मराठवाड़ा में दलित और मराठा संघर्ष का इतिहास पुराना है और एट्रोसिटी कानून को हटाने के मुद्दे पर एक बार फिर दलित और मराठा आमने-सामने हैं। सारे दलित समुदाय को दोषी मानकर उसे मिले सुरक्षा के विशेषाधिकारों को छीनने की मांग गैर-वाजिब है। मराठा लंबे समय से शासक रहे हैं और उनकी सामाजिक हैसियत ऐसी कमजोर नहीं है कि उनपर अत्याचार की नियमित घटनाएं हों। आज जिस तरह से शासक वर्ग में विद्रोह की भावना उमड़ रही है वह पूरे लोकतंत्र के लिए घातक संकेत दे रही है। 

महाराष्ट्र के सोलापुर शहर में मराठा समुदाय के लाखों लोगों का मूक प्रदर्शन हुआ है। शहर में लाखों लोग जमा हुए,  पहले गुजरात फिर हरियाणा और अब महाराष्ट्र में उभरे शासक वर्ग के आंदोलन ने जहां राज्य सरकार की नींद हराम कर दी है वहीं भारतीय लोकतंत्र की तमाम अवधारणाओं पर प्रश्न-चिह्न खड़ा कर दिया है। अगर गुजरात में पटेलों ने आरक्षण के लिए राज्य सरकार की चूलें हिला दीं तो हरियाणा में जाटों ने पूरे राज्य को युद्ध क्षेत्र में बदल दिया था। अब वही स्थिति महाराष्ट्र में है। यह जानते हुए कि मराठों ने जो मांगें की हैं उसमें सिर्फ कोपर्डी दुष्कर्म कांड पर कार्रवाई करने के अलावा कोई और मांग मानना असंभव है, कांग्रेस, राकांपा, भाजपा और शिवसेना समेत सारे दल इस आंदोलन के साथ खड़े हैं।  

अभी यह प्रदर्शन मराठावाड़ा और पश्चिम महाराष्ट्र में ही हुए हैं लेकिन अब इनकी आग विदर्भ और कोंकण के इलाकों में भी फैल रही है। अगले माह मुंबई में जो प्रदर्शन होगा, उसमें पता नहीं, कितने लाख लोग शामिल होंगे। ये प्रदर्शन मराठा लोग क्यों कर रहे हैं? इसका तात्कालिक उत्तेजक कारण है, अहमदनगर जिले के कोपर्डी नामक गांव में एक मराठा लड़की की हत्या! चार दलितों ने उसके साथ पहले बलात्कार किया और फिर उसकी हत्या कर दी। लाखों मराठा लोग मांग कर रहे हैं कि इन बलात्कारी हत्यारों को तुरंत फांसी पर लटकाओ। इन्हें इसलिए मत छोड़ दीजिए कि ये दलित हैं।

यह मांग उठते-उठते इतने जोर से उठ गई कि इसमें से कई नई मांगे भी पैदा हो गई हैं। मराठा समुदाय ने एक मांग यह भी कर दी है कि उन्हें भी अति पिछड़ा ओबीसी वर्ग में शामिल कर नौकरी और शिक्षा में आरक्षण दिया जाए। प्रदर्शनकारियों की अन्य मांगों में किसानों के लिए पेंशन और किसान आत्महत्याओं को रोकने के लिए नए प्रावधान बनाने और दलितों की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों को रद्द करने की मांगे शामिल हैं।

मौजूदा संवैधानिक ढांचे के भीतर न तो 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण संभव है और न ही मौजूदा स्थितियां संसद से 1989 में पारित अनुसूचित जाति और जनजाति अत्याचार विरोधी कानून को खत्म करने की इजाजत देती हैं। जहां कांग्रेस-एनसीपी की तरफ से मराठों को दिए आरक्षण को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है वहीं बाबासाहेब आंबेडकर की 125वीं जयंती पर दलितों को न्याय दिलाने का संकल्प जताने वाले राजनीतिक दल कैसे उस कानून को खत्म करेंगे जो दलितों को कहीं राहत देता है। इसके बावजूद राजनीतिक दल मराठों की 32 प्रतिशत आबादी और उसका आक्रोश देखकर इतने घबरा गए हैं कि वे उन दलितों की ओर से मुंह मोड़ने लगे हैं, जिनकी आबादी महज 11 प्रतिशत है। राजनीतिक दल न्याय अन्याय और सही-गलत का आग्रह भी छोड़ बैठे हैं।

मराठवाड़ा में दलित और मराठा संघर्ष का इतिहास पुराना है और एट्रोसिटी कानून को हटाने के मुद्दे पर एक बार फिर दलित और मराठा आमने-सामने हैं। केंद्रीय सामाजिक न्याय अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास आठवले ने राज्यभर में मराठा समाज द्वारा निकाले जा रहे मोर्चों पर कहा, `मराठा समाज के मोर्चे को मेरा समर्थन है लेकिन मैं एट्रोसिटी कानून को रद्द नहीं होने दूंगा। यदि एट्रोसिटी कानून रद्द करना है तो पहले अत्याचार बंद करिए। यदि एट्रोसिटी कानून में आवश्यक संशोधन के बारे में कोई सुझाव आएगा तो मंत्रालय उस पर उचित विचार करेगा।

निश्चित तौर पर जिन दलितों ने अहमदनगर जिले के कोपर्डी गांव में मराठा नाबालिग लड़की से दुष्कर्म और हत्या का अपराध किया उन्हें कानून के मुताबिक सजा मिलनी चाहिए। किंतु सारे दलित समुदाय को दोषी मानकर उसे मिले सुरक्षा के विशेषाधिकारों को छीनने की मांग गैर-वाजिब है। महाराष्ट्र के ज्यादातर मुख्यमंत्री मराठा रहे हैं,  मराठा लंबे समय से शासक रहे हैं और उनकी सामाजिक हैसियत ऐसी कमजोर नहीं है कि उन पर अत्याचार की नियमित घटनाएं हों। आज जिस तरह से शासक वर्ग में विद्रोह की भावना उमड़ रही है वह पूरे लोकतंत्र के लिए घातक संकेत दे रही है।

राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों को इस दिशा में काम करना होगा कि सामाजिक न्याय और विकास के जिस सिद्धांत पर हमारा लोकतंत्र चल रहा है उसका लाभ सबको मिले और उससे लगातार सामाजिक तनाव कम करने में मदद मिले।