नई दिल्ली, जनवरी 20: गिरिजाघर अदालत से मिले तलाक को असंवैधानिक करार देते हुये सर्वोच्च न्यायालय ने कानूनी मान्यता देने से इंकार कर दिया है। अदालत ने इस संबंध में एक जनहित याचिका खारिज कर दी है। याचिका में न्यायालय से भारत में कैनन लॉ (ईसाई धर्म कानून) को ईसाईयों के पर्सनल लॉ के रूप में मान्यता देने की मांग की थी।

प्रधान न्यायाधीश जेएस खेहर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ के खंडपीठ ने कहा कि, गिरिजाघर की अदालत में क्रिश्चियन पर्सनल लॉ के तहत मंजूर की गई तलाक वैध नहीं है, क्‍योंकि यह कानून की अवहेलना नहीं कर सकती। वहीं केंद्र ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि क्रिश्चियन पर्सनल लॉ को भारतीय क्रिश्चियन मैरिज एक्ट 1972 और तलाक अधिनियम 1869 की जगह लेने की इजाजत नहीं दी जा सकती।

याचिकाकर्ता ने न्यायालय से भारत में कैनन लॉ (ईसाई धर्म कानून) को ईसाईयों के पर्सनल लॉ के रूप में मान्यता देने की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने 1996 के फैसले के मद्देनजर याचिका खारिज कर दी। उसमें ईसाइयों में शादी और तलाक का प्रावधान साफ किया गया था। कोर्ट ने कहा था कि अगर संसद ने कोई कानून बना दिया है तो वही प्रभावी माना जाएगा, न कि पर्सनल लॉ या कोई परम्परा। चर्च कोर्ट को ऐसे आदेश पारित करने का अधिकार नहीं है। तलाक देने का अधिकार सिर्फ कोर्ट को है।

उच्चतम न्यायालय ने 1996 के फैसले के मद्देनजर याचिका खारिज कर दी। उसमें ईसाइयों में शादी और तलाक का प्रावधान साफ किया गया था। कोर्ट ने कहा था कि अगर संसद ने कोई कानून बना दिया है तो वही प्रभावी माना जाएगा, न कि पर्सनल लॉ या कोई परम्परा। चर्च कोर्ट को ऐसे आदेश पारित करने का अधिकार नहीं है। तलाक देने का अधिकार सिर्फ कोर्ट को है।

इससे पहले मुस्लिमों के तीन तलाक पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बड़ा फैसला सुनते हुये असंवैधानिक करार दिया है। कोर्ट ने इसे मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ बताया है। न्यायालय ने सुनवाई के दौराना कहा है कि कोई भी पर्सलन लॉं बोर्ड संविधान से ऊपर नहीं है।