इन दिनों राष्ट्र, राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद जैसे शब्दों का प्रयोग आम हो चला है। जबकि इन शब्दों के पीछे गहन चिंतन विद्यमान है। इसलिए ‘राष्ट्र’ शब्द का प्रयोग किस देश के लिए किया जाए इसपर भी चिंतन करना बहुत आवश्यक है। मीडिया, जिसकी पहुंच बड़े धनवानों से लेकर सामान्य जनता तक है, आज बहुत हद तक सत्ता परिवर्तन के लिए कारक है। मीडिया केवल खबरें नहीं दिखाती, वह समस्याओं के समाधान भी तलाशती हैं। पर कई बार सामान्य जनता को भ्रम में डालने का काम भी करती है, कभी जानबूझकर तो कभी अज्ञानता के कारण। इसलिए जब भारत राष्ट्र की बात हो तो मीडियाकर्मियों के लिए आवश्यक है कि वे अपनी भूमिका को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में समझें। हम लोग भारतीय हैं, एक अर्थ में “भारत” ही हैं। ऐसे में आवश्यक है कि ‘भारत का भारत से परिचय हो’।  

दुनिया के सभी मत-सम्प्रदाय, यहां तक के वैज्ञानिक भी मानते हैं कि इस सृष्टि को कोई दैवीय शक्ति संचालित कर रही है। वह शक्ति कौन सी है, उसका स्वरूप कैसा है, इसपर ऋषियों ने बहुत अनुसंधान किये, तप किया। दैवीय शक्ति को जानने की जिज्ञासा अबतक शांत नहीं हुई और अनादि कल से यह अनुसंधान चलता आ रहा है।

राष्ट्र व देश की अवधारणा

हमारे यहां कहा जाता है कि सृष्टि यह दैवीय शक्ति से संचालित है, संसार की रचना ईश्वर ने की है। इसलिए कहा जाता है कि “देव निर्मितं देशं”। जिस भूमि विशेष का निर्धारण एक विशिष्ट सीमा तक सीमित हो, उसे देश कहते हैं। देश का एक शासक होता है, जिसके मार्गदर्शन में देश की व्यवस्थाएं संचालित होती हैं। पहले उस शासक को राजा के रूप में सब जानते थे। युग बदला, और ‘राजा’ के स्थान पर प्रधानमंत्री अथवा प्रेसिडेंट रूपी शासक अस्तित्व में आया। हम कह सकते हैं कि ‘देश’ राजनीति के  आधार पर चलता है। 

वहीं राष्ट्र (Nation) की अवधारणा व्यापक है। राष्ट्र किसी सीमा में नहीं बंधता, क्योंकि राष्ट्र यह सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मनोभाव से परिपूर्ण होता है। इसलिए कहा जाता है- “ऋषि निर्मितं राष्ट्रं”। ऋषिगण अपने तप, ज्ञान, शील और चरित्र से एक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जीवन मूल्यों को समाज में प्रतिष्ठित करते हैं। ऋषियों के संदेश को जीवन का अंग बनाकर जीनेवाले मनुष्यों के समूह से एक आदर्श समाज की रचना होती है। आदर्श समाज वह, जहां के मनुष्य समष्टि के हित के लिए स्वयं का त्याग करने को तत्पर रहता है। उस समाज की संस्कृति आध्यात्मिक मूल्यों पर आधारित होती है। समाज में परस्पर सहयोग की भावना होती है, आपस में कोई विद्वेष नहीं होता। ऐसे समाज जहां भी हो वह ‘राष्ट्र’ है।

आदर्श समाज रचना की संकल्पना भारत की देन है। ईश्वर की खोज और विश्व के कल्याण के लिए अनुसंधान करनेवाले ऋषि-मुनि हमारे यहां ही हुए, इसलिए हमारे भारतवर्ष को युगों से राष्ट्र की संज्ञा दी गई है। लेकिन आज भारत राष्ट्र में आदर्श समाज के बीच में बहुत सारे रोड़े हैं। सामाजिक विषमता, भेदभाव, आपसी विद्वेष और राजनीतिक स्वार्थ ने भारत के ‘राष्ट्र गौरव’ को चोट पहुंचाने का काम किया है। स्वार्थ इतना हावी है कि अपनी जाति, राजनीति और विद्वेष के चलते भारतीय जीवन मूल्यों को समाज जीवन से मिटाने का षड्यंत्र चल रहा है। भारत के इतिहास, संस्कृति और शिक्षा को लेकर आपस में कोई सहमति दिखाई नहीं देती। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के संस्थापक और आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने ‘राष्ट्र’ की संकल्पना को बहुत स्पष्टता से व्यक्त किया है। वे कहते हैं, “हम ऐसे लोगों के समूह को ‘राष्ट्र’ नहीं कह सकते जो भिन्न-भिन्न संस्कृतियों वाले, भिन्न-भिन्न विचारधाराओं वाले हों तथा जिनके इतिहास भिन्न हों, हिताहित कल्पनाएं परस्पर विरोधी हों, परस्पर शत्रुभाव मानते हों, जिनके आपसी सम्बन्ध भक्ष्य-भक्षक के रहे हों और जिनके रहने के मूल कारण भी एक से न हो।”  

संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरूजी गोलवलकर के अनुसार, “राष्ट्र सांस्कृतिक ईकाई होती है। जब किसी जनसमूह की ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक परम्पराएं एक हों, तब तक वह ‘राष्ट्र’ कहलाता है।” वहीं अन्त्योदय के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने कहा है, “जब एक मानव-समुदाय के समक्ष एक मिशन, विचार या आदर्श रहता है और वह समुदाय किसी भूमि विशेष को मातृभाव से देखता है तो वह ‘राष्ट्र’ कहलाता है।” दीनदयालजी ने यह भी कहा कि, “‘राष्ट्र’ एक स्थायी सत्य है। राष्ट्र की आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए ‘राज्य’ पैदा होता है।” 

इस तरह सामान इतिहासबोध, समान सांस्कृतिक जीवन, सामान विचारधारा, परस्पर मैत्रीभाव और किसी उदात्त ध्येय के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर देनेवाले लोगों का समूह जिस स्थान पर हो, जिस देश में हो वह ‘राष्ट्र’ ही कहलायेगा। वहीं स्वामी विवेकानन्दजी ने राष्ट्र के ध्येय के सम्बन्ध में कहा है, “प्रत्येक राष्ट्र का लक्ष्य विधाता द्वारा निर्धारित है। प्रत्येक राष्ट्र के पास संसार को देने के लिए कोई न कोई संदेश है। प्रत्येक राष्ट्र को किसी विशेष संकल्प की पूर्ति करनी है।” स्वामीजी ने आगे कहा, “व्यक्ति को मुक्तिमार्ग पर बढ़ने के लिए पूर्ण आध्यात्मिक स्वतंत्रता, यही है हमारा राष्ट्रीय उद्देश्य। तुम चाहे वैदिक, जैन या बौद्ध, चाहे अद्वैत, विशिष्टाद्वैत अथवा द्वैत, किसी भी ‘मत’ को टटोल लो, ये सभी इस उद्देश्य पर एक हैं।” स्वामीजी ने कहा है, “हमारा ‘धर्म’ ही हमारे तेज, हमारे बल, इतना ही नहीं तो हमारे राष्ट्रीय जीवन का भी मूलाधार है।” स्वामी विवेकानन्द के अनुसार, धर्म ही भारत का प्राण है, हमें इसे ही पुष्ट करना होगा। इस दृष्टि से कहा जाए तो धर्म ही “राष्ट्र” का प्राण होता है।           

राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता 

राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता इन दोनों शब्दों का प्रयोग आजकल सामान्य हो चले हैं। हिंदी शब्दकोष में भी इसके लगभग सामान अर्थ हैं। शब्दकोश के अनुसार, ‘राष्ट्रवाद’ वह सिद्धांत है जिसमें अपने राष्ट्र के हितों को सबसे अधिक प्रधानता दी जाती है, जबकि ‘राष्ट्रवादी’ वह है जो अपने राष्ट्र या देश के कल्याण का पक्षपाती हो। राष्ट्रीयता का तात्पर्य है अपने राष्ट्र के विशेष गुण अथवा अपने राष्ट्र के प्रति उत्कट प्रेम।

आजकल राजनीतिक दल और मीडिया के लोग किसी व्यक्ति के पद विशेष पर “राष्ट्रीय” शब्द का प्रयोग करते दिखाई देते हैं। जैसे राष्ट्रीय अध्यक्ष, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, राष्ट्रीय महासचिव आदि। कांग्रेस जो भारत की स्वतंत्रता के लिए बनी थी, आजकल “भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस” के नाम से जानी जाती है। वर्तमान कांग्रेस में ‘राष्ट्रीयता’ कितनी है, सब जानते हैं। अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या महासचिव के हृदय में ‘राष्ट्रीयता’ हो न हो उसके पद और नाम के आगे ‘राष्ट्रीय’ लगा दिया जाता है। ‘राष्ट्रीय’ का अर्थ ‘अखिल भारतीय’ नहीं है, इसलिए किसी व्यक्ति या संगठन के नाम के पहले ‘राष्ट्रीय’ तभी लगाना चाहिए जब वह राष्ट्र के लिए समर्पित हो, अन्यथा ‘अखिल भारतीय’ ही कहना ही उचित होगा। 

‘राष्ट्रीयता’ के मर्म को स्वामी विवेकानन्द, महात्मा गांधी, डॉ. हेडगेवार, डॉ. आंबेडकर, माखनलाल चतुर्वेदी, मैथिलीशरण गुप्त, रामधारीसिंह दिनकर आदि महापुरुष समझते थे। इसलिए उनके संवाद, उनके संदेश, उनकी कविताएं “राष्ट्रीयता” के परिचायक थे। इसलिए राष्ट्र को समर्पित संगठन के रूप में डॉ. हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) नामक संगठन की स्थापना की।   

जब राष्ट्रीयता शब्द अपनेआप में पूर्ण है तो राष्ट्रवादी शब्द आया कहां से? मार्क्सवाद की तर्ज पर समाजवाद, मनुवाद जैसे शब्द तो मार्क्सवादियों ने गढ़े। बाद में हमारे हिंदी के प्रगतिवादी लेखकों और मीडिया ने राष्ट्रीयता की भावना जो प्रत्येक देशवासी के लिए ऊर्जा, प्रेरणा और समर्पण के संस्कार जगाती है, के स्थान पर ‘राष्ट्रवादी” शब्द का प्रयोग करना प्रारंभ कर दिया। राष्ट्र के प्रति प्रेम व समर्पण की भावना वाले को “राष्ट्र का पक्षपाती” के रूप में ‘राष्ट्रवादी’ बना दिया गया। यह शब्द इतना अधिक प्रचलित हो गया कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के रूप में राजनीतिक दल भी बन गया। ‘राष्ट्रीयता’ यह अपने राष्ट्र के प्रति भक्तिभाव को प्रगट करता है, जबकि ‘राष्ट्रवाद’ शब्द प्रगतिवादी लेखकों की देन है। 

देशप्रेम और देशभक्ति

मानवीय जीवन में प्रेम को सबसे अधिक महत्त्व प्राप्त हुआ है। महापुरुषों ने प्रेम की महिमा गाई है। सद्गुरु कबीर साहब ने प्रेमरहित मनुष्य हृदय के सम्बन्ध में कहा है,

जा घट प्रेम न संचरे, सो घट जान मसान

जैसे खाल लुहार की, सांस लेतु बिन प्रान।।

स्वामी विवेकानन्द जब साढ़े तीन वर्षों के बाद अमेरिका से भारत लौट रहे थे, तब उनके एक  विदेशी मित्र ने पूछा, “स्वामीजी, आप तीन वर्षों तक वैभवशाली देश में रहकर अपने गरीब देश भारत में लौट रहे हैं। अब अपने देश के प्रति आपकी कैसी भावना है?”

स्वामीजी ने बहुत मार्मिक उत्तर दिया जिससे प्रेम और भक्ति की अवधारणा स्पष्ट हो जाएगी। स्वामी विवेकानन्दजी ने कहा, “पहले तो मैं अपनी मातृभूमि से प्रेम ही करता था अब तो इसका कण–कण मेरे लिए तीर्थ हो गया है।”  अर्थात प्रेम से ऊपर का भाव भक्ति है। ‘हिंदी साहित्य का इतिहास” के लेखक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने निबंध “श्रद्धा-भक्ति” में कहा है, “प्रेम का कारण बहुत कुछ अनिर्दिष्ट और अज्ञात होता है; पर श्रद्धा का कारण निर्दिष्ट और ज्ञात होता है।” आचार्य शुक्ल ने आगे कहा कि, “श्रद्धा और प्रेम के योग का नाम भक्ति है।” इससे स्पष्ट होता है कि समर्पण की भावना का पहला आयाम प्रेम है, उसके बाद श्रद्धा और फिर भक्ति। भक्ति यह समर्पण की सर्वोच्च स्थिति है। इसलिए प्रेम, श्रद्धा और भक्ति की अवधारणा को समझे बिना देशप्रेम और देशभक्ति की संकल्पना को नहीं समझा जा सकता।

यूं तो हमारे मीडिया जगत में देशभक्ति और देशप्रेम की गाथा को बहुत बार दोहराया जाता है। विशेषकर, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में 15 अगस्त और 26 जनवरी, क्रिकेट या युद्ध के दौरान देशभक्तों का गुणगान करने और देशभक्ति जगाने के लिए सिनेमा के गीतों को दिखाने की परम्परा रही है। पर मीडिया में देशभक्ति की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कोई कार्यक्रम नहीं दिखाया जाता। देशभक्ति के प्रगटीकरण के भी कुछ आयाम होते हैं। क्या इस बात पर मीडिया ने कभी अनुसंधान किया है? नहीं। यदि ऐसा होता तो क्रिकेट में जीत के बाद अथवा 15 अगस्त और 26 जनवरी को सड़कों पर डीजे की धुन में हो-हल्ला मचाते, थिरकते युवाओं के असभ्य और अनुशासनहीन कृत्यों को अनुशासित कृति में परिवर्तित करने के लिए कोई अभियान चलाया जाता।

हमारे देश में तो क्रिकेट, युद्ध, 15 अगस्त और 26 जनवरी के दौरान ही देशवासियों की लिमिटेड देशभक्ति सड़कों पर भिन्न-भिन्न प्रकार से दिखाई देती है। ऐसा नहीं है कि देशप्रेम अथवा देशभक्ति हमारे नागरिकों में है ही नहीं। निश्चित रूप से देशभक्त, देशप्रेमी अपने जीवन के महत्वपूर्ण समय निराश्रित बालकों के पोषण, स्वस्थ्य और शिक्षा के लिए लगाते हैं। सीमा पर जवान, देश में किसान, समाज में विद्वान् यहां तक कि सफाई कर्मचारी अपने कर्मों के द्वारा भारतमाता की पूजा करते हैं। पर ऐसे समर्पित लोग कभी हो-हल्ला नहीं मचाते। इसलिए  देशभक्ति के आयाम को भी हमें समझना होगा।

9 फरवरी, 1897 को मद्रास (चेन्नई) के विक्टोरिया पब्लिक हॉल में “मेरी क्रांतिकारी योजना” नामक अपने व्याख्यान में स्वामी विवेकानन्द ने ‘देशभक्ति’ की तीन सीढ़ियां बतलाई।

स्वामीजी ने कहा, “लोग देशभक्ति की चर्चा करते हैं। मैं भी देशभक्ति में विश्वास करता हूं, और देशभक्ति के सम्बन्ध में मेरा भी एक आदर्श है। बड़े काम करने के लिए तीन बातों की आवश्यकता होती है। पहला है – हृदय की अनुभव शक्ति। बुद्धि या विचारशक्ति में क्या है? वह तो कुछ दूर जाती है और बस वहीं रुक जाती है। पर हृदय तो प्रेरणास्त्रोत है! प्रेम असंभव द्वारों को भी उद्घाटित कर देता है। यह प्रेम ही जगत के सब रहस्यों का द्वार है। अतएव, ऐ मेरे भावी सुधारकों, मेरे भावी देशभक्तों, तुम अनुभव करो!

क्या तुम अनुभव करते हो कि देव और ऋषियों की करोड़ों संतानें आज पशु-तुल्य हो गयीं हैं? क्या तुम हृदय से अनुभव करते हो कि लाखों आदमी आज भूखे मर रहे हैं, और लाखों लोग शताब्दियों से इसी भांति भूखों मरते आए हैं? क्या तुम अनुभव करते हो कि अज्ञान के काले बदल ने सारे भारत को ढंक लिया है? क्या तुम यह सब सोचकर बेचैन हो जाते हो? क्या इस भावना ने तुमको निद्राहीन कर दिया है? क्या यह भावना तुम्हारे रक्त के साथ मिलकर तुम्हारी धमनियों में बहती है? क्या वह तुम्हारे हृदय के स्पंदन से मिल गयी है? क्या उसने तुम्हें पागल-सा बना दिया है? क्या देश की दुर्दशा की चिंता ही तुम्हारे ध्यान का एकमात्र विषय बन बैठी है? और क्या इस चिंता में विभोर हो जाने से तुम अपने नाम-यश, पुत्र-कलत्र, धन-संपत्ति, यहां तक  कि अपने शरीर की भी सुध बिसर गए हो? तो जानो, कि तुमने देशभक्त होने की पहली सीढ़ी पर पैर रखा है- हां, केवल पहली ही सीढ़ी पर!”

स्वामी विवेकानन्द ने आगे कहा, “अच्छा, माना कि तुम अनुभव करते हो; पर पूछता हूं, क्या केवल व्यर्थ की बातों में शक्तिक्षय न करके इस दुर्दशा का निवारण करने के लिए तुमने कोई यथार्थ कर्त्तव्य-पथ निश्चित किया है? क्या लोगों की भर्त्सना न कर उनकी सहायता का कोई उपाय सोचा है? क्या स्वदेशवासियों को उनकी इस जीवन्मृत अवस्था से बाहर निकालने के लिए कोई मार्ग ठीक किया है? क्या उनके दुखों को कम करने के लिए दो सांत्वनादायक शब्दों को खोजा है? यही दूसरी बात है। किन्तु इतने से ही पूरा न होगा!”

उन्होंने कहा, “क्या तुम पर्वताकार विघ्न-बाधाओं को लांघकर कार्य करने के लिए तैयार हो? यदि सारी दुनिया हाथ में नंगी तलवार लेकर तुम्हारे विरोध में खड़ी हो जाए, तो भी क्या तुम जिसे सत्य समझते हो उसे पूरा करने का साहस करोगे? यदि तुम्हारे सगे-सम्बन्धी तुम्हारे विरोधी हो जाएं, भाग्यलक्ष्मी तुमसे रूठकर चली जाए, नाम-कीर्ति भी तुम्हारा साथ छोड़ दे, तो भी क्या तुम उस सत्य में संलग्न रहोगे? फिर भी क्या तुम उसके पीछे लगे रहकर अपने लक्ष्य की ओर सतत बढ़ते रहोगे? क्या तुममे ऐसी दृढ़ता है? बस यही तीसरी बात है।” स्वामी विवेकानन्द ने जोर देकर आगे कहा, “यदि तुममे ये तीन बातें हैं, तो तुममे से प्रत्येक अद्भुत कार्य कर सकता है। तब तुम्हें समाचारपत्रों में छपवाने की अथवा व्याख्यान देते फिरने की आवश्यकता न होगी। स्वयं तुम्हारा मुख ही दीप्त हो उठेगा! फिर तुम चाहे पर्वत की कन्दरा में रहो, तो भी तुम्हारे विचार चट्टानों को भेदकर बाहर निकल आयेंगे और सैकड़ों वर्ष तक सारे संसार में प्रतिध्वनित होते रहेंगे। और हो सकता है तब तक ऐसे ही रहें, जब तक उन्हें किसी मस्तिष्क का आधार न मिल जाए, और वे उसी के माध्यम से क्रियाशील हो उठें। विचार, निष्कपटता और पवित्र उद्देश्य में ऐसी ही ज़बर्दस्त शक्ति है।”

स्वामी विवेकानन्द के उपर्युक्त कथन से स्पष्ट होता है कि देशप्रेम और देशभक्ति की बातें करना जितना आसान है, उस पथ पर चलना उतना ही कठिन।

राष्ट्र है तो व्यक्ति है

व्यक्ति का जीवन, उसका ध्येय सबकुछ देश पर निर्भर करता है। जिस राष्ट्र में वह रहता है, उस राष्ट्र की संस्कृति, धर्म, उसका इतिहासबोध उसके जीवन की उन्नति के लिए प्रेरणादायी होता है। यदि हम सीरिया, ईराक या पाकिस्तान में पैदा होते तो हमारा जीवन कुछ और होता। हम भारत में जन्में हैं इसलिए हमारे जीवन का उद्देश्य उनसे अलग है। हमारी सोच, विचार और व्यवहार अन्य देश के नागरिकों से अलग है। क्योंकि हमारे राष्ट्र की संस्कृति, समाज की व्यवस्था और परिवार के संस्कारों में हमारा पोषण होता है। राष्ट्र के कारण राज्य हैं, राज्य के अन्दर समाज है, समाज के अन्दर परिवार है और परिवार में व्यक्ति पोषित होता है। इसलिए कहा जाता है, “देश हमें देता है सबकुछ हम भी तो कुछ देना सीखें।”

बड़ी ईकाई राष्ट्र है और राष्ट्र की सबसे छोटी ईकाई व्यक्ति है। सबसे छोटी ईकाई व्यक्ति ही समाज और राष्ट्र की शक्ति होती है। इसलिए मनुष्य के चरित्र निर्माण पर जोर दिया जाता है। हमें यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि राष्ट्र शाश्वत है जबकि मनुष्य मरता है। इसलिए राष्ट्र का महत्त्व मनुष्य से अधिक है। यही कारण है कि देशभक्तों ने महान राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए हंसते-हंसते अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया।       

पश्चिमी राष्ट्रवाद और भारत का राष्ट्रीय उद्देश्य  

यह सत्य नहीं है कि यूरोप, अफ्रीका, लतीनी अमेरिका जैसे पश्चिमी देशों में राष्ट्रवाद समाप्त हो रहा है। बल्कि पश्चिम में अपने राष्ट्र के हित के लिए वहां की जनता अधिक सजग और मुखर दिखाई देते हैं। पश्चिम जगत में तो अपने देश के हित के लिए दूसरे देश को समाप्त कर देने की तो होड़ लगी है। तेल संग्रह करने, व्यापार को बढ़ाने या फिर परमाणु शक्ति को बढ़ाने के लिए पश्चिमी देश सदैव आगे रहते हैं। जबकि भारत के सम्बन्ध में ऐसा नहीं कहा जा सकता। हमारे यहां राजनीतिक दल आपसी जीत-हार के लिए अधिक उत्सुक और प्रयत्नशील रहते हैं। दूसरा, अपने हित के लिए अन्य देशों को हानी पहुंचाना यह कभी भारत का उद्देश्य रहा ही नहीं। इतिहास साक्षी है कि भारत ने कभी भी दूसरे देशों में आक्रमण नहीं किया, न ही किसी देश की भूभाग को कब्जा करने की कभी चेष्टा की।

पश्चिम का राष्ट्रवाद भोग, व्यापार और विस्तारवाद पर आधारित है, जबकि भारत का राष्ट्रीय उद्देश्य अध्यात्म केन्द्रित है। भारत विश्व के कल्याण की कामना करता है। इसलिए भारत के इतिहास, धर्म, संस्कृति, शिक्षा और जीवन मूल्यों पर अध्ययन करना आज की आवश्यकता है। इसलिए मीडिया भारत की जनमानस को बदलने की क्षमता रखता है, उसके कर्ता-धर्ता, सम्पादकों और पत्रकारों की यह सामूहिक जिम्मेदारी है कि वह भारत को समझें, भारत को जानें और देश की जनता को भ्रम के मकड़जाल से निकालें। ‘भारत राष्ट्र’ को कभी भी ‘वाद’ का विषय न बनाएं, समस्यायों का समाधान तलाशें। इसी में राष्ट्र का हित है, सबका हित है।