- दिनेश दुबे

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मुंबई, जनवरी 6: चेहरे से रूखे दिखने वाले ओम पुरी ने दुनिया को दिखा दिया की महज अच्छा दिखना ही सिनेमा जगत में सफलता की सीढ़ी नहीं है। बल्कि इसके लिए चाहिए अदाकारी जो लोगो के दिलों में सीधे जा बसे। अपनी मंजिल खुद बनानेवाले ओमपुरी ने कहा था की, "मैंने हर तरह की फिल्में की हैं। शुरुआत आर्ट फिल्मों से की। उनसे मुझे संतुष्टि तो मिल रही थी, लेकिन कमर्शियल फिल्मों की वजह से गाड़ी-बंगला मिला। घर खरीदने को मौका मिला। अगर ऐसी फिल्में नहीं करता तो 40 साल बाद भी वहीं रह जाता। समय के हिसाब से लोगों को बदलना पड़ता है। इसी तरह मैंने भी खुद को बदला।"हरियाणा के अंबाला नगर में जन्में साधारण से दिखने वाले वाले ओम राजेश पुरी भले ही आज हमारे बीच नहीं है लेकिन उनकी उम्दा अदाकारी सदा हमारे दिल में जीवित रहेगी। मराठी नाटक घासीराम कोतवाल से अभिनय की दुनिया में कदम रखनेवाले ओम पुरी ने जल्द ही बॉलीवुड को अपने दमदार अभिनय से लोहा मनवा दिया। वर्ष 1980 में रिलीज फिल्म "आक्रोश" ओम पुरी की पहली हिट फिल्म साबित हुयी जिसने सभी के दिलों दिमाग पर ओम पूरी की छाप छोड़ दी। ओम पुरी को साल 1990 में भारत सरकार की तरफ से 'पद्म श्री' से सम्मानित किया गया।

‘अर्ध सत्य’

ओम पुरी उन चंद कलाकारों में से एक जिनके पास हास्य से लेकर गंभीर किरदारों को बखूबी निभाने का जौहर था। 1983 में ओम पूरी की ‘अर्ध सत्य’ फ़िल्म की जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है। इस फिल्म में ओम पूरी को एक नयी पहचान मिली जिसमे एक पुलिस ऑफिसर के किदार में वें सिस्टम में चल रहे गलत के खिलाफ आवाज़ उठा रहे है। इस फिल्म में ओम पूरी धीरे–धीरे अपने किरदार में ऐसे उतर जाते है की मानो यह कोई फिल्म नहीं बल्कि आंखो के सामने घटित कोई घटना हो। पता ही नहीं लगता की जो फिल्म में जो हो रहा है वह महज पर्दे तक ही सीमित है।Embeded Object

‘आक्रोश’

1980 में रिलीज हुयी गोविंद निहलानी द्वारा निर्देशित फिल्म ‘आक्रोश’ में ओम पुरी के ‌अलावा नसीरुद्दीन शाह और अमरीश पुरी ने मुख्य भूमिका निभाई थी। ओम पूरी की अद्वितीय अदाकारी ने इस फिल्म में 1980 के दशक के दौरान भारत में अनुसूचित जनजातियों के जीवन की कठोर वास्तविकताओं को रुपहले पर्दे पर उतारकर कर सबके सामने जीवित कर दिया। ओमपुरी को फिल्म 'आक्रोश' के लिए बेस्ट सहायक एक्टर का फिल्म फेयर अवॉर्ड मिला था। इस फिल्म में ओमपुरी के अभिनय को खूब सराहा गया। 

‘मकबूल’

शेक्सपियर के मशहूर नाटक 'मेकबेथ' पर आधारीत 2003 में आई ‘मकबूल’ में भी ओमपुरी ने इरफान खान के साथ मिलकर दर्शकों का दिल जीता। मकबूल फिल्म विशाल भारद्वाज द्वारा निर्देशित की गयी है। एक भ्रष्ट पुलिसवाले की किरदार निभाते हुये ओम पूरी ने पूरी फिल्म में मानों शानदार अभिनय के बलबूते नई जान ही फूँक दी।Embeded Object

‘जाने भी दो यारो’

ओमपुरी ने समय के साथ खुद को बेहतर बनाया। ओमपुरी न केवल गंभीर फिल्में बल्कि हास्य फिल्मों में भी अपनी बेबाक अभिनय का जादू दिखाया। उनकी 1983 में रिलीज हुयी फिल्म ‘जाने भी दो यारो’ को जिसने भी देखा वो हंसी से लोटपोट हो गए। यहा पर भी ओमपुरी ने लोगो को कुछ नया सिखाया और दिखा दिया की हसाने के लिए जोकर बनना जरूरी नहीं होता।Embeded Object

‘मालामाल वीकली’

अपनी भाव-भंगिमाओं और अपनी आवाज से ही वे हास्य फिल्मों में भी शत प्रतिशत सफल हुये। हॉलीवुड फिल्म वॉकिंग नेड डिवाइन से प्रभावित साल 2006 में रिलीज हुई ‘मालामाल वीकली’ फिल्म की कहानी में भले ही जादा दम न हो लेकिन दर्शकों को ओम पूरी का ‘बल्लू’ किरदार आज भी हसने पर मजबूर करता है। इस फिल्म में एक छोटे से गाव में रहनेवाला बलवंत उर्फ बल्लू दूधवाले की किरदार में है जिसे ओम पूरी ने निभा कर मानों जीवित ही कर दिया हो। फिल्म में परेश रावल, ओम पुरी, राजपाल यादव और सुधा चंद्रन ने अभिनय किया है।Embeded Object

‘चुप चुप के’

हंसोड़ किस्म के इंसान माने जानेवाले ओम पूरी ने साल 2006 में आई फिल्म ‘चुप चुप के’ में एक गुजराती कारोबारी की भूमिका निभाई। इस फिल्म में ओम पूरी का किरदार ‘प्रभात सिंह चौहान’ मानों उन्ही के लिए बना हो। खुद के घर में बने अखाड़े में उनकी परेश रावल को गुजराती में ललकार सभी को बार बार पूरी फिल्म देखने पर विवश करती है। राजपाल यादव के साथ उनकी हास्य सीन बुजुर्गो से लेकर बच्चे तक को खूब ठहाके लगवाती है।Embeded Object