सी.बी.आई. ने 17 हजार करोड़ रू. के रोजवैली चिटफंड घोटाले में कथित संलिप्तता के आरोपी सुदीप बंदोपध्याय को गिरफ्तार क्या किया कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने सारी मर्यादाएं तोड़ दी। ज्ञातव्य है कि 30 दिसम्बर को सी.बी.आई. पोंजी योजना घोटाला में ऋणमूल के एक और सांसद तापस पाल को पहले ही गिरफ्तार कर चुकी है। जहां तक सुदीप बंदोपध्याय की गिरफ्तार का प्रश्न है तो इसके पूर्व दो बार वह पूछताछ के लिये सीबीआई द्वारा बुलाये जाने के बावजूद नही आए, और जब तीसरी बार आए तो सीबीआई के वह बहुत सारे सवालों के जवाब नही दे सके, यहॉ तक कि बहुत सारे सवालों का उन्होंने जवाब ही नही दिया। यह बताना प्रासंगिक होगा कि वर्ष 2014 के अंत में चिटफंड घोटाला सामने आया था जिसमें ममता बनर्जी की पार्टी के दो सांसद कुणाल घोष और सृंजय बोस को गिरफ्तार किया गया था।

सुदीप बंदोपाध्याय की गिरफ्तारी को लेकर ममता और उनकी पार्टी ने काफी तीखे तेवर दिखाए। ममता और उनकी पार्टी के लोगों ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार के नोटबंदी का विरोध किये जाने के चलते बदले की भावना से यह गिरफ्तारियां की गई हैं। ममता और उनकी पार्टी सिर्फ आरोप प्रत्यारोप पर ही नही रूकीं, बल्कि उनकी पार्टी के लोगों ने भाजपा के कलकत्ता स्थिति कार्यालय और दूसरे कई कार्यालयों में हमले भी किये- जिनमें तोड़-फोड़ के साथ कई लोगों को चोटे भी आई। इतना ही नहीं केन्द्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो समेत कई भाजपा नेताओं के घरों में भी हमले किये गये। पश्चिम बंगाल प्रदेश भाजपा अध्यक्ष की कार पर भी हमला किया गया। यह भी उल्लेखनीय है कि भाजपा के कलकत्ता स्थिति मुख्यालय में तृणमूल के लोगों द्वारा कई घंटों तक हमला जारी रहा और पुलिस मूकदर्शक बनी रही। स्पष्ट है कि इन हमलों के पीछे ममता भी मूक सहमति थी, वरना इस तरह की खुलेआम गुंडागर्दी करने का एक राजनीतिक दल द्वारा सवाल ही नही पैदा होता। हद तो यह है कि मुख्यालय समेत कई जगह बम भी फेंके गये। तृणमूल के लोगों ने दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास में धरना देने एवं घेरने का प्रयास किया। इसके अलावा भुवनेश्वर में जहां सुदीप बद्योपध्याय को पूछताछ कि लिये ले जाया गया, वहां सीबीआई कार्यालय का भी घेराव किया गया। कुछ इसी तरह वर्ष 2014 के अंत में भी चिटफंड घोटाले में दो सांसदों की गिरफ्तारी पर ममता भड़क गई थी और सरकार के विरूद्ध प्रदर्शन भी किया था।

ममता बनर्जी का कहना है कि सुदीप बड़े सीनियर नेता है, वह तृणमूल के संसदीय बोर्ड में शामिल हैं। आनेवाले समय में मेरे और सांसदो एवं मंत्रियों को गिरफ्तार किया जायेगा, जिनमें अभिषेक बनर्जी, फिरहद हकीम, सोवान चटर्जी, शुभेन्द्र अधिकारी और मोलाए घातक का नाम शामिल है। ममता ने तो यहां तक कहा कि पी.एम. मोदी हम सभी को गिरफ्तार कर सकते है। ऐसी स्थिति में अहम सवाल यह कि हकीकत क्या है और ममता इस तरह से भड़क क्यों रही है। सच्चाई यही है कि चिटफंड घोटालों में पश्चिम बंगाल में लाखों गरीबों के अरबो रूपयों की लूट हुई है। यह भी एक सच्चाई है कि ममता बनर्जी की जानकारी में सारा मामला आने के बावजूद इन्होंने इस घोटाले की निष्पक्ष जहां के लिए कदम उठाना तो दूर, लीपा-पोती का प्रयास करती रहीं। मजबूरन सर्वोच्च न्यायालय को इस घोटाले की जांच सी.बी.आई. को सौपनी पड़ी-जिसमें तृणमूल नेताओं पर शिकंजा कसता गया। इस तरह से यह समझा जा सकता है कि जो सी.बी.आई. जॉच चल रही है, वह सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से चल रही है, न कि मोदी सरकार के आदेश से। पर ममता को यह बखूबी पता है कि यदि सर्वोच्च न्यायालय के खिलाफ कुछ ऊल-जलूल बोली तो न्यायालय अवमानना के दायरे में आ जायेंगी। फलत: “खिसियानी बिल्ली की तर्ज पर खम्भा नोच रहीं हैं”। बड़ा सवाल यह कि वह इतनी आक्रामक क्यों हैं? क्या उन्हें इस बात का डर है कि कही-न-कही जॉच के दायरे में वह भी आ सकती हैं। ऐसी खबरे है कि ममता बनर्जी की रैलियों में चिटफंड घोटाले के रूपयों का जमकर इस्तेमाल हुआ है। स्पष्ट है कि ममता अपनी छवि के अनुरूप यदि साफ-सुथरी और ईमानदारी होती तो वह स्वतः अपनी पार्टी के संदिग्ध लोगो से दूरी ही न बना लेती, बल्कि कानून को अपना काम भी करने देती-ताकि भ्रष्टाचारी और घोटालेबाज दंड के भागी हो सके। पर ममता हैं कि मोदी को सांय-पटाय बोलने के अलावा इसको राजनीतिक रंग दे रही है।

तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि ममता के राज में पश्चिम बंगाल में मुस्लिम-बाहुल्य क्षेत्रों में हिन्दुओं का जीना दूभर हो गया है। अभी 8 दिसम्बर को कलकत्ता से 20 कि.मी. दूर चूनागढ़ में हिन्दुओं के घर जलाये गये और उन पर तरह-तरह के अत्याचार किए गए। विडम्बना यह कि दंगाइयों को रोकने के लिये जो पुलिस भेजी भी गई वह उनके उग्र रूप को देखते ही दुम दबाकर भाग आई। गत वर्ष जनवरी माह में मालदा जिले में जिस ढंग से लाखों की मुस्लिम भीड़ ने थाने को जलाया, हिंसा का नंगा नाच किया, हिन्दुओं को निशाना बनाया। पर भाजपा ने जब इस मुद्दे को उठाया तो ममता ने उल्टे भाजपा पर ही यह आरोप जड़ दिया कि भाजपा इस तरह से साम्प्रदायिकता फैला रही है, यानी कि “उल्टा चोर कोतवाल को डांटे।” हद तो यह है कि ममता सिर्फ मुस्लिम साम्प्रदायिकता से ही नहीं, जेहादी आतंकवादियों से भी समझौता करने को तैयार रहती हैं। तभी तो अक्टूबर, 2014 में वर्धमान में हुये बम धमाकों को लेकर उनकी पुलिस अपराधियों को पकड़ना तो दूर, लीपा-पोती में लगी रही। जब मोदी सरकार ऐसे आतंकवादियों को पकड़कर ममता जैसे वोट के सौदागर राजनीतिज्ञों को बेकाब करती है तो यह ममता की नजर में पश्चिम बंगाल में दंगे का प्रयास हो जाता है, और मोदी दंगागुरु हो जाते हैं।

हकीकत यह है कि पश्चिम बंगाल मे भाजपा का तेजी से जनाधार बढ़ रहा है। यह नवम्बर माह में लोकसभा की दो सीटों पर हुए उपचुनाव में देखने को मिल भी चुका है। ऐसा लगता है कि देर-सबेर चिटफंड घोटाले की जांच ममता बनर्जी तक पहुंच सकती हैं क्योंकि तृणमूल कांग्रेस के निलंबित सांसद कुणाल घोष का कहना है कि इस घोटाले में  सबसे बड़ी लाभार्थी ममता बनर्जी हैं। ऐसी स्थिति में ममता को आने वाले समय में अपनी गिरफ्तारी की आशंका सता रही है। उनकी उच्छखंल और अमर्यादित वाणी एवं कृत्य इसी ओर इशारा कर रहे हैं। इसमे यह बखूबी समझा जा सकता है कि ममता और उनकी पार्टी का ऐसा गैर जिम्मेदाराना और अराजक रवैया क्यों है। एक ब़डा सच यह भी है कि तृणमूल कांग्रेस द्वारा जिस तरह से नंगा नाच-कर कानून व्यवस्था की ऐसी की तैसी की जा रही है, उसके चलते ममता पश्चिम बंगाल में शासन करने का अधिकार भी खो बैठी हैं।