैयार हैं। हुर्रियत पहले ही इस दल से नहीं मिलने की घोषणा कर चुका है। इसलिए किसी को वार्ता का विशेष न्यौता नहीं दिया जाएगा और जो भी बातचीत को आएगा उसका स्वागत होगा। तो सरकार की नीति कश्मीर जाने के पूर्व से ही स्पष्ट थी। संविधान के दायरे में हुर्रियत के नेता आ नहीं सकते थे।

कांग्रेस के नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा कि पूरा देश कश्मीर से मोहब्बत करता है। हम यहां बड़ी उम्मीदों के साथ आए हैं। कश्मीर समस्या के समाधान और कश्मीर में अमन बहाली के लिए सभी को सहयोग करना चाहिए। प्रतिनिधिमंडल ने सबसे पहले मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती से मुलाकात की। महबूबा ने वार्ता में सभी पक्षों को शामिल करने और बिना शर्त बात किए जाने का मशविरा दिया। नेशनल कांफ्रेंस के कार्यवाहक प्रमुख व पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने समस्या के राजनीतिक समाधान पर जोर दिया। लेकिन सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल पर उनकी राय देखिए। प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात के बाद उमर ने कहा कि सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल का आगमन अच्छी बात है लेकिन कश्मीर में इस तरह के प्रयास अपनी विश्वसनीयता व प्रासंगिकता गंवा चुके हैं। मैं इस दौरे को लेकर बहुत आशान्वित नहीं हूं। उमर ने कहा कि आज मेरी ही पार्टी के कई नेता इस मुलाकात के लिए राजी नहीं थे। वर्ष 2008 व 2010 में जब केंद्रीय दल यहां आए तो उससे मिलने के लिए बहुत से संगठन आए। लेकिन आज मुख्यधारा के चंद सियासी दलों के अलावा सिविल सोसाइटी का कोई बड़ा संगठन मिलने को तैयार नहीं है। तो मुख्यधारा की एक मुख्य पार्टी का यह विचार है प्रतिनिधिमंडल को लेकर। जो महबूबा ने कहा उसमें भी नया कुछ नहीं है। दूसरे संगठनों ने भी जो कुछ कहा वह सब पहले से जानी हुई बात है।

घाटी के नुटनुसा में कश्मीरी पंडित कर्मचारियों के क्वार्टरों में हुई लूटपाट और हमले की घटना के विरोध में ऑल पार्टीज माइग्रेंट कोआर्डीनेशन कमेटी के बैनर तले कश्मीरी पंडितों ने प्रदर्शन किया। प्रदर्शन कर रहे पंडितों का कहना था कि वादी में कश्मीरी पंडित कर्मचारियों के लिए काम करने लायक माहौल नहीं है। 1990 जैसे हालात बने हुए हैं। लिहाजा कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को जम्मू शिफ्ट किया जाए। जाहिर है, प्रतिनिधिमंडल के कानों तक इनकी आवाज अवश्य पहुंची होगी। एक ओर प्रतिनिधिमंडल वार्ता के लिए बैठा था और दूसरी ओर शोपियां में उपद्रवियों ने निर्माणाधीन मिनी सचिवालय में आग लगा दिया। हालांकि जितना समय घाटी में दिया गया उससे काफी कम जम्मू में दिया गया और इसका असंतोष भी वहां दिखा। पंडितों के सिर्फ 8 मिनट का समय मिला, इसलिए उनने बहिष्कार कर दिया। गृहमंत्री ने इसके बाद लेह जाने की भी घोषणा की है। तीनों क्षेत्रों के लोगों से बातचीत का व्यवहार सही नीति है, पर घाटी की तरह अन्य दोनों को भी पर्याप्त समय मिलना चाहिए।

हुर्रियत के व्यवहार पर गृहमंत्री की तीखी प्रतिक्रिया को समझना होगा। उन्होंने कहा कि हुर्रियत नेताओं से प्रतिनिधिमंडल के कुछ सदस्य बातचीत करने गए थे, लेकिन उन्होंने बातचीत नहीं की। इसका मतलब साफ है कि उनका इंसानियत, कश्मीरियत और जम्हूरियत में यकीन नहीं है। जो शांति चाहते हैं, हम उन सभी से बात करने को तैयार हैं। बातचीत के लिए हमारा दरवाजा ही नहीं खुला, हमारे रोशनदान भी खुले हैं। राज्य की मुख्यमंत्री ने बातचीत में शामिल होने के लिए पत्र भी लिखा था। सरकार की नीति के अनुसार तो गृहमंत्री महबूबा मुफ्ती की पहल का समर्थन गृहमंत्री को नहीं करना चाहिए। तो फिर उन्होंने इसका जिक्र क्यों किया? ऐसा लगता है वो हुर्रियत को कठघरे में खड़ा करना चाहते थे। इसलिए दोनों बातों का जिक्र करते हुए उनकी आलोचना की। इसके बाद यह माना जा सकता है कि सरकार का रुख हुर्रियत के प्रति और कड़ा होगा। लेकिन कुल मिलाकर अगर हम यह प्रश्न करें कि सर्वदलीय प्रतिनिधिमडल से मिला क्या तो उत्तर में अभी शून्य दिखाई देगा।