उच्चतम न्यायालय द्वारा मजहब, जाति, भाषा, समुदाय और नस्ल के आधार पर वोट मांगने संबंधी फैसले को एक पक्ष ऐतिहासिक मान रहा है तो दूसरे पक्ष का कहना है कि इससे बहुत ज्यादा अंतर नहीं आएगा। वैसे भी इस फैसले पर विचार करते समय हमें यह ध्यान रखना होगा कि उच्चतम न्यायालय की सात सदस्यीय संविधान पीठ में से तीन न्यायाधीशों ने फैसले के विरुद्ध मत दिया है। हालांकि इससे यह नहीं मानना चाहिए कि उन्होंने चुनाव में मजहब के इस्तेमाल को जायज ठहराया है। वस्तुत: उनका मतांतर दूसरे मुद्दों पर था जिनमें एक यह है कि उच्चतम न्यायालय को हस्तक्षेप कर विधायिका द्वारा बनाए गए कानून को बदलने जैसी भूमिका निभानी चाहिए या नहीं। जिन लोगों ने भारतीय जन प्रतिनिधित्व कानून को पढ़ा है उनको पता है कि इसकी धारा 123 के तहत चुनाव में क्या-क्या भ्रष्ट व्यवहार है इसका विस्तार से वर्णन किया गया है। उसी धारा का भाग 3 और 3 ए चुनाव में मजहब, जाति, नस्ल, समुदाय व भाषा का वोट मांगने में उपयोग का विवरण है। धारा 123 के विन्दू 3 में कहा गया है कि कोई उम्मीदवार या उसके एजेंट या कोई भी मजहब, जाति, नस्ल, भाषा और समुदाय के नाम पर यदि उम्मीदवार की सहमति से वोट के लिए अपील करता है। इसी तरह धारा 3 ए में कहा गया है कि कोई उम्मीदवार या उसका एजेंट या और काई उम्मीदवार या उसके चुनाव एजेंट की सहमति से मजहब, जाति, नस्ल, भाषा, समुदाय के नाम पर नफरज या द्वेष फैलाता है। यानी ये दोनों भ्रष्ट व्यवहार में माने जाएंगे। यानी उस उम्मीदवार की उम्मीदववारी रद्द हो जाएगी, चुनाव जीता है तो वह रद्द हो जाएगा तथा इसके लिए जो अन्य कानून है उसके तहत उस पर मुकदमा चलेगा एवं सजा होगी। तो प्रश्न है कि उच्चतम न्यायालय के फैसले से क्या बदला?

इस प्रश्न का उत्तर देने के पहले यह समझना जरुरी है कि आखिर न्यायालय के सामने यह मामला आया क्यों एवं उसके सामने निर्धारण के लिए प्रश्न क्या थे? उच्चतम न्यायालय के सामने कई याचिकाएं आईं थीं जिसमें 1995 के हिन्दुत्व संबंधी फैसले पर पुनर्विचार की अपील करते हुए कहा गया था कि चूंकि कई राज्यों के चुनाव है जिनमें राजनीतिक पार्टियां मजहब का इस्तेमाल कर सकतीं हैं इसलिए इस पर रोक लगाई जाए। प्रधान न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर की अध्यक्षता वाली 7 सदस्यीय संविधान पीठ ने स्पष्ट कर दिया था कि वह हिन्दुत्व के मुद्दे पर विचार नहीं करेगी। उसने कहा कि वह चुनाव में मजहब का गलत इस्तेमाल रोकने के लिए जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 123 से संबंधित मामले की सुनवाई कर रहा है और यह पता लगा रहा है कि धारा 123 का दायरा क्या होगा? जैसा हम जानते हैं दिसंबर 1995 में न्यायमूर्ति जे. एस. वर्मा की पीठ ने फैसला दिया था कि हिंदुत्व शब्द भारतीय लोगों की जीवन शैली को इंगित करता है। हिंदुत्व को सिर्फ धर्म तक सीमित नहीं किया जा सकता। तब उच्चतम न्यायालय ने हिंदुत्व के इस्तेमाल को धारा-123 के तहत भ्रष्ट व्यवहार नहीं माना था। तब मनोहर जोशी ने बयान दिया था कि पहला हिंदू राज्य महाराष्ट्र में बनाया जाएगा। बॉम्बे उच्च न्यायालय ने भाजपा-शिवसेना के 10 विधायकों की चुनाव में मिली जीत को रद्द कर दिया था। उसके बाद मामला उच्चतम न्यायालय आया। उच्चतम न्यायालय का कहना था कि जब तक भाषण किसी के प्रतिकूल या प्रत्यक्ष तौर पर हमला करने वाला न हो, उसमें प्रयोग हुए हिंदुत्व को हिंदू धर्म व हिंदू धर्म में विश्वास रखने वालों के लिहाज से नहीं देखा जाना चाहिए। सिर्फ इस आधार पर कि भाषण में हिंदुवाद व हिंदुत्व जैसे शब्द इस्तेमाल हुए हों, व्यक्ति को धारा 123 के विन्दू (3) व (3ए) के तहत शामिल नहीं किया जा सकता। उसके बाद सबकी सदस्यता फिर बहाल हो गई।

संविधान पीठ ने पिछले साल अक्टूबर में सुनवाई के दौरान साफ कर दिया था कि वह हिंदुत्व शब्द की व्याख्या की नहीं, केवल जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 123(3) की समीक्षा कर रही है। जाहिर है, उसके सामने कई प्रश्न थे। पहला तो यही कि मजहब,जाति, समुदाय, भाषा आदि के नाम पर वोट मांगना जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत भ्रष्ट व्यवहार है तो इसे कैसे व्याख्यायित किया जाए। कानून की धारा -123 (3) के अंतर्गत उसके मजहब की बात है तो यह साफ होना चाहिए कि उसके का दायरा क्या है? उसके मजहब (हिज रिलीजन) का मतलब किस तरह से देखा जाए? पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा था कि हम ये जानना चाहते हैं कि मजहब के नाम पर वोट मांगने के लिए अपील करने के मामले में किसके मजहब की बात है? उम्मीदवार के धर्म की बात है या एजेंट के धर्म की बात है या फिर तीसरी पार्टी के मजहब की बात है जो वोट मांगता है या फिर मतदाता के मजहब की बात है? राजनेताओं और मजहबी नेताओं का गठजोड़ यानी किसी मजहबी नेता से अपने पक्ष में वोट देने की अपील करवाने को किस तरह देखा जाए? अगर सभी उम्मीदवार हिंदू हैं और कोई कहे कि पंडित को वोट दें या फिर किसी और जाति के लोग कहें कि अमुक जाति के लोगों को वोट दिया जाए तो कानून क्या कहता है? अगर सभी उम्मीदवार अनुसूचित जाति और जनजाति के हों और उस आधार पर वोट मांगा तब क्या होगा? कुछ मजहबी संगठन किसी के लिए वोट मांगे तो? सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति ठाकुर ने पूछा था कि अगर कोई कहे कि आप इन्हें वोट दें क्योंकि यह व्यक्ति आपके धर्म का है, तो क्या इससे कानून का उल्लंघन होगा? अब सवाल था कि मजहब के आधार पर वोट मांगने को कैसे वर्गीकृत किया जाए। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इसे तीन आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है। एक, मजहब के आधार पर वोट मांगना, 2. मजहब के आधार पर वोट के लिए मना करना और 3. किसी दूसरे मजहब के नेता को वोट देने के लिए लोगों को कहना।

इन सबको उद्धृत करने का अर्थ केवल यह स्पष्ट करना था कि न्यायालय ने मामले के सभी पहलुओं पर गहराई से विस्तार कर सोद्देश्य फैसला दिया है। उसने साफ कहा कि मजहब और राजनीति को मिलाना संविधान की भावना के खिलाफ होगा और संवैधानिक योजना का सार यही है कि राजनीति और धर्म अलग अलग रहें।  यानी मजहब को किसी सूरत में चुनाव का हथियार बनाने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। न्यायालय ने कहा कि सेक्यूलर स्वरूप संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है जबकि चुनाव लड़ना व्यक्ति का कानूनी अधिकार है। ऐसी स्थिति में कोई भी कानून सेक्यूलरवावद के खिलाफ नहीं हो सकता। चुनाव एक सेक्युलर प्रक्रिया है और इसका पालन किया जाना चाहिए। न्यायालय ने यह भी कहा कि इंसान और भगवान के बीच रिश्ता अपनी निजी पसंद का मामला है। सरकार को इससे खुद को अलग रखना चाहिए। वास्तव में इस फैसले में बहुत कुछ नया नहीं है, फिर भी कहा जा सकता है कि पहले से चीजें थोड़ी ज्यादा स्पष्ट हुईं हैं। किसी भी चुनाव में अब कोई भी राजनीतिक व्यक्ति, उम्मीदवार, नेता या एजेंट किसी भी मजहर्ब, जाति, समुदाय, भाषा या वर्ग के आधार पर लेकर लोगों से वोट मांगता है या उम्मीदवार के लिए कोई व्यक्ति अपील करता है तो वह भ्रष्ट व्यवहार माना जाएगा।

तो एक सोच यह है कि उच्चतम न्यायालय की इतनी कवायद के बाद अब इस तरह का भ्रष्ट आचरण से चुनाव मुक्त हो जाएगा। किंतु ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा। दरअसल, अगर कोई भी ऐसा करता है तो उसके विरुद्ध याचिका दायर होगी। उस याचिका की सुनवाई में ही इतना विलंब हो जाता है कि कई बार उसका उद्देश्य ही नष्ट हो जाता है। जाहिर है, सुनवाई की प्रक्रिया जल्दी पूरी हो तो इसका उद्देश्य पूरा हो सकता है। दूसरे, हमारे देश में अनेक दल, मजहब, जाति, समुदाय के नाम पर बने ही हैं। उनका क्या करेंगे? कई दलों के नाम के साथ ही यह जुड़ा है। क्या उनकी मान्यता रद्द की जाएगी या उनको नाम बदलने के लिए कहा जाएगा? हमारे देश के नेताओं और उनके समर्थकों को इतनी बुद्धि तो है ही कि वे इस तरह अपनी बात रखें कि उनमें मजहबी या जातीय या सामुदायिक अपील निहित भी हो, उनके मतदाता इसे समझ भी जाएं एवं वे कानून के शिकंजे से भी बचे रहें। कहने का तात्पर्य यह कि उच्चतम न्यायालय जो फैसला दे यह अंतत: राजनीतिक व्ययवहार का मामला है। कानून का भय एक सीमा तक तो काम करेगा। यह राजनीतिक दलों और नेताओं को ही तय करना है कि वे चुनाव के सेक्यूलर चरित्र को हर हाल में बनाए रखें। साथ ही मतदाताओं की चेतना का भी इतना विकास चाहिए कि वे ऐसी किसी संकीर्ण अपील को नकार सकें। ऐसा करने से दूसरे उम्मीदवार भी ऐसी अपीलों से बचने की कोशिश करेंगे।