यह भारत जैसे उदार व सहिष्णु देशों में ही संभव है कि आप अलगाव और देशद्रोह का खुलेआम राग अलापिए, मासूम युवाओं को भड़काइए और राज्य व राष्ट्र की संपत्ति को नुकसान पहुंचाइए, बावजूद आपका बाल भी बांका होने वाला नहीं है। पाकिस्तान के पक्ष में और भारत के विरोध में नारे लगाने वाले ऐसे लोगों को हम देशद्रोही नहीं मानते हुए, उनकी सुरक्षा और एश-ओ-आराम पर करोड़ों रुपए खर्च करते आ रहे हैं। यह एक ऐसी हैरानी में डालने वाली वजह है, जो अलगाववादियों का न केवल भारत में पोषण कर रही है, बल्कि वे भारतीय पारपत्र के जरिए दूसरे देशों की साजमीं पर इतारते हुए भारत के खिलाफ मानवाधिकारों के हनन की वकालत करते हुए, विद्रोह की आग भी उगल रहे हैं। सुरक्षा और सरकारी धन की यह इफरात ही अलगाववादियों को दुनिया में इतराते फिरने का मौका दे रही है। गोया, सुरक्षा और धन दोनों पर ही पुनर्विचार कर इन्हें प्रतिबंधित करने की जरूरत है।

हालांकि अब शांति बहाली कोशिशों में जम्मू-कश्मीर के दो दिनी दौरे पर गए सर्वदलीय संसदीय प्रतिनिधि मंडल के कुछ सदस्यों से मिलने से इंकार करना अलगाववादी नेताओं को महंगा पड़ सकता है। केंद्र सरकार ने इस घटना के बाद अपना रुख कड़ा करने का संदेश दिया है। अलगाववादियों को मिलने वाली सुविधाएं रोकी जा सकती है। इन सुविधाओं को बंद करने की अब देशभर में मांग भी उठ रही है। इन सुविधाओं को बंद करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि हुर्रियत समेत सभी अलगाववादियों संगठन घाटी में माहौल खराब कर रोज नई समस्याएं पैदा कर रहे है। ऐसे लोग सख्ती से निपटने पर ही बाज आएंगे।

केंद्रीय गृह मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि जम्मू-कश्मीर के अलगाववादियों को सरकार बेहतर सुरक्षा प्रदान करती है। यानी जो देश-विरोधी गतिविधियों में ढाई दशक से लिप्त हैं, उन्हें राज्य एवं केंद्र सरकार की तरफ से सुरक्षा-कवच मिला हुआ है। यही नहीं, इन्हें सुरक्षित स्थलों पर ठहराने, देश-विदेश की यात्राएं कराने और स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने पर पिछले 5 साल में ही 560 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। मसलन सालाना करीब 112 करोड़ रुपए इन अलगाववादियों का पृथक्तावादी चरित्र बनाए रखने पर खर्च किए जा रहे हैं। इनकी सुरक्षा में निजी अंगरक्षकों के रूप में लगभग 500 और इनके आवासों पर सुरक्षा हेतु 1000 जवान तैनात हैं। पूरे जम्मू-कश्मीर राज्य के 22 जिलों में 670 अलगाववादियों को विशेष सुरक्षा दी गई है। जबकि ये पाकिस्तान का पृथक्तावादी अजेंडा आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं। इनके स्वर बद्जुबान तो हैं ही, पाकिस्तान परस्त भी हैं। कश्मीर के सबसे उम्रदराज अलगाववादी नेता सैयद अली गिलनी कहते हैं, ‘यहां केवल इस्लाम चलेगा। इस्लाम की वजह से हम पाकिस्तान के हैं और पाक हमारा है।’ अलगाववादी महिला नेत्री असिया अंद्राबी पाक का कश्मीर में दखल कानूनी हक मानती हैं। कमोबेश यही स्वर यासीन मलिक और मीरवाइज उमर फारुक के हैं। यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि हम इनकी बद्जुबानी भी सह रहे हैं और इन्हें सुरक्षा व व्यक्तिगत खर्च के लिए धन भी मुहैया करा रहे हैं। विश्व में शायद ही किसी अन्य देश में ऐसी विरोधाभासी तस्वीर देखने को मिले? बावजूद भारत सरकार ऐसे बर्ताब को देशद्रोही नहीं मानती है, तो तय है, इन अलगाववादियों का सरंक्षण कालांतर में देश के लिए आत्मघाती ही साबित होगा?

कश्मीरी अलगाववादियों को देश-विदेश में हवाई-यात्रा के लिए टिकट सुविधा, पांच सितारा होटलों में ठहरने व वाहन की सुविधाएं मुहैया कराई जा रही हैं। स्वास्थ्य खराब होने पर दिल्ली के एम्स से लेकर अपोलो एस्कॉर्ट और वेदांता जैसे महंगे अस्पतालों में इनका उपचार कराया जाता है। इन सब खर्चों को राज्य और केंद्र सरकार मिलकर उठाती हैं। हाल ही में जम्मू-कश्मीर विधानसभा परिशद् में भाजपा सदस्य अजात शत्रु ने इस परिप्रेक्ष्य में आष्चर्यजनक खुलासा किया है। उन्होंने बताया है कि पृथक्तावादियों को विधायकों, मंत्रियों और विधान परिशद् के सदस्यों से कहीं ज्यादा सुरक्षा मिली हुई है। बाद में अजात शत्रु ने जो आंकड़े प्रस्तुत किए, उससे सदन अवाक रह गया। राज्य में कुल 73,363 पुलिसकर्मी हैं, इनमें से समूचे राज्य के 670 अलगाववादियों की सुरक्षा में 18000 कर्मी तैनात हैं। राज्य के सर्व शिक्षा अभियान का कुल वार्षिक खर्च 486 करोड़ है, जबकि इस सुरक्षा पर 560 करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं। अलगाववादियों को ठहरने के लिए महंगे होटलों में 500 कमरे भी आरक्षित हैं। देश के खिलाफ बगावत का स्वर उगलने वालों को इतनी सुख-सुविधाएं सरकार दे रही है, तो भला वे अलगाव से अलग होने की बात सोचें ही क्यों? देश की मुख्यधारा में क्यों आएं? राज्य सरकार इस सुरक्षा को उपलब्ध कराने का कारण अलगाववादी नेताओं और आतंकी संगठनों में कई मुद्दों पर मतभेद बताती रही है। इस तकरीर से ही साफ है कि अलगाववादी राष्ट्र या राज्य के नहीं, बल्कि आतंकवादियों के कहीं ज्यादा निकट हैं। लिहाजा इनके अलगाव के स्वर को पनाह देना कतई राष्ट्रहित में नहीं है।

ये अलगाववादी कितने चतुर हैं और अपने परिवार के सदस्यों के सुरक्षित भविश्य के लिए कितने चिंतित हैं, यह इनकी कश्मीरियों के प्रति अपनाई जा रही दोगली नीति से पता चलता है। इनका यह आचरण ‘तुम सांप के बिल में हाथ डालो, मैं मंत्र पढ़ता हूं’ जैसे मुहाबरे को चरितार्थ करता है। 2010 में पुलिस व सेना पर बच्चों, किशोरों और युवाओं से पत्थर फेंकने का तारीका मसरत आलम नाम के अलगाववादी ने ईजाद किया था। 125 युवाओं की जान झोंक देने वाली इस भारत विरोधी गतिविधि में मसरत की कोई संतान शामिल नहीं रही। इनके सभी बच्चे घाटी से बाहर दिल्ली के महंगे शिक्षा संस्थानों में पढ़कर भविश्य संवारने में लगे हैं। खुद खाएं गुलगुले और गुड़ से करें परहेज वाली कहावत सैयद अली गिलनी पर भी लागू होती है। आतंकी बुरहान बानी की क्रब पर जमा लोगों को अपने ऑडियो संदेश के जरिए जिहाद और इस्लाम का पाठ पढ़ने वाले इस चरमपंथी के तीन बेटे और तीन बेटियों में से एक भी अलगाववादी जमात का हिस्सा नहीं है। ये घाटी से बाहर दिल्ली और अमेरिका में पढ़-लिखकर वैभवशाली जीवन जी रहे हैं। यही नहीं इनकी मौज-मस्ती और कश्मीर में अलगाववादी गतिविधियां चलाने के लिए इन्हें विदेशों से भी अकूत धन मिल रहा है। इस विदेशी धन के अमत की अब केंद्र सरकार जांच भी करा है। लिहाजा इन संदर्भों में अमन-पसंद कश्मीरियों को हकीकत से रूबरू होकर अलगाववादी नेताओं की मुंहतोड़ जबाव देने की जरूरत है।

केंद्र सरकार द्वारा कश्मीर में शांतिवार्ता के लिए जो सर्वदलीय प्रतिनिधि मंडल भेजा गया था, वह दो दिनी दौरा करके बिना किसी बातचीत के वापिस लौट आया है। अलगाववादी महबूबा मुफ्ती के द्वारा न्यौते जाने के बावजूद बैठक में तो शामिल हुए ही नहीं, अलबत्ता जो सांसद अलगाववादियों के पास बिन बुलाए महमान की तरह घर पहुंचे, उनके लिए दरवाजे भी नहीं खोले गए। अलगाववादियों का आहत करने वाला यह व्यवहार इस बात का प्रतीक है कि वे एक तो कश्मीर में शांति स्थापित करना नहीं चाहते, दूसरे शांति स्थापना उनके बूते की बात ही नहीं रह गई। क्योंकि हम सब जानते हैं कि कश्मीर में अशांति और आतंक की जड़ तो पाकिस्तान में है। इस दृष्टि से सीमापार से संचालित ताकतों को कश्मीर में हालात-सुधार का कारक मानना ही देश के लिए नुकसानदेह है। इन्हें तो पूरी तरह बातचीत से अलग-थलग करके, इन्हें मिलने वाले सुरक्षा व धन संबंधी संसाधनों पर अकुंश लगाने की तो जरूरत है, साथ ही इन्हें देशद्रोह के दायरे में लाकर इनकी मुश्कें भी कसने की जरूरत है।