आतंकवाद का प्रायोजक आतंकवाद के खात्मे पर प्रवचन दे तो कैसा लगेगा, यही नवाज के भाषण के साथ हुआ।

यह उम्मीद तो थी कि देश के अंदर अपनी आंतरिक परेशानियों से ग्रस्त नवाज शरीफ संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर मामले को उठाएंगे लेकिन अपने भाषण को ही वे भारत विरोध पर केन्द्रित कर देंगे इसकी संभावना किसी ने भी व्यक्त नहीं की थी। अपने 19 मिनट से थोड़ा ज्यादा के भाषण में उन्होंने दो तिहाई समय भारत को आरोपित करने में लगाया। संयुक्त राष्ट्र संघ के पुराने रिकॉर्ड खंगालने होंगे कि शीतयुद्ध काल में पाकिस्तान के किस नेता ने इतना ज्यादा समय भारत को आरोपित करने में लगाया। क्या-क्या नहीं कहा नवाज ने। अपने देश के आतंकवाद को विदेश द्वारा समर्थित, प्रयोजित और वित्तपोषित कहा। साफ है कि इशारा भारत की ओर था। उनकी नजर में भारत आतंकवाद का प्रायोजक, हथियारों का विस्तारक, दक्षिण एशिया में हथियार होड़ के लिए उत्तरदायी, कश्मीर में निर्दोष नागरिकों का हत्यारा, आजादी की वाजिब मांग को सेना की गोलियों से जवाब देने वाला, बातचीत से भागने के लिए अस्वीकार्य शर्तें लगाने वाला... आदि आदि है। यानी उनके यहां जो समस्याएं हैं या दक्षिण एशिया में जो समस्याएं हैं उन सबके लिए कोई दोषी है तो वह भारत है। सवाल है कि नवाज शरीफ के इस भाषण को दुनिया के कितने देशों ने गंभीरता से लिया होगा?

हम आगे बढ़ें इसके पहले यह ध्यान दिलाना आवश्यक है कि नवाज से पांच भाषण पहले अफगानिस्तान के उप राष्ट्रपति सरवर दानिश का भाषण हुआ था। उन्होंने आतंकवाद के मामले पर पाकिस्तान को नंगा कर दिया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में रची गई साजिशों से उसकी सरजमीं पर आतंकवादी संगठन बेरहमी से निर्दोष नागरिकों पर हमले कर रहे हैं। हमने बार-बार पाकिस्तान से आतंकवादियों को मिलने वाले सुरक्षित पनाहगाह को ध्वस्त करने के लिए कहा लेकिन कोई अंतर नहीं आया। दानिश ने साफ कहा कि पाकिस्तान मंे तालिबान, हक्कानी नेटवर्क को प्रशिक्षण के साथ हथियार और धन तक मुहैया कराया जा रहा है। पाकिस्तान का आतंकवाद पर रवैया दोहरा है। जरा सोचिए, दुनिया के जो नेता या राजनयिक वहां बैठे थे या बाहर टेलीविजन पर सुन रहे थे वे किसकी बातों पर विश्वास करेंगे? पाकिस्तान पर या अफगानिस्तान पर? खैर, भारत ने भी अपनी प्रतिक्रिया दे दी है। भारत ने कहा है कि उसकी पाकिस्तान के साथ एक ही शर्त है कि आतंकवाद खत्म हो।

आतंकवाद पर नवाज के प्रवचन को कौन देश सुनेगा। अमेरिका में मैनहट्टन का जो धमाका हुआ उसका आरोपी अहमद खान रहामी ने क्वेटा में प्रशिक्षण लिया था। सैन बर्नाडिनो हमले में शामिल तशफीन मलिक पाकिस्तान मूल की निकली। पेरिस हमले का एक आरेापी लश्कर ए तैयबा का था। बेल्जियम हमले में शामिल छः पाकिस्तानी मूल के आतंकवादी पकड़े गए। जहां आतंकवादी हमला उसका कोई न कोई सूत्र पाकिस्तान से जुड़ता है। उड़ी आतंकवादी हमले पर दुनिया भर से जो प्रतिक्रियाएं आईं हैं पता नहीं पाकिस्तान के रणनीतिकारों ने उनका भी ठीक से अध्ययन किया या नहीं। आप आतंकवाद के खिलाफ 21 सितंबर को भाषण दे रहे हैं और एक बार भी 17 सितंबर को हुए उड़ी हमले का जिक्र नहीं किया जिसमें 19 सैनिक शहीद हो चुके हैं। क्या इसका असर नहीं होगा? फिर जिस बुरहान वानी को दुनिया हिज्बुल मुजाहिद्दीन का आतंकवादी मान चुकी है उसे आप अपने भाषण में आजादी के जंग का नेता तथा शहीद बता रहे हैं। इसे कहते हैं अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारना। सच कहें तो इसके द्वारा पाकिस्तान ने अंग्रेजी में जिस सेल्फ गोल कहते हैं वही किया।

जो सूचना है भाषण के ठीक पहले नवाज शरीफ ने अपने सेना प्रमुख जनरल राहिल शरीफ से बातचीत की थी। कम से कम भारत के प्रधानमंत्री या किसी नेता को अंतरराष्ट्रीय मंच पर भाषण देने के पहले ऐसा करने की आवश्यकता नहीं है। जाहिर है, नवाज जो कह रहे थे उसमें पाकिस्तानी सेना की सोच शामिल थी। ऐसा नहीं है कि इसे संयुक्त राष्ट्र के महासचिव सहित दूसरे राजनयिक या दुनिया के प्रमुख देशों ने नोट नहीं किया होगा। आतंकवाद पर पाकिस्तान का सच पूरी दुनिया को पता है। लेकिन जरा सोचिए, जो विश्व का सबसे बड़ा नाभिकीय प्रसारक है वह नाभिकीय निरस्त्रीकरण पर प्रवचन कर रहा था। नवाज ने भारत के साथ द्विपक्षीय नाभिकीय परीक्षण प्रतिबंध संधि का प्रस्ताव रखा। वे लगातार नाभिकीय अस्त्र बढ़ा रहे हैं। आज इजरायल एवं उत्तर कोरिया से ज्यादा नाभिकीय अस्त्र उनके पास है। क्या इसकी जानकारी संयुक्त राष्ट्र और दुनिया के प्रमुख देशों को नहीं है? उत्तर कोरिया के बाद पाकिस्तान दूसरा देश है जो नाभिकीय अस्त्र की धमकी देता है। हाल ही में भारत की ओर इशारा करते हुए पाक के रक्षा मंत्री ने कहा कि हम टैक्टिकल नाभिकीय अस्त्र के प्रयोग से नहीं हिचकेंगे। नाभिकीय अस्त्र को लेकर एक दिन पहले ही अमेरिका के विदेश मंत्री जॉन केरी ने मुलाकात में नवाज को झाड़ लगाई थी। उन्होंने कहा था कि आप नाभिकीय अस्त्र विस्तार पर विराम लगाएं। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने तो खैर उनसे मुलाकात ही रद्द कर दी।

अब आइए कश्मीर पर। पिछले दो सालों में कश्मीर में हस्तक्षेप का पाकिस्तान की आधा दर्जन औपचारिक अपील संयुक्त राष्ट्रसंघ ठुकरा चुका है। संयुक्त राष्ट्र ने अंततः 2010 में कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय विवादों की सूची से बाहर कर दिया। क्या वह इसे दोबारा वापस लाएगा? वे जिस आत्मनिर्णय संबंधी प्रस्ताव को लागू करने की अपील कर रहे थे उसमें पाकिस्तान स्वयं कठघरे में खड़ा होता है। उसमें पहले पाकिस्तान को ही अधिकृत क्षेत्र खाली करना था, उसे सेना हटानी थी जो आज तक उसने नहीं किया। जम्मू कश्मीर में हमारे 14 हजार से ज्यादा निर्दोष नागरिक आतंकवादियों के हमलों में मारे गए हैं यह तथ्य दुनिया के सामने रखा जा चुका है। वे कह रहे थे कि कश्मीरियों की हत्याओं की स्वतंत्र जांच कराएं। वे भूल गए कि फिर उसके तार पाकिस्तान तक भी पहुंचेंगे। हालांकि संयुक्त राष्ट्र इसमें किसी तरह हाथ डालने ही वाला नहीं है। बड़े देश पहले ही इसे द्विपक्षीय मुद्दा मान चुके हैं। इसलिए नवाज की इस कवायद का व्यर्थ जाना पहले से ही निश्चित था। ऐसा नहीं है कि नवाज इसे नहीं जानते। किंतु पाकिस्तान की जो अंदरुनी स्थिति है। पनामा लीक में परिवार के सदस्यों के नाम आने के बाद उनके खिलाफ जो वातावरण है उसमें अपनी रक्षा के लिए उनके पास यही एक चारा था जिससे वे परंपरागत भारत विरोधी मानसिकता वालों के सामने हीरो बन सकते थे तथा सेना की नजर में सुर्खरु कहला सकते थे।

किंतु इसमें वे गलतियां करते चले गए। नवाज का भाषण ऐसा था मानो वहां जो बैठे हैं वो अशिक्षित हैं या अखबार नहीं पढ़ते, उनके बारे में जानते नहीं। उनकी बॉडी लैंग्वेज भी देखने लायक थी। चेहरे पर थकान का भाव, एकदम लयहीन भाषण, आवाज में दम नहीं...। ऐसा तभी होता है जब आपको पता होता है कि जो कुछ आप बोल रहे हैं उसमें सच का अभाव है तथा जिसकी आप अपील कर रहे हैं उसे स्वीकारना तो छोड़िए, कोई सुनने वाला नहीं है।