श्रीनगर, जनवरी 19: पुरखों की धरती छोड़ विस्थापित जीवन व्यतीत करने पर मजबूर हजारों कश्मीरी पंडितों की सम्मान के साथ वापसी होगी। जम्मू-कश्मीर विधानसभा में कश्मीरी पंडितों की वापसी वाला प्रस्ताव आखिरकार गुरुवार को पारित हो गया है।राज्य में बीजेपी-पीडीपी गठबंधन की सरकार बनने के बाद से ही कश्मीरी पंडितों की वापसी के प्रयास शुरू हो गए थे। केंद्र की मोदी सरकार की प्राथमिकता सूची में भी पंडितों को वापस घाटी में बसाना शामिल है। राज्य सरकार ने मिश्रित आवास योजना के तहत इन पंडितों को बसाने की बात कही है।

बता दें की वर्तमान में 62,000 से अधिक कश्मीरी पंडितों का परिवार पीढ़ियों का घर बार छोड़ घाटी से बाहर निर्वासित जीवन बिता रहा है। लगभग 40,000 परिवार जम्मू और 20,000 दिल्ली में रह रहे हैं। कुछ देश के अन्य भागों में बसे हैं।

इससे पहले घाटी में कश्मीर पंडितों के वापस लौटने का विरोध करने वालों को जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने करारा जवाब दिया था। ऐसे लोगो से विधान परिषद में महबूबा ने सवाल किया था कि ‘हमारे लोगों’ की वापसी से किस प्रकार जनसांख्यिकी में बदलाव आ जाएगा। मुख्यमंत्री ने कहा, जिन्होंने हमें पढ़ाया है, हमारे साथ पले-बढ़े हैं और जिनके घरों में हम खाना खाया करते थे और जो हमारी संस्कृति के अविभाज्य अंग हैं, उनके कश्मीर लौटने से किस प्रकार जनसांख्यिकीय बदल जाएगी? मैं इस तर्क को नहीं समझ पा रही हूं।

सदियों से कश्मीर में रह रहे कश्मीरी पंडितों को 1990 में पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद के कारण घाटी छोड़नी पड़ी या उन्हें जबरन निकाल दिया गया। विभाजन के तुरंत बाद ही कश्मीर पर पाकिस्तान ने कबाइलियों के साथ मिलकर आक्रमण कर दिया और बेरहमी से कई दिनों तक कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार किए गए, क्योंकि सेना को आदेश देने में बहुत देर कर दी गई थी। इस देरी के कारण जहां पकिस्तान ने कश्मीर के एक तिहाई भू-भाग पर कब्जा कर लिया, वहीं उसने कश्मीरी पंडितों का कत्लेआम कर उसे पंडित विहीन कर दिया।