आचार्य अभिनवगुप्त की सहस्त्राब्दी वर्ष के अंतर्गत आयोजित 'राष्ट्रीय विद्वत संगम'

बेंगलूरु, जनवरी 09 : भारत के प्राचीन ज्ञान में उपलब्ध विज्ञान को सामने लाना विद्वानों का काम है। इससे हमारी युवा पीढ़ी को सर्वाधिक लाभ होगा। लेकिन, सेक्युलरिज्म के कारण विद्वानों ने अपनी परंपराओं पर कार्य नहीं किया। सेक्युलरिज्म ने देश का बहुत नुकसान किया है। सेक्युलरिज्म के नाम पर भारतीय विचारदर्शन और उसके मूलभूत तत्वों को हमने दरकिनार किया है। अब यह प्रवृत्ति बदलनी चाहिए। यह विचार आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक और अंतरराष्ट्रीय आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रविशंकर ने व्यक्त किए। आचार्य अभिनवगुप्त की सहस्त्राब्दी वर्ष के अंतर्गत आयोजित राष्ट्रीय विद्वत संगम के समापन समारोह में वह विशेष रूप से उपस्थित थे। इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरकार्यवाह सुरेश भैयाजी जोशी और मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावडेकर उपस्थित थे।

श्रीश्री रविशंकर ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में आचार्य अभिनवगुप्त का महत्त्वपूर्ण योगदान है। लेकिन, उनको विस्मृत कर दिया गया। तमिलनाडू में शैव दर्शन के 63 प्रमुख संत हुए। उनके संबंध में भी किसी को बताया नहीं गया है। समाज को इन दार्शनिकों के बारे में बताने की आवश्यकता है। यह काम विद्वान कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि आज की युवा पीढ़ी तर्कसंगत है। आज का युवा प्रत्येक विचार को तर्क के आधार पर स्वीकार करता है। इस संदर्भ में अच्छी बात यह है कि भारतीय शास्त्र की सबसे बड़ी विशेषता है कि वह तर्कसंगत है। श्रीश्री ने कहा कि हमारी विचारधारा शास्त्र सम्मत है और जो भी विचार शास्त्र सम्मत होता है, वह प्रमाणित होता है।

भारत को एकसूत्र में जोड़ता है शैवदर्शन : श्रीश्री रविशंकर ने कहा कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक अगर भारत को कोई जोड़ता है तो वह शैवदर्शन। आचार्य अभिनवगुप्त शैवदर्शन और शैव सिद्धांत के सबसे बड़े प्रतिपादक थे। उन्होंने बताया कि आचार्य अभिनवगुप्त के विचार आज भी प्रासंगिक है। विद्वान व्यक्ति सर्वत्र और सर्वदा पूज्यते हैं। इसलिए आज 1000 वर्ष बाद भी हम आचार्य अभिनवगुप्त का स्मरण कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि आचार्य अभिनवगुप्त के दर्शन को जन-जन तक पहुंचाने के लिए जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र का यह भगीरथ प्रयास है। इस कार्य के सहयोगी पथिक बनकर इस प्रयास को सफल बनाने का कर्तव्य हमारे सामने है।