समस्याएं, संकट या चुनौतियां हमें परेशान जरुर करती हैं, लेकिन कई बार उन्हीं से ऐसे समाधान भी निकल जाते हैं जिनकी हम कल्पना नहीं करते। हां, यह तभी संभव है जब हम संकट को समाधान की दृष्टि से देखें और लाख विरोधों, आलोचनाओं के बावजूद उस पथ पर डटे हुए आगे बढ़ते रहें। कश्मीर के वर्तमान संकट को लेकर केन्द्र एवं राज्य सरकार की परेशानियां समझ में आतीं हैं। लेकिन इसके साथ कुछ ऐसी बातें भी हो रहीं हैं जो इसके पहले कभी नहीं हुईं और उनसे ही आशा की किरण झलक रहीं हैं। इसमें तो दो राय नहीं कि 8 जुलाई को आतंकवादी बुरहान वानी और उसके दो साथियों के मुठभेड़ में मारे जाने के बाद जो हिंसा एवं उपद्रव आरंभ हुआ वह अवांछित था। 2010 में चार लोगों के गलत तरीके से मारे जाने का मामला था और उसको आधार बनाकर हिंसा कराने वालों को अपने पक्ष में कुछ तर्क भी मिल सकता था। इस बार आतंकवादी के मारे जाने का मामला है। चाहे अलगाववादी जो तर्क दें, पूरे देश में और दुनिया के स्तर पर भी लोगों को यही लग रहा है कि ये सब आतंकवादियों के समर्थक हैं। इसलिए उनके प्रति पाकिस्तान के घड़ियाली आंसू के अलावा किसी की सहानुभूति नहीं हो सकती। यहां तक कि हुर्रियत से बातचीत का सुझाव देने वाले भी सार्वजनिक तौर पर नहीं कह सकते कि आतंकवादी का मारा जाना गलत था और इसलिए आपका गुस्सा जायज है।

हुर्रियत या अलगाववादी समस्या के मूल में हैं। कश्मीर में आतंकवाद और हिंसा के पिछले ढाई दशकों के इतिहास में अलगाववादी इस बार जितने नंगे हुए हैं उतना पहले कभी नहीं हुए। मीडिया की कृपा से उनकी पूरी कलई खुली है। उन पर आम जनता के कर का भारी रकम खर्च लंबे समय से किया जा रहा है, पर देश के सामने उसका एक-एक पक्ष इस तरह कभी आया नहीं था। जिस ढंग से इस विषय को रखा गया उससे देश का माहौल यह बना है कि अरे, ये हमारे पैसे पर ऐश करते हैं और हमारे देश को ही गाली देते हैं! बंद करो इनको धन देना, रोक दो इनकी सुविधाएं...। यह माहौल भारत में इसके पहले कभी नहीं बना था। ये भी अच्छा हुआ कि सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के कुछ सदस्य सुर्खरु बनने के चक्कर में इनके दरवाजे खटखटाने पहुंच गए और इनने उनसे बातचीत नहीं की। बहुमत जनता ने उन छः सांसदों के इस व्यवहार को ठीक नहीं माना, लेकिन हुर्रियत के नेताओं के इस व्यवहार ने उनके खिलाफ आक्रोश को और घनीभूत किया है। कभी यह कल्पना नहीं की जा सकती थी कि पीडीपी और मेहबूबा मुफ्ती खुलकर हुर्रियत की आलोचना करेंगी। आप देख लीजिए, मेहबूबा कह रहीं हैं मेहमान को दरवाजे से वापस करके इनने उनका नहीं अपना अपमान किया है। मेहबूबा ने तो यहां तक कह दिया कि ये गरीब के बच्चों के हाथों में पत्थर पकड़ाते हैं और वे मरते हैं। अगर पत्थरबाजी में इनके बच्चे मरे या घायल हुए हों तो मैं राजनीति छोड़ दूंगी। मेहबूबा का यह रुख असाधारण है। उनका और उनकी पार्टी की सोच अलगाववादियों के प्रति नरमी और सहानुभूति का रहा है।

हुर्रियत के इसी व्यवहार ने नरेन्द्र मोदी सरकार के इस निर्णय को बल प्रदान किया कि उनसे बात नहीं करनी है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह को जम्मू में यह कहने का अवसर मिल गया कि ये कश्मीरियत, जम्हूरियत और इन्सानियत तीनों में विश्वास नहीं करते। राजधानी दिल्ली में सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल की बैठक के बाद सरकार ने साफ किया कि जो बात करने के इच्छुक हैं उनसे बात की जाएगी लेकिन देश के संप्रभुता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। हालांकि मेहबूबा मुफ्ती ने भी पीडीपी के अध्यक्ष के रुप में हुर्रियत नेताओं को पत्र लिखकर सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल से बात करने को आमंत्रित कर दिया था, लेकिन उनको भी पता था कि वे नहीं आने वाले। जाहिर है, अब उनके खिलाफ कोई कार्रवाई होगी तो मेहबूबा भी उनके साथ खड़ी नहीं हो सकतीं। पहली बार इतनी गहराई से एनआईए हुर्रियत नेताओं सहित कइयों के लेनदेन की जांच कर रही है जिनमें सैयद अली शाह गिलानी का बेटा भी है। हवाला से धन आने का भी खुलासा हो जाए तो इनका पक्ष और कमजोर होगा।

अन्य दलों और समूहों ने जो बातें रखीं उनकी सूची देखें तो उसमें पुरानी बातें ही हैं अफस्फां हटे, पैलेट गनों का प्रयोग बंद हो, राजनीतिक समाधान हो, ज्यादा स्वायत्तता मिले... आदि आदि। सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के पूर्व राजनाथ सिंह दो बार श्रीनगर जाकर राजनीतिक दलों और नागरिक समूहों से मिल चुके थे। जम्मू कश्मीर का सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री से भी आकर अपनी बात रख चुका था। तो सरकार के सामने यह साफ था कि वहां के दल क्या चाहते हैं और समस्या क्या है? आज का सच यह है कि किसी दल या समूह ने वर्तमान संकट या कश्मीर समस्या के समाधान का कोई ठोस सूत्र नहीं दिया। यानी सब अंधेरे में तीर चला रहे हैं। वर्तमान हिंसा दक्षिण कश्मीर के मूलतः चार जिलों तक सीमित है। उसे विस्तारित करने की कोशिशें हो रहीं हैं और उनके भय से गांवों में भी लोग इनकी सभाओं में आ रहे हैं। किंतु यह स्थिति किसी समय बदल सकती है।

लंबे समय बाद पाकिस्तान ने कश्मीर पर पुरानी उग्रता दिखाकर भारत भर में गुस्सा पैदा किया है और यह धारणा पुष्ट हुई है कि जो कुछ हो रहा है उसके पीछे पाकिस्तान है। 2010 और 2008 की हिंसा के समय पाकिस्तान का ऐसा रुख नहीं था। पाकिस्तान ने अपने व्यवहार से कश्मीर पर दिखावे के लिए भी बातचीत की संभावना पर तत्काल विराम दे दिया है। इसे अच्छा ही मानना चाहिए। कश्मीर का संकट इसलिए अनसुलझा रहता था कि हम कभी पाकिस्तान से बातचीत की भावुकता में फंसते थे तो कभी हुर्रियत का मत समझने की कोशिशों में। माकपा के सीतराम येचुरी और उनके जैसे कुछ नेता भले हुर्रियत और पाकिस्तान से बातचीत की वकालत करे, इस राय का भारत में आज खरीदार नहीं है। वैसे भी जो नेता देशद्रोही नारा लगाने वालों के खिलाफ खड़े हो सकते हैं, उनको हीरो बना सकते हैं उनसे हम कश्मीर मामले पर माकूल कठोर कदम के समर्थन की उम्मीद नहीं कर सकते। आज सरकार के पास उनको जवाब देने का आधार है कि ये हुर्रियत जब आपसे बात को तैयार नहीं हुए, पाकिस्तान जब कश्मीर में आग लगाने पर तुला है तो उसका सामना करें कि बात करें।

सरकार ने आजादी के बाद पहली बार गिलगित बलतिस्तान सहित पाक अधिकृत कश्मीर पर खुलकर हक जताया है। पाकिस्तान से पूछकर कि आप इसे कब खाली कर रहे हैं कश्मीर समस्या के स्वरुप को बदलने की रणनीति अपनाई है। बलूचिस्तान के बारे मंे प्रधानमंत्री के एक वक्तव्य नें बलूच राष्ट्रवाद की ज्वाला को फिर से प्रज्वलित कर दिया है। भारत जहां तक आगे बढ़ गया है उसमें पीछे हटने की संभावना फिलहाल नहीं है। इसमें केन्द्र सरकार को अपने नजरिए से पहल करने या कदम उठाने में बहुत ज्यादा समस्या नहीं है। वैसे भी 2014 के आम चुनाव में कश्मीर भी एक प्रमुख मुद्दा था और नरेन्द्र मोदी को जनादेश इसके अपने दृष्टिकोण से समाधान के लिए मिला था। लोकतंत्र में आप सर्वदलीय बातचीत करें, प्रतिनिधिमंडल ले जाएं, सबसे विचार करें, यहां तक कोई समस्या नहीं है, लेकिन अपेक्षा यही होगी कि आप अपना दृष्टिकोण साफ रखें और बिना किसी हिचक के कदम उठाएं। यह संकट वाकई समाधान का आधार बन सकता है। वर्तमान संकट या पूरी कश्मीर समस्या सैन्य-राजनीतिक समस्या है और इसका समाधान इसी रास्ते हो सकता है। सरकार हिंसा रोकने के लिए कठोर कदम उठाए, हुर्रियत की सारी सुविधाएं वापस ले, धन के स्रोतों की जांच कर उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करे और साथ में कश्मीर के आम आदमी के विकास और रोजगार के लिए जो आर्थिक राजनीतिक निर्णय करने हो वह भी करे। दूसरी ओर बलूचिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर पर तीव्र कूटनीति से पाकिस्तान को उलझने को मजबूर करे। किंतु इन सबके लिए दृढ़ संकल्प की आवश्यकता है। परिस्थितियां आपके पक्ष में हैं, कुछ विरोधी खड़े हो सकते हैं, मानवाधिकार के नाम पर छातियां पीट सकते हैं, कुछेक नेता संसद में हंगामा करने की कोशिश कर सकते हैं...इनसे अप्रभावित हुए सरकार को काम करना होगा। फिर देखिए जो कुछ वर्षों में नहीं हुआ वह चमत्कार हमें देखने को मिल सकता है।