यह कहना मुश्किल है कि वर्तमान सरकार की कश्मीर संबंधी नीतियों में ऐसा आमूल बदलाव आ गया है जिसे एअर मार्शल ने व्यक्त कर दिया है। भारत कश्मीर समस्या के समाधान के लिए सैन्य बल के प्रयोग की दिशा में विचार कर रहा है इसके भी अभी संकेत नहीं है। अरुप राहा ने ऐसा कहा भी नहीं है। हां, उन्होंने यह अवश्य कहा कि अब माहौल बदल गया है एवं हम संघर्ष से निपटने और अपनी रक्षा करने के लिए हवाई शक्ति का प्रयोग करने को तैयार हैं।

वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल अरूप राहा का यह कथन कि कश्मीर मुद्दे पर उच्च नैतिक आदर्शों पर चलने की बजाय अगर हमने सेना का इस्तेमाल करने की व्यावहारिक नीति अपनाई होती तो आज पीओके हमारा होता, देश को आत्ममंथन को प्रेरित करता है।

भारतीय सेना का अनुशासन दुनिया के लिए एक मिसाल है। सेना की ओर से कभी ऐसे वक्तव्य नहीं दिए जाते जिस पर राजनीतिक नेतृत्व को स्पष्टीकरण देना पड़े। जाहिर है, जब भी सेना का कोई बड़ा अधिकारी ऐसा बयान देता है जो देश की रक्षा नीति से संबंधित हो तो उसे गंभीरता से लिया जाना स्वाभाविक है।

यह कहना मुश्किल है कि वर्तमान सरकार की कश्मीर संबंधी नीतियों में ऐसा आमूल बदलाव आ गया है जिसे एअर मार्शल ने व्यक्त कर दिया है। भारत कश्मीर समस्या के समाधान के लिए सैन्य बल के प्रयोग की दिशा में विचार कर रहा है इसके भी अभी संकेत नहीं है। अरुप राहा ने ऐसा कहा भी नहीं है। हां, उन्होंने यह अवश्य कहा कि अब माहौल बदल गया है एवं हम संघर्ष से निपटने और अपनी रक्षा करने के लिए हवाई शक्ति का प्रयोग करने को तैयार हैं।

इसका अर्थ यह हुआ कि हम अतीत की तरह जब सेना के इस्तेमाल की आवश्यकता हो अति नैतिक आदर्श मूल्यों को अपनाकर उससे बचने की नीति पर नहीं चलने वाले। वास्तव में विदेश नीति संयुक्त राष्ट्र के चार्टर, गुट निरपेक्ष आंदोलन और पंचशील सिद्धांतों से आबद्व होने के कारण कई बार हमने सुरक्षा मोर्चे पर व्यावहारिक सोच नहीं अपनाया और उसका दुष्परिणाम आज तक भुगत रहे हैं।

1947 में कश्मीर पर कबायलियों के हमले को सेना ने अपनी शक्ति से रोका था। उस शक्ति को परिणाम तक इस्तेमाल किया जाना चाहिए था लेकिन हम संयुक्त राष्ट्र चले गए और हमारी विजय अधूरी रह गई। यही नहीं 1962 के युद्ध में भी हवाई ताकत का पूरा इस्तेमाल नहीं किया गया। 1965 के युद्ध में भी पूर्वी पाकिस्तान में हवाई ताकत का उपयोग नहीं किया गया जबकि पाकिस्तानी वायुसेना हमारे हवाई ठिकानों पर हमले कर रही थी। इन सब युद्वों के परिणाम हमारे सामने हैं। इसके विपरीत जब 1971 में वायु सेना का पूरी तरह उपयोग किया गया तो पाकिस्तान पराजित हुआ और बांग्लादेश बन गया।

इन सारी सच्चाइयों का निष्कर्ष यह है कि जहां सैन्य ताकत की आवश्यकता हो वहां अनावश्यक नैतिक मूल्यों की बजाय इसके सम्पूर्ण इस्तेमाल की नीति अपनाई जानी चाहिए ताकि परिणाम हमारे पक्ष में आए। भारत में फैसला राजनीतिक नेतृत्व को करना होता है सेना केवल उसको अमल में लाती है। देखना है अरुप साहा के इस कथन से हमारा राजनीतिक नेतृत्व सीख लेता है या नहीं।