नई दिल्ली, जनवरी 2: चुनाव सुधार की दिशा में उच्चतम न्यायलय ने सोमवार को अपने ऐतिहासिक फैसले में धर्म के नाम पर वोट मांगना गैरकानूनी करार दिया है। शीर्ष न्यायालय ने कहा चुनाव एक धर्मनिरपेक्ष पद्धति है इसलिए धर्म, जाति और सम्‍प्रदाय के नाम पर वोट मांगने वाले उम्‍मीदवारों को अयोग्‍य घोषित कर उनकी उम्मीदवारी रद्द की जाए।उच्‍चतम न्‍यायालय की सात सदस्यीय संविधान बेंच ने फैसला किया है कि कोई भी राजनेता जाति, समुदाय और धर्म के नाम पर वोट नहीं मांग सकता और अगर कोई भी उम्‍मीदवार इस फैसले का उल्‍लंघन करता है तो उसे अयोग्‍य घोषित कर दिया जायेगा। न्‍यायालय का यह फैसला हिन्‍दुत्‍व मामले में कई याचिकाओं की सुनवाई के दौरान आया है।

सात न्‍यायाधीशों की संविधान पीठ ने बहुमत के आधार पर फैसला दिया कि धर्म के नाम पर वोट मांगना चुनाव कानूनों के तहत व्‍यवस्‍था को भ्रष्‍ट करता है। पीठ ने कहा कि मनुष्‍य और ईश्‍वर के बीच का संबंध निजी इच्‍छा है और राज्‍य को इसमें हस्‍तक्षेप  नहीं करना चाहिए। न्‍यायालय ने कहा कि चुनाव एक धर्मनिरपेक्ष प्रक्रिया है और इसके नियमों का पालन किया जाना चाहिए। पीठ ने कहा कि संविधान की धर्म निरपेक्षता का पालन किया जाना चाहिए।

चुनाव आयोग के मुताबिक धर्म के नाम पर चुनाव प्रचार नहीं किया जा सकता है। आयोग ने पहले ही इसे लेकर नियम तय किया हुआ है लेकिन फिर भी ऐसा होता है क्योंकि इस पर कानून साफ नहीं था। सोमवार को देश की सर्वोच्च न्यायालय ने इसे ही परिभाषित किया।

हालांकि, इससे पहले मुख्य न्यायाधीश ने उस फैसले की समीक्षा करने से इंकार कर दिया था, जिसमें हिंदुत्व को जीवनशैली बताया गया था। 1995 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जेएस वर्मा की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा था कि चुनाव के दौरान हिंदुत्व या हिंदूवाद का इस्तेमाल भ्रष्ट आचरण नहीं है, क्योंकि इसे भारत में जीवनशैली के रूप में देखा जाता है।