कन्याकुमारी (तमिलनाडु), जनवरी 13 : गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “रामायण दर्शनम् और भारतमाता सदनम्” का उद्घाटन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से किया। इस दौरान कन्याकुमारी में व्यासपीठ पर रामकथावाचक संत मोरारी बापू, तमिलनाडु के सड़क व परिवहन मंत्री पों.राधाकृष्णन, विवेकानन्द केन्द्र के अध्यक्ष पी.परमेश्वरन, उपाध्यक्ष ए.बालकृष्णन तथा निवेदिता भिड़े एवं विवेकानन्द केन्द्र के महासचिव भानुदास धाक्रस विराजमान थे।

कन्याकुमारी स्थित केन्द्र के मुख्यालय परिसर विवेकानन्दपुरम् में स्थित इस भव्य  सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और धार्मिक उपहार “रामायण दर्शनम् और भारतमाता मंदिर” का उद्घाटन 12 जनवरी को स्वामी विवेकानन्द जयन्ती पर किया गया।

दिव्य और भव्य है रामायण दर्शनम्  

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वीडियो कॉन्फरन्स के माध्यम से अपने संबोधन में कहा कि, “आज विवेकानन्दपुरम में रामायण दर्शनम, भारतमाता सदनम का लोकार्पण हो रहा है। हनुमानजी की 27 फीट ऊंची प्रतिमा की और वो भी एक ही पत्थर की बनी हुई स्थापित की जा रही है। आप लोगों ने इससे संबंधित जो वीडियो मुझे भेजा था, वो मैंने देखा है और इस वीडियो को देखकर मैं कह सकता हूं इसमें दिव्यता भी है, भव्यता भी है। उन्होंने कहा कि आज ही विवेकानन्द केंद्र के संस्थापक स्वर्गीय एकनाथ रानडे जी की प्रतिमा का भी अनावरण हो रहा है। आप सभी को आज के इस आयोजन के लिए हृदय से बहुत बहुत बधाई देता हूं।

कन्याकुमारी, यह राष्ट्र की तपोभूमि

प्रधानमंत्री ने आगे कहा, “आज आप लोग जिस स्थान पर हैं वह सामान्य स्थान नहीं है। ये भूमि इस राष्ट्र की तपोभूमि की तरह है। अगर हनुमानजी को अपना जीवन ध्येय मिला तो इसी धरती पर मिला। जब जामवंत ने हनुमान से कहा था कि तुम्हारा तो जन्म ही भगवान श्री राम के कार्य के लिए हुआ है। इसी धरती पर मां पार्वती, कन्याकुमारी को जीवन ध्येय (purpose of life) मिला। यही वो धरती है जहां महान समाज सुधारक, संत थिरूवल्लूवर को दो हजार वर्ष पूर्व ज्ञान का अमृत मिला। यही वो धरती है जहां स्वामी विवेकानन्द को भी जीवन का उद्देश्य प्राप्त हुआ। यहीं पर तप करने के बाद उन्हें जीवन का लक्ष्य और लक्ष्य प्राप्ति के लिए मार्गदर्शन मिला था। यही वो जगह है जहां एकनाथ रानडेजी को भी अपने जीवन का, जीवन की जो यात्रा थी उसमें एक नया मोड़ मिला। एक नया लक्ष्य प्रस्थापित हुआ। उन्होंने अपना पूरा जीवन “एक जीवन एक ध्येय” (one life one mission) के रूप में इसी कार्य के लिये आहुत कर दिया। इस पवित्र भूमि को इस तपोभूमि को मेरा सत् सत् वंदन है, मेरा नमन है।”

दुनिया को भारत से अपेक्षा है  

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “वर्ष 2014 में जब हम एकनाथ रानडेजी के जन्म शताब्दी मना रहे थे, तब मैंने कहा था- कि ये अवसर युवाओं के मन को जगाने का है। हमारा भारत युवा है- वो दिव्य भी बने और भव्य भी बने। आज दुनिया भारत से दिव्यता की अनुभूति की अपेक्षा कर रही है और भारत का गरीब, दलित, पीड़ित, शोषित, वंचित ये भारत की भव्यता की अपेक्षा करता है। और विश्व के लिये दिव्यता तो देश के अंदर के लिये भव्यता और इन दोनों का मेल करके ही राष्ट्र निर्माण की दिशा में हमें आगे बढ़ना है।”

स्वामी विवेकानन्दजी के विचारों में राष्ट्र निर्माण की शक्ति

प्रधानमंत्री ने आगे कहा, “आज भारत दुनिया का सबसे युवा देश है। 80 करोड़ से ज्यादा जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु की है। स्वामी विवेकानन्द आज हमारे बीच नहीं हैं साक्षात रूप में नहीं हैं लेकिन उनके विचारों में इतनी शक्ति है, इतनी ताकत है, इतनी प्रेरणा है कि देश के युवाओं को संगठित करके राष्ट्र निर्माण का रास्ता दिखा रही है।”

उन्होंने कहा, “एकनाथ रानडे जी ने युवाओं की इस शक्ति को एकजुट करने के लिए, विवेकानन्द केंद्र और स्वामी विवेकानन्द रॉक मेमोरियल की स्थापना की थी। एकनाथ रानडे जी कहते थे कि हमें स्वामी विवेकानन्द अच्छे लगते हैं सिर्फ इतने भर से कुछ नहीं होगा। देश के लिए स्वामी विवेकानन्द ने जो कल्पना की है, उसे साकार करने के लिए वो सतत योगदान को भी महत्वपूर्ण मानते थे।”

एकनाथजी के सानिध्य ने मेरे जीवन को निखारा

प्रधानमंत्री मोदी ने विवेकानन्द केन्द्र के संस्थापक एकनाथजी रानडे को स्मरण करते हुए कहा, “एकनाथजी ने जिस एक लक्ष्य के लिए पूरा जीवन लगा दिया था, वो था- स्वामी विवेकानन्द जी जैसे युवकों का निर्माण। उन्होंने युवाओं में राष्ट्रनिर्माण के वही आदर्श स्थापित करने का हमेशा प्रयास किया, जो नीति, जो मूल्य स्वामी विवेकानन्द जी के थे। मेरा ये बहुत बड़ा सौभाग्य रहा कि जीवन के अनेक वर्षों तक मुझे एकनाथजी निकट के साथी के रूप में काम करने का अवसर मिला। इसी धरती पर कई बार आकर के उनके सानिध्य में जीवन को निखारने का मुझे अवसर मिलता था।” 

श्रीराम भारत के कण-कण में, जन-मन में है

प्रधानमंत्री ने कहा, “एकनाथजी के जन्मशती पर्व के दौरान ही तय हुआ था कि हमारे संस्कृति और हमारे विचार प्रवाह पर रामायण के प्रभाव को दर्शाती एक प्रदर्शनी शुरू की जाए। आज रामायण दर्शनम भव्य रूप में हम सभी के सामने है। और मुझे विश्वास है देश और दुनिया के जो यात्री रॉक मेमोरियल पर आते हैं। ये रामायण दर्शनम शायद उनको ज्यादा प्रेरित भी करेगा और प्रभावित भी करेगा। श्रीराम भारत के कण-कण में हैं। जन-जन के मन में हैं। और इसलिये जब हम श्रीराम के विषय में सोचते हैं, तो श्रीराम एक आदर्श पुत्र-भाई-पति, मित्र और आदर्श राजा थे। अयोध्या भी एक आदर्श नगर था तो रामराज्य एक आदर्श शासन व्यवस्था थी। इसलिए भगवान राम और उनके राज्य का आकर्षण समय-समय पर देश की महान शख्सियतों को अपने तरीके से रामायण की व्याख्या करने के लिए प्रेरित करता रहता है। इन व्याख्याओं की झलक अब रामायण दर्शनम में मिलेगी।”

रामराज्य का स्मरण

प्रधानमंत्री मोदी ने रामराज्य का स्मरण करते हुए कहा, “महाकवि कम्बन ने कंब रामायणम में कौशल राज्य को एक सुशासित राज्य बताया है। उन्होंने तमिल में जो लिखा, मैं उसका अंग्रेजी में अनुवाद अगर करूं तो उन्होंने लिखा था-

None were generous in that land as

None was needy;

None seemed brave as none defied;

Truth was unnoticed as there were no liars;

No learning stood out as all were learned.

Since no one in that City ever stopped learning

None was ignorant and none fully learned;

Since all alike had all the wealth

None was poor and none was rich.

ये कम्बन द्वारा रामराज्य का दर्शन है। महात्मा गांधी भी इन्हीं विशेषताओं की वजह से रामराज्य की बात करते थे। निश्चित तौर पर ये एक ऐसा शासन था, जहां व्यक्ति महत्वपूर्ण नहीं होता, बल्कि सिद्धांत महत्वपूर्ण हुआ करते थे।”

उन्होंने कहा, “गोस्वामी तुलसीदास ने भी रामचरितमानस में रामराज्य का विस्तार से वर्णन किया है। रामराज्य यानी जहां कोई गरीब न हो, दु:खी ना हो, कोई किसी से घृणा ना करता हो, जहां सभी स्वस्थ और सुशिक्षित हों। जहां प्रकृति और मनुष्य के बीच तालमेल हो। उन्होंने लिखा है-

दैहिक दैविक भौतिक तापा, राम राज नहिं काहुहि व्यापा।

सब नर करहिं परस्पर प्रीती, चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीति।

अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा,  सब सुंदर सब बिरुज सरीरा।

नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना,  नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना।

राम रावण को हरा कर बड़े नहीं बने, बल्कि राम तब राम बने जब उन्होंने उन लोगों को साथ लिया जव सर्वहारा थे। साधनहीन थे। उन्होंने उन लोगों का आत्म गौरव बहाल किया और उनमें विजय का विश्वास पैदा किया। भगवान राम के जीवन में उस भूमिका को स्वीकार नहीं किया जो उनके वंश द्वारा जो परम्पराएं थीं। एक एक वरों में कई बातें हमलोग जानते हैं। वो अयोध्या से बाहर निकले थे। अभी नगर की शरहद से भी बाहर नहीं निकले लेकिन पूरे विश्व को पूरी मानवता को अपने आप में समाहित करते हुए आदर्श क्या होता है मूल्य क्या होते हैं। मूल्यों के प्रति जीवन का समर्पण क्या होता है। उसे उन्होंने जी कर दिखाया था। और इसलिये मैं समझता हूं कि ये रामायण दर्शनम् ये अपनेआप में विवेकानन्दपुरम में एक प्रासंगिक और हम जानते हैं प्रगति के लिए समाज जितना सबल चाहिए राज्य भी सुराज्य होना चाहिए। जब रामजी को देखते हैं तो व्यक्ति का विकास, व्यवस्था का विकास ये बातें सहज रूप से नजर आती हैं।”   

आध्यात्मिक शक्तिकार्यशक्ति

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “एकनाथजी भी हमेशा चाहते थे कि देश की आध्यात्मिक शक्ति को जगाकर देश की कर्मशक्ति या कार्यशक्ति को विधायक (constructive) कार्यों में लगाया जाए। आज जब विवेकानन्द केंद्र में हनुमान जी की मूर्ति की स्थापना हो रही है, तो उनके इस कथन की प्रेरणा का भी पता चलता है।” उन्होंने कहा, “हनुमानजी यानी सेवा, हनुमानजी यानी समर्पण भक्ति का वो रूप था, जिसमें सेवा ही परम धर्म बन गया था। जब वो समुद्र को पार कर रहे थे तो मैनाक पर्वत उन्हें बीच में विश्राम देना चाहता था। लेकिन संकल्प सिद्धि से पहले हनुमानजी के लिए शिथिलता की कोई गुंजाइश नहीं थी। अपने लक्ष्य की प्राप्ति तक उन्होंने आराम नहीं किया।”

‘सबका साथ, सबका विकास’ हमारा तत्व

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि हम ‘सबका साथ, सबका विकास’ ये मार्गदर्शक तत्व पर चल रहे हैं। चाहे गरीब से गरीब व्यक्ति के लिये जनधन योजना के जरिये गरीबों को बैंकिंग व्यवस्था के साथ जोड़ा जाए। आज गरीब के पास एक व्यवस्था करके हमने आगे बढ़ने का प्रयास किया था, और इसलिए बीमा कराने का विकल्प है। किसानों को इसका लाभ मिला है। किसानों को सबसे कम प्रीमियम पर फसल बीमा योजना दी गई है। बेटियों को बचाने के लिए, उन्हें पढ़ाने के लिये अभियान चला रहे हैं- ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’। गर्भवती महिलाओं को आर्थिक मदद के लिए देशव्यापी योजना बनाई गई है। 5 करोड़ परिवार जो लकड़ी का चूल्हा जलाकर माताएं खाना पकाती थीं। और एक दिन में चार सौ सिगरेट का धुंआ खाना पकाने से लड़की के चूल्हे से उस मां के शरीर में जाता था। उन माताओं को अच्छा स्वास्थ्य मिले। प्राथमिक सुविधा मिले। 5 करोड़ परिवारों में गैस कनेक्शन का बीड़ा उठाया और डेढ़ करोड़ दे चुके हैं।

उन्होंने कहा कि दलित, पीड़ित, वंचित की सेवा यही तो जन सेवा प्रभु सेवा का मंत्र देती है। हमारे देश के दलित नौजवानों को स्टैंड-अप इंडिया, स्टार्ट-अप इंडिया के जरिए सशक्त किया जा रहा है। छोटे कारोबारियों को कम ब्याज पर कर्ज मिल सके, इसलिए मुद्रा योजना चलाई गई है। गरीब की गरीबी तभी दूर होगी जब उसे सशक्त किया जाए। जब गरीब सशक्त होगा, तो स्वयं गरीबी को प्रास्त करके रहेगा। और गरीबी से मुक्ति का वो आनन्द लेगा और एक नई ताकत के साथ वो आगे बढ़ेगा।

राजकोष का लाभ अपात्रों को न मिले

प्रधानमंत्री मोदी राम-भरत संवाद का उल्लेख करते हुए कहा कि रामायण में जब भगवान राम और भरत के बीच शासन को लेकर संवाद हो रहा था तब भगवान राम ने भरत से कहा था -

कच्चिद् अर्थम् विनिश्चित्य लघु मूलम् महा उदयम्।

क्षिप्रम् आरभसे कर्तुम् न दीर्घयसि राघव।।

यानी, हे भरत, ऐसी योजनाएं लागू करो जिनसे कम से कम व्यय में ज्यादा से ज्यादा लोगों का फायदा हो। रामजी ने भरत से ये भी कहा कि इन योजनाओं को लागू करने में बिल्कुल भी देरी ना की जाए।

आयः ते विपुलः कच्चित् कच्चिद् अल्पतरो व्यय:।

अपात्रेषु न ते कच्चित् कोशो गग्च्छति राघव।।

यानी भरत, इस बात का ध्यान रखना की आय ज्यादा हो और खर्च कम। वो इस बात की भी हिदायत देते हैं कि अपात्रों को राज्य कोष का फायदा न मिले। अपात्रों से सरकारी खजाने को बचाना भी सरकार की कार्य संस्कृति का हिस्सा है। आपने देखा होगा हमने आधार कार्ड से लिंक करके बैंक अकाउंट में सीधे आर्थिक सहायता ट्रांसफर करना, फर्जी राशनकार्ड वालों को हटाना, फर्जी गैस कनेक्शन वालों को हटाना, फर्जी टीचरों को हटाना, दूसरों का अधिकार छीनने वालों को हटाना, ये सब इस सरकार ने मिशन मोड में लिया है।

संत थिरूवल्लूवर का सूत्रवाक्य

प्रधानमंत्री ने कहा, “आज ही भारतमाता सदन में पंचधातु से बनी मां भारती की प्रतिमा का अनावरण भी हो रहा है। मां भारती के इस प्रतीक का लोकार्पण सौभाग्य की बात है। जो भी व्यक्तिगण इस विशेष यज्ञ में जुटे थे, उन सभी का मैं इस पुण्य कार्य के लिए अभिवादन करता हूं।” उन्होंने कहा कि मैं विवेकानन्द रॉक मेमोरियल के समीप बनी संत थिरूवल्लूवर की प्रतिमा को भी प्रणाम कर रहा हूं। थिरूवल्लूवर जो सूत्रवाक्य, जो मंत्र दे गए थे, वो आज भी उतने ही सटीक हैं, relevant हैं। नौजवानों के लिए उनकी सीख थी-

“In sandy soil, when deep you delve, you reach the springs below; The more you learn, the freer streams of wisdom flow.”

यानी रेतीली धरती में जितना गहरा आप खोदते जाएंगे, एक दिन पानी तक जरूर पहुंचेंगे। ठीक वैसे ही जैसे आप जितना ज्यादा सीखते जाएंगे एक दिन ज्ञान की, बुद्धिमत्ता की गंगा तक अवश्य पहुंचेंगे।

आज युवा दिवस पर मेरा देश के नौजवानों से आह्वान है- सीखने की इस प्रक्रिया को कभी मत रुकने दीजिए। अपने भीतर के इस विद्यार्थी को कभी मरने मत दीजिए। जितना आप सीखेंगे, जितनी आप अपनी आध्यात्मिक शक्ति को विकसित करेंगे, जितना आप अपनी कौशल को विकसित करेंगे, उतना ही आप का भी विकास होगा और देश का भी।

विवेकानन्द केन्द्र के कार्यों की सराहना

प्रधानमंत्री ने कहा, “कुछ लोग आध्यात्मिक शक्ति (spiritual power) की जब बात आती है तो उसको समझ नहीं पाते हैं उसको पंथ के दायरे में देखते हैं। लेकिन spiritual power ये पंथ से परा है, बंधनों से परा है। इसका सीधा संबंध मानवीय मूल्यों से है। दैविक शक्ति से है। हमारे पूर्व राष्ट्रपति और इसी धरती के सपूत डॉक्टर ए पी जे अब्दुल कलाम कहा करते थे-

“Spirituality to me is the way we relate to God and the Divine. Staying connected with our spiritual life keep us grounded and always be reminded of the value of life and important values such as honesty, loving our neighbours, and many other important traits that will make the workplace a positive environment”.

मुझे खुशी है कि पिछले कई दशकों से विवेकानन्द केंद्र इसी दिशा में प्रयास भी कर रहा है। आज विवेकानन्द केंद्र की दो सौ से ज्यादा ब्रांच हैं। देशभर में 800 से ज्यादा जगहों पर केंद्र के प्रोजेक्ट चल रहे हैं। स्वास्थ्य, शिक्षा, ग्रामीण भारत और संस्कृति जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में लगातार काम कर रहा है।”

प्रधानमंत्री ने कहा, “पटना से लेकर पोर्ट ब्लेयर तक, अरुणाचल प्रदेश के कार्बी आंग्लांग से लेकर कश्मीर के अनंतनाग तक, रामेश्वरम से लेकर राजकोट तक उसकी उपस्थिति है। दूर-दराज वाले इलाको में लगभग 28 हजार छात्रों को इस केंद्र के जरिए शिक्षा दी जा रही है। मैं विशेष तौर पर उत्तर पूर्व के राज्यों में विवेकानन्द केंद्र के कार्यों की सराहना करना चाहूंगा। एकनाथ जी के रहते ही अरुणाचल प्रदेश में 7 रिहाइशी स्कूल खुले थे। आज उत्तर पूर्व में 50 से ज्यादा जगहों पर विवेकानन्द केंद्र सामाजिक कार्यों से जुड़ा है।”

उन्होंने कहा, “अनगिनत छात्र, आईआईटी स्टूडेंट, डॉक्टर और कई प्रोफेशनल्स स्वेच्छा से विवेकानन्द केंद्रों में सेवाव्रती के तौर पर काम करते हैं। इसके लिए उन्हें किसी प्रकार की सैलरी नहीं दी जाती, बल्कि या सब सेवाभाव से किया जाता है। मैं मानता हूं कि नि:स्वार्थ भाव से समाज की सेवा के लिए ये सेवाव्रती हम सभी के लिए प्रेरणा हैं। सामान्य जीवन को जीते हुए समाज सेवा का आदर्श उदाहरण है। देश के युवाओं के लिए एक दिशा है, एक मार्ग है। विवेकानन्द केंद्र से जुड़े लोग आज राष्ट्र निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। मुझे उम्मीद है कि ये केंद्र आने वाली पीढ़ियों में इसी तरह नए विवेकानन्द का निर्माण करता रहेगा।

राष्ट्र निर्माण के लिए समर्पित हर व्यक्ति विवेकानन्द 

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “आज हर वो व्यक्ति जो राष्ट्र निर्माण में pro-active होकर अपना दायित्व निभा रहा है, वो विवेकानन्द है। हर वो व्यक्ति जो दलित-पीड़ित-शोषित और वंचितों के विकास के लिए काम कर रहा है, वो विवेकानन्द है। हर वो व्यक्ति जो अपनी ऊर्जा (energy) को, अपने उपाय (ideas), अपने आविष्कार (innovation) को समाज के हित में लगा रहा है, वो विवेकानन्द है। आप सभी जिस मिशन में जुटे हैं, वो मानवता के लिए, हमारे समाज के लिए, हमारे देश के लिए एक बड़ी तपस्या की तरह है। आप ऐसे ही भाव से देश की सेवा करते रहें, यही कामना है।” 

उन्होंने कहा, “मुझे निमंत्रण दिया गया कन्याकुमारी आने के लिए। मेरा अपना घर है ये। देखता हूं कब मौका मिलता है दौड़ता रहता हूं। दौड़ते – दौड़ते कभी एकाद बार बीच में मौका मिल जाएगा। मैं जरूर वहां उस धरती को नमन करने के लिये आ जाऊंगा। आपके बीच कुछ समय बिताऊंगा। मुझे इस अवसर पर मैं वहां रुबरू नहीं आ सका इसका खेद है लेकिन फिर भी दूर से सही। यहां दिल्ली में ठंड है वहां गर्मी है। इन दो के बीच हम नई ऊर्जा और उमंग के साथ आगे बढ़ेंगे। इसी विश्वास के साथ आप सब को इस पावन पर्व पर बहुत बहुत शुभकामनाएं। बहुत बहुत धन्यवाद।”

उल्लेखनीय है कि रामायण दर्शनम् वाल्मीकि रामायण पर आधारित है। मंदिर परिसर में भगवान शिव की मूर्ति है, साथ ही महावीर हनुमान की 27 फिट ऊंची मूर्ति काले ग्रेनाइट के पत्थर से बनी है। भारतमाता की पंचधातु से निर्मित 15 फिट मूर्ति बहुत ही आकर्षक है।