- मुकुल कानिटकर

माता-पिता के प्रति हमारे मन में भाव है क्या? अगर नहीं है तो परिवार नहीं बन सकता। विवाह से परिवार बनता है, लेकिन उससे भी पहले, जन्म से बनता है। इसलिए यदि उस जन्मदाता को आप भूल गए तो परिवार कि रक्षा कैसे होगी? मन का विस्तार में से मेरा परिवार; उस परिवार में कितने बड़े स्तर तक हम जा सकते है- माता-पिता, अपने बुजुर्ग, चाचा, ताऊ, मामा, मामी - यह परिवार कितना बड़ा हो सकता है? फिर मन को उसके आगे ले जाकर समाज, राष्ट्र और राष्ट्र से आगे सृष्टि और अंत में सृष्टि से आगे जाकर व्यक्ति सारी वसुधा को कुटुंब मान सकेगा। पर इसकी पहली सीढ़ी तो परिवार है न, इसलिए यह है भारतीय परिवार व्यवस्था। उसका पुनरुज्जीवन, उसका रक्षण, उसकी सेवा - यह धर्म की रक्षा पहला अंग है। पहला चरण है। जब तक हमारे परिवार में हिंदुत्व का आचरण नहीं होगा, तब तक हम समाज को क्या बताएंगे? इसलिए केवल व्यवहारिक तौर पर आत्मावलोकन के लिए प्रश्न पूछा, क्या हम इतने बड़े हो गए कि माता-पिता पीछे छूट गए? सोचो! अगर माता-पिता छूटे नहीं है तो भगवान् का धन्यवाद करना, रोज़ भगवान् से प्रार्थना करना कि सुबह उठते ही मैं उनके चरण छू सकूं ऐसे वन्दनीय माता पिता मेरे घर में बने रहे।

संस्कार सौदेबाजी नहीं होती, संस्कार आचरण से होते हैं। आपने बच्चों के लिए अगर बहुत कुछ किया है तो इससे बच्चों को यह संस्कार मिला।  अब वे अपने बच्चों के लिए बहुत करेंगे। वो आपके लिए तब करेंगे जब आप अपने माता-पिता के लिए कुछ कर रहे हो। यह सौदेबाजी नहीं है कि मैंने तेरे लिए किया तो तू मेरे लिए करेगा। आप यदि माता-पिता की सेवा करेंगे तो आपके बच्चे आपकी सेवा करेंगे। आपने माता-पिता को छोड़कर केवल बच्चों के लिए कष्ट किये तो वो भी आपको छोड़कर अपने बच्चों के लिए कष्ट करेंगे। यह बहुत सरल सा नियम है।

यह कैसे होगा? बहुत सरल सी बात है। परिवार का आधार ही यही है- ‘विवाह’। विवाह शब्द का अर्थ नहीं समझाया जाता आजकल। सारी वैदिक परम्पराएं तो की जाती है; होम, हवन, सप्तपदी, सब करते हैं; पर जब अग्नि में लाई डालते हैं, धुंआ निकलता है, आँखों से पानी आने लगता है तब वही से पंडित जी ‘जल्दी करो, निपटाओ’ शुरू हो जाता है। इस चक्कर में मन्त्र तो सुनते नहीं, यदि मंत्र सुनते तो विवाह का अर्थ पता चलता। विवाह का अर्थ है -विशेषण ‘वहति इति विवाह’ - जिस सम्बन्ध का विशेषत्व से वहन करना होता है वह विवाह है। इसलिए अर्धांगिनी कहते हैं, दोनों एक दूसरे के बिना अपूर्ण हैं इसलिए यह वह विशेष सम्बन्ध है। वह दूसरे के साथ निभाने का सम्बन्ध नहीं है, वह अपने साथ निभाने का सम्बन्ध है। जब यह अपनापन हो जाता है तब पति के माता-पिता अपने माता-पिता हो जाते हैं, वे सास-ससुर नहीं रह जाते और यही बात पत्नी के माता-पिता के लिए पति पर लागू होती है। यदि अपने जीवनसाथी के माता-पिता मेरे माता-पिता नहीं हुए हैं, तो चाहे विवाह प्रमाणपत्र लेकर घुमते रहो, आपका विवाह नहीं हुआ है। यदि उनके प्रति अपने माता-पिता जितना अपनत्व, आत्मीयता और प्रेम मन की गहराई से नहीं उमड़ता तो आपका वो विवाह प्रमाणपत्र आपके विवाह का प्रमाणपत्र नहीं है। आपके विवाह का प्रमाण पत्र तो है आपका व्यवहार। किस प्रकार से सम्बन्ध का वहन करते हैं, उसे निभाते हैं, वही आचरण ही प्रमाण पत्र है। आप जब उस परिवार के साथ एकाकार हो जाते हैं- जीवनसाथी के भाई, बहन, माता-पिता, आपके भाई-बहन, माता-पिता हो जाते हैं- जब दोनों परिवार एक हो जाते हैं, तब वह विवाह है। अगर ऐसा नहीं हुआ है तो वह विवाह नहीं है केवल पशुवत जीवन है, केवल मैथुन है। जब ‘दो’ है ही नहीं; एक हो गए, दूजा भाव समाप्त हो जाता है, जब इस आत्मीयता से एकत्व की अनूभूति करते हुए जीवन जीते हैं; तब उसे विवाह कहा जाता है। उससे परिवार का जन्म होता है।  इसलिए पारिवारिक मूल्यों को जीवन में उतारने के लिए चार बातें जीवन में लानी पड़ती हैं -1) आत्मीयता 2) त्याग 3) सहयोग 4) संगठन।

भारतीय परिवार व्यवस्था में आजकल आयाम बदल रहे हैं जिनके चलते कभी-कभी हो सकता कि आपकी नौकरी कहीं दूर शहर से बाहर हो जिस कारण आपको अपने माता-पिता से दूर रहना पड़ता हो। लेकिन वे आपके हृदय में से निश्चित ही दूर नहीं होने चाहिए। एक जगह बच्चों के सामने बोल रहा था, उनको भी अपने जैसा प्रचारक बनने की प्रेरणा दे रहा था।  तभी एक बालिका ने खड़े होकर कहा, ‘आप तो हमारे बीच आकर शेर की तरह दहाड़ मारकर भाषण दे रहे हो लेकिन वहां घर पर आपकी माँ रो रही होगी।” मैंने कहा, “मैं सौभाग्यशाली हूं कि मुझे ऐसी वीर माँ मिली है कि जिसने एक बार भी अपनी आँख से आंसू नहीं निकाले। जब मैंने अपना जीवन राष्ट्र को समर्पित करने का निर्णय बताया तब से लेकर आज तक माँ कभी नहीं रोई है।” पहली बार निर्णय सुनाने पर बोली थी, “तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा? इस भारतमाता ने ही तेरा पालन पोषण किया है, अब अपना जीवन भारतमाता के लिए लगा दे, मेरा आशीर्वाद है।” माथे पर तिलक लगाकर माँ ने मुझे विदा किया। यह गर्व और सौभाग्य का विषय है। परन्तु प्रश्न यह है कि इस सबके बावजूद क्या मैं अपनी माँ से दूर हूं? आज मैं यहां अयोध्या में और मेरी माँ वहां नागपुर में है तो क्या हमारे बीच 1800-2200 कि.मी. की दूरी है? या मेरी माँ हृदय में मेरे साथ, मेरे व्यक्तित्व में यहां सब के बीच विराजमान है और मेरे अन्दर लोग मेरी माँ के दर्शन कर रहे हैं? वहां तो केवल मेरी माँ का शरीर है, उसका आत्मतत्व तो मेरे साथ यहां पर विद्यमान है जब अपने माता-पिता के प्रति मन में यह भाव आ जाएगा, उस समय माता-पिता आपसे दूर नहीं हो सकते। व्यवसाय या व्यवहार के कारण भले ही वे दूर हों लेकिन मन से दूर नहीं होने चाहिए।

जहां तक संभव हो, व्यवहार में भी दूर नहीं होने चाहिए। रोज़ सुबह उठकर उनके पांव छूने ही चाहिए। आप छुओगे तो बच्चे आपके पांव छुएंगे। अब पैर छूने से क्या होता है ये मत पूछना। उनके वैज्ञानिक कारण भी हैं जिनकी खूब मीमांसा हुई है। लेकिन उसके भावात्मक कारण ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। पांव इसलिए छूने हैं ताकि आपके मन में विनम्रता का भाव आए कि मैं कोई तीस-मार-खां नहीं हूं, मुझसे बड़ा भी कोई है। यह विनम्रता ही मन को विस्तार देती है। संस्कृत में श्लोक है जिसमें बताया है, बड़ों के पांव छूने से आयु, निरोगी काया, स्वास्थ्य, धन ये सब कुछ मिलता है। अब यह धन मिलता है सुनकर अगर मन में आए “वाह! धन मिलता! बढ़िया है! पैकेज बढ़ जाएगा, प्रमोशन हो जाएगा। हां, अब छुएंगे। नहीं! स्वार्थ के लिए नहीं छूना है। सुबह उठते ही यह हमारा पहला काम हो।

तिलक क्यों लगाना है, शिखा क्यों बढानी है, हमारी हर परंपरा के पीछे एक वैज्ञानिक कारण है, कुछ भी अवैज्ञानिक नहीं है। अगर उसके पीछे का विज्ञान पता न भी हो तो कोई बात नहीं। नुकसान भी तो नहीं है न? हम सब मोबाइल का प्रयोग करते हैं लेकिन इसका कार्य कैसे होता है, उसके पीछे का विज्ञान मालूम न होते हुए भी उपयोग कर लेते हैं। उपकरण उपयोग के लिए होते हैं, विश्लेषण के लिए नहीं। कुछ विद्वानों को विश्लेषण करते रहने दो, आप तो श्रद्धा से पालन करो कि इस ऋषिभूमि में एक छोटी से बात भी अवैज्ञानिक नहीं थी। विज्ञान जानने की जरुरत नहीं है। केवल मोबाइल का प्रयोग करने के लिए मोबाइल का विज्ञान जानना जरूरी है क्या? माइक का उपयोग करने के लिए माइक में से आवाज़ कैसे बढ़ रही है उसका विज्ञान फिजिक्स के प्रोफ़ेसर बता देंगे, लेकिन आपको पता है क्या? उसकी जरुरत है क्या? माइक का उपयोग केवल वही करें जिसको उसके पीछे का विज्ञान पता है ऐसा कहना मूर्खता है या नहीं? क्या वही मूर्खता हम हिन्दू धर्म की सारी परम्पराओं के बारे में नहीं कर रहे हैं? हम कहते हैं कि तिलक क्यों लगाये, पहले बताओ क्यों लगाना है? विज्ञान बताओ। जो भी यह कहता है उसको (कहना चाहिए) पहले पहले जो कैमरा इस्तेमाल करते हो उसका विज्ञान बताओ फिर कैमरा इस्तेमाल करना। मोटरसाइकिल क्यों चलाते हो? क्योंकि वह उपयोगी है, वैसे ही तिलक लगाने से कुछ न कुछ भला होता है तभी तो ऋषियों ने तिलक लगाने का प्रावधान रखा न इसलिए माता-पिता के चरण छुओ। अपने हृदय में श्रद्धा को धारण करो। श्रद्धा को धारण करने से ही धर्म की रक्षा होगी।